
प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (माओवादी) की केंद्रीय समिति के सदस्य चेलुरी नारायण राव उर्फ सोमन्ना ने संगठन की जमात में तीन दशक बिताने के बाद 30 मार्च को विजयवाड़ा में आत्मसमर्पण कर दिया. उसका नाम कई हत्याओं से जुड़ा था, जिनमें 2018 में आंध्र प्रदेश और ओडिशा की सीमा पर एक विधायक और एक पूर्व विधायक की हत्या भी शामिल है.
एक दिन पहले पड़ोसी छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुकमा के जंगलों में माओवादी पल्टन का सेक्शन कमांडर और 5 लाख रुपए का इनामी नक्सली मुचाकी कैलाश सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारा गया. वह उन लगातार घटते सशस्त्र काडरों में से था जो इन आदिवासी इलाकों में अब भी सक्रिय थे.
दोनों घटनाक्रम 31 मार्च की पूर्व संध्या पर हुए. यही वह समय सीमा थी जो केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वामपंथी उग्रवाद के सफाए के लिए अगस्त 2024 में तय की थी. संसद में 30 मार्च को शाह ने ऐलान किया कि देश ने 'कमोबेश' वह लक्ष्य हासिल कर लिया है. लोकसभा में चर्चा का जवाब देते हुए करीब डेढ़ घंटे लंबे भाषण में उन्होंने कहा, ''मैं बेहिचक कह सकता हूं कि हम नक्सल-मुक्त हो गए हैं.''
साथ ही यह भी जोड़ा कि औपचारिक प्रक्रियाएं जल्द पूरी हो जाएंगी. 2024 से अब तक 706 नक्सल मारे गए, 2,218 गिरफ्तार कर लिए गए, और 4,839 ने हथियार डाल दिए. शाह ने इस नतीजे को पिछली गलतियां सुधारने के लिए बनाई गई सोची-समझी रणनीति के तौर पर पेश किया. उन्होंने कहा, ''बस्तर विकास की कमी की वजह से लाल आतंक की चपेट में नहीं आया. बल्कि लाल आतंक का साया ही था जिसने विकास को वहां से दूर रखा.''
पीछे हटे नक्सली
यह दावा उस टकराव में आए नाटकीय बदलाव को बताता है जो दो दशक पहले अपने चरम पर 12 राज्यों में फैला था और जिसने लाल गलियारे के नाम से कुख्यात इस भूभाग के करीब 20 करोड़ लोगों पर असर डाला था. लंबे समय से इसका केंद्र माने गए बस्तर में ही करीब 6,000 वर्ग किमी का इलाका अभी दिसंबर 2023 तक प्रभावी तौर पर सरकारी नियंत्रण से बाहर था, जहां उग्रवादियों ने कर वसूली और इंसाफ देने की अपनी समानांतर व्यवस्था लागू कर रखी थी.
वह भौगोलिक दायरा अब तेजी से सिमट गया है. शाह के बताए आंकड़ों के मुताबिक, वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित जिलों की संख्या 2014 में 126 से घटकर महज दो रह गई है, जबकि 'सबसे प्रभावित' जिलों की तादाद 35 से घटकर शून्य पर आ गई है. हालांकि उन्होंने बाकी बचे प्रभावित जिलों के नाम नहीं बताए, लेकिन हाल के घटनाक्रम बस्तर के नारायणपुर और बीजापुर जिलों की तरफ इशारा करते हैं. ज्यादा अहम यह कि सुरक्षा एजेंसियां अब इस उग्रवाद को टूटा-बिखरा स्थानीय खतरा भर बताती हैं.
बस्तर में इंस्पेक्टर जनरल (आइजी) पी. सुंदरराज का अनुमान है कि अब महज 20-25 हथियारबंद नक्सली बचे हैं, जिनमें से कई अलग-थलग और अकेले काम कर रहे हैं. झारखंड में उनकी बची-खुची मौजूदगी पश्चिम सिंहभूम में सारंडा-कोल्हान पट्टी के छोटे-मोटे जंगली हिस्सों तक रह गई है. महाराष्ट्र में कभी नक्सलवाद का गढ़ रहे गढ़चिरौली में अब रिकॉर्ड पर महज छह नक्सली हैं, जिनमें से केवल एक स्थानीय और बाकी छत्तीसगढ़ के हैं, जिनके यहां छिपे होने का संदेह है. आंध्र प्रदेश के डीजीपी हरीश कुमार गुप्ता का कहना है कि प्रदेश में आंदोलन के ''भूमिगत काडरों की ताकत घटकर शून्य हो गई है.''
नेतृत्व का कमजोर पड़ते जाना निर्णायक रहा. सीपीआइ (माओवादी) के शीर्ष नेतृत्व यानी पोलितब्यूरो और सेंट्रल कमेटी (सीसी) के सदस्यों को गिरफ्तारियों, आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों के जरिए सुनियोजित ढंग से खत्म किया गया. उनका नेतृत्व दिसंबर 2023 में पोलितब्यूरो के पांच और सेंट्रल कमेटी के अन्य 19 सदस्यों से अब पोलितब्यूरो के महज दो सदस्यों तक सिमट गया है.
इन दो में से भी 72 वर्षीय मुप्पाला लक्ष्मण राव उर्फ गणपति के बारे में माना जाता है कि वे बीमार और संभवत: नेपाल में हैं. दूसरे 65 वर्षीय मिसिर बेसरा झारखंड में सक्रिय तो हैं लेकिन सीमित इलाके से आगे काडर को संगठित करने लायक नहीं रह गए हैं.
सरकार इस नतीजे का श्रेय तीन सूत्री रणनीति को देती है: लगातार सुरक्षा कार्रवाइयां, आत्मसमर्पण और पुनर्वास की आक्रामक नीति, और साथ ही विकास के कामों पर जोर.
तीन सूत्री रणनीति
पहला, बल का इस्तेमाल. बदलाव दिसंबर 2023 के बाद और तेज हो गया, जब छत्तीसगढ़ में सरकार बदलने के साथ ज्यादा बढ़-चढ़कर आक्रामक कार्रवाइयां करने का रवैया अपनाया गया.
सुरक्षा बल माओवादी इलाकों में घुसकर ज्यादा गहरे और लगातार हमले करने लगे, जिससे उस चीज का संकेत मिला जिसे अधिकारी 'बेरोकटोक' कार्रवाई का नजरिया कहते हैं. बस्तर में तैनात एक पुलिस अधिकारी कहते हैं, ''कई बार कार्रवाइयों का नतीजा गैरइरादतन नुक्सान के रूप में सामने आता है. लेकिन जब स्थानीय कमांडर को एहसास होता है कि कोई सवाल नहीं पूछे जाएंगे तो जोखिम लेने की क्षमता बढ़ जाती है.''
इस तरीके से हालांकि जवाबदेही के सवाल भी खड़े हुए. संसद में शाह ने जोर देकर कहा कि 'जो गोली चलाएंगे, उन्हें जवाब भी गोली से मिलेगा'. लेकिन उन्होंने हथियार डालने के लिए तैयार नक्सलियों के साथ बातचीत का दरवाजा भी खुला रखा.
इस बीच, खुफिया सूचनाएं जुटाने का काम ड्रोन, उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों और एआइ आधारित डेटा एनालिसिस से एकदम बदल गया. राष्ट्रीय जांच एजेंसी, प्रवर्तन निदेशालय, इंटेलिजेंस ब्यूरो और राज्य खुफिया इकाइयों के तालमेल से माओवादियों के वित्त और लॉजिस्टिक्स पर चोट की गई. शाह के मुताबिक, माओवादियों के असलहे में 92 फीसद से ज्यादा हिस्सा सुरक्षा बलों से लूटे गए हथियारों का था.
नियंत्रण कसकर और गोला-बारूद के रिसाव रोककर एजेंसियों ने माओवादी काडरों की हथियारों के भंडार को फिर से भरने की क्षमता बहुत कम कर दी. इसमें दक्षिण के शुरुआती मॉडल से भी मदद ली गई. आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के अधिकारी स्पेशल इंटेलिजेंस ब्रांच (एसआइबी) और बेहतरीन माओवादी कमांडो ग्रेहाउंड की तरफ इशारा करते हैं, जिनके सांचे में पारंपरिक पुलिसिया कार्रवाइयों से हटकर खुफिया सूचनाओं के जरिए लक्ष्य-आधारित कार्रवाइयों की तरफ बढ़ा गया. नवंबर 2025 में आंध्र के जंगलों मे नक्सली कमांडर माड़वी हिड़मा की मुठभेड़ में मौत बड़ा झटका था.
साल 2025 का मध्य आते-आते सुरक्षा बलों ने मान लिया कि बाकी बचे सभी माओवादी काडरों को खत्म नहीं किया जा सकता. ऐसे में रणनीति बदलकर आत्मसमर्पण पर जोर दिया गया, जिससे राज्यों के बीच काडरों के हथियार डलवाने की होड़ मच गई. उन तक पहुंचने के लिए सिविल सोसाइटी के सदस्यों, पत्रकारों और स्थानीय नेताओं को लगाया गया.
अक्तूबर 2025 में शीर्ष कमांडर मल्लोजुला वेणुगोपाल राव उर्फ भूपति का सरेंडर निर्णायक पल था. काडर के सरेंडर पर शाह ने कहा कि हथियार डालने वाले काडर अपने ऊपर घोषित इनाम की रकम के हकदार होते हैं, लेकिन यह रकम प्रोबेशन पीरियड के बाद जारी की जाती है. इस बीच उन्हें तीन साल तक 10,000 रुपए महीने स्टाइपेंड मिलती है, और सीनियर काडर को एक बार 50,000 रुपए का अनुदान, पीएम आवास योजना के तहत मकान, और जमा किए गए हथियारों के लिए अतिरिक्त भुगतान दिया जाता है.
उन्हें समाज में फिर से घुलने-मिलने में मदद के लिए कौशल प्रशिक्षण भी दिया जाता है. तेलंगाना एसआइबी की प्रमुख आइजी बी. सुमति, जिनकी देखरेख में 2024 के बाद 720 से ज्यादा आत्मसमर्पण हुए, जोर देकर कहती हैं कि मकसद सिर्फ हथियार डलवाना नहीं था, उससे भी आगे यह विद्रोहियों को 'अपनी विचारधारा छोड़कर लोकतंत्र को गले लगाते' देखना था.
शाह ने संसद में बार-बार जोर देकर कहा कि नक्सलवाद महज कानून और व्यवस्था का मुद्दा नहीं था बल्कि इसकी जड़ें शासन-प्रशासन की कमजोरियों में थीं. जवाब में पहले पहुंच से बाहर रहे इलाकों में सरकार की मौजूदगी बढ़ाने पर जोर दिया गया. वर्ष 2014 के बाद प्रभावित इलाकों में सड़क बनाने पर 20,000 करोड़ रु. खर्च हुए जिससे 12,000 किमी से ज्यादा सड़कें बनीं. 5,000 नए टावर लगाकर मोबाइल संपर्क बढ़ाया गया. 8,000 और टावरों की मंजूरी दी जा चुकी है.

अंतिम चरण से आगे
फिर भी जमीनी हकीकत पेचीदा है. उग्रवादी बचे-खुचे इलाकों में हैं, खासकर अंतरराज्यीय सीमाओं पर, जहां घात लगाकर हमले और इंप्रोवाइज्ड एक्सप्लोजिव डिवाइस (आइईडी) अब भी संभावित खतरा हैं. 2025 में करीब 900 आइईडी का पता चला, और माना जाता है कि इसके अलावा 300-400 और सड़क, पुलिया और जंगल के रास्तों पर लगाई गई हैं. 1 मार्च को झारखंड के जंगलों में हुए आइईडी धमाके में कोबरा बटालियन के एक असिस्टेंट कमांडेंट अपना पैर गंवा बैठे.
आगे जो होगा, वह भी इतना ही अहम है. 2008 में विद्रोह-विरोधी कार्रवाइयों के लिए बनाई गई छत्तीसगढ़ की जिला रिजर्व गार्ड सरीखी विशेष इकाइयों को एहतियात के साथ फिर से तैनात करने की जरूरत होगी. इन्हें भंग करने से सुरक्षा में नई दरारें पैदा होने का खतरा है. एक प्रस्ताव यह है कि इन बलों का इस्तेमाल पूरे बस्तर में नए बनाए गए पुलिस थानों में तैनाती के लिए किया जाए.
पूर्व काडरों को समाज के साथ नए सिरे से जोड़ना एक और चुनौती है. हथियार डालने वालों में से कई का खून-खराबे का लंबा इतिहास रहा है. छत्तीसगढ़ सरकार ने हथियार डालने वाले काडर के खिलाफ चल रहे मामलों की समीक्षा के लिए मंत्रिमंडल की उपसमिति बनाई है. यह मामले वापस लेने की सिफारिश कर सकती है, लेकिन अभी तक कोई मामला वापस नहीं लिया गया है.
आलोचक वक्त से पहले जीत के दावों के खिलाफ आगाह करते हैं. महाराष्ट्र के पत्रकार और 'नक्सलवादाचे आव्हान (नक्सलवाद की चुनौती)' के लेखक देवेंद्र गावंडे का कहना है कि इस आंदोलन की आग में घी का काम करने वाली गरीबी और सामाजिक गैरबराबरी सरीखी परिस्थितियां आदिवासी इलाकों में अब भी कायम हैं. फिलहाल हालात बताते हैं कि पहले कभी जैसा विद्रोह मौजूद था, वह अब बुनियादी तौर पर कमजोर पड़ गया है. यह विद्रोह का निर्णायक अंत है या नहीं, यह इस पर निर्भर करेगा कि बंदूकें शांत होने के बाद क्या घटता है.
—अमिताभ श्रीवास्तव, प्रसाद निचेनमेटला और धवल एस. कुलकर्णी

