मार्च के मध्य में कैस्पियन सागर के ऊपर पैदा हुई हलचलों ने अचानक मौसम का मिजाज बदल दिया और पूरे उत्तर भारत में बौछारें पड़ने लगीं. किसानों के लिए इससे बुरा समय नहीं हो सकता था. रबी की फसलें कटाई के लिए तैयार थीं और बारिश की हल्की-सी बौछारों ने खेतों में खड़ी गेहूं और सरसों की फसल को नुकसान पहुंचाने का जोखिम पैदा कर दिया.
ठीक उसी समय, एक और संभावित लेकिन कहीं बड़ा खतरा गहराने लगा: पश्चिम एशिया में युद्ध. अगर यह जंग लंबी चली और होरमुज जलडमरूमध्य में बाधाएं बरकरार रहीं तो न केवल खेती की लागत बढ़ सकती है बल्कि खरीफ सत्र के दौरान उर्वरक की उपलब्धता में कमी और खाद्य महंगाई पर नए सिरे से दबाव भी बढ़ सकता है.
भारत के लिए जोखिम ज्यादा है. यूरिया आयात का 70 फीसदी से ज्यादा पश्चिम एशिया से आता है. घरेलू क्षमता वित्त वर्ष 2015 के 2.1 करोड़ टन से बढ़कर 2026 में 3.1 करोड़ टन हो जाने के बावजूद उर्वरक सेक्टर बाहरी खतरों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है. सेक्टर देश की कुल गैस खपत का लगभग 29 फीसदी इस्तेमाल करता है और मुख्य रूप से लिक्विफाइड नेचुरल गैस (एलएनजी) खाड़ी से आयात होती है.
इसमें भी 40 फीसद सप्लाइ कतर से होती है. गैस आपूर्ति में बाधा से घरेलू यूरिया उत्पादन प्रभावित हो सकता है, भले ही क्षमता पर्याप्त हो. इसके शुरुआती संकेत दिखने लगे हैं: दुनिया भर में उर्वरक की कीमतें 30-40 फीसद तक बढ़ गई हैं और यूरिया के दाम 650 डॉलर (60,500 रुपए) प्रति टन के पार चले गए हैं. माल ढुलाई और बीमा लागत में इजाफे ने आयातित सामान की भारत पहुंचने की कीमत बढ़ा दी है; साथ ही, चीन जैसे देशों की निर्यात पाबंदियों से दुनिया भर में इसकी सप्लाइ और घट गई है.
फिलहाल भारत के लिए राहत की बात है. उर्वरक का स्टॉक संतोषजनक स्थिति में है; यूरिया का भंडार 60 लाख टन से ज्यादा और डीएपी (डाइअमोनियम फॉस्फेट) लगभग 25 लाख टन होने का अनुमान है—ये दोनों पिछले साल से ज्यादा हैं. लेकिन इस व्यवस्था के काम करने में कुछ देरी हो सकती है. रबी की कटाई और खरीफ की बुवाई के बीच मार्च और अप्रैल ऐसे महीने हैं जो झटकों में राहत का काम करते हैं.
अगर नए आयात में देर होती है, तो मई तक दबाव बढ़ना शुरू हो सकता है. जून-जुलाई तक, जब खरीफ की मांग अपने चरम पर होती है, उर्वरक की कमी दिख सकती है. ऐसे में किसान उर्वरक का इस्तेमाल कम कर सकते हैं या फसल का तौर-तरीका बदल सकते हैं, जिससे पैदावार पर जोखिम बढ़ सकता है—खासकर धान और मक्का का. साथ ही, डीएपी और एनपीके जैसे उर्वरक—जिन पर यूरिया के मुकाबले कम सब्सिडी मिलती है—पर वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव का सीधा असर होगा, जिससे खेती पर लागत का दबाव और बढ़ जाएगा.
यही वह वक्त है जब जोखिम बढ़ सकते हैं. रबी फसल की कटाई के दौरान मौसम में गड़बड़ी से जहां दिक्कतें हो सकती हैं, वहीं खरीफ के लिए उर्वरक की कमी हो सकती है. कम पैदावार और उर्वरकों की अधिक कीमतें दोनों मिलकर सप्लाइ कम कर सकती हैं और कीमतों में इजाफा हो सकता है.
क्या किया जा रहा
सरकार ने जोखिम से निबटने के लिए कदम उठाए हैं. 22 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रमुख मंत्रियों के साथ उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की, जिसमें खाद को 'दूसरे नंबर की अहम चिंता’ के तौर पर रखा गया. फिलहाल, ध्यान निरंतरता बनाए रखने पर है—यानी यह पक्का करना कि खरीफ की फसल से पहले बिना किसी रुकावट के सप्लाइ जारी रहे.
आयात के लिए टेंडर जल्द दिए जा रहे हैं, और शिपमेंटों पर कड़ी नजर रखी जा रही है. खाड़ी देशों पर निर्भरता घटाने के लिए रूस, बेलारूस और मोरक्को से वैकल्पिक सोर्सिंग की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं. साथ ही, घरेलू यूरिया उत्पादन कायम रखने के लिए उर्वरक संयंत्रों को गैस आवंटन में प्राथमिकता दी जा रही है.
और क्या करने की जरूरत
ता त्कालिक जोखिम से निबटने के लिए ये कदम हैं. लेकिन ढांचागत जोखिम बरकरार हैं. उर्वरक का आयात और ऊर्जा दोनों ही पश्चिम एशिया से जुड़े हैं, और इनका काफी हिस्सा होरमुज जलडमरूमध्य से होकर आता है. अगर मार्च के मध्य से शुरू हुई कोई भी दिक्कत आठ से ज्यादा हफ्ते तक चली तो भारत जोखिम की जद में पहुंच जाएगा.
पश्चिम एशिया के अलावा अन्य जगहों से इन्हें जुटाना जोखिम घटाने के लिए बेहद जरूरी है. फिर राजकोष का जोखिम है. भारत की उर्वरक सब्सिडी पहले से ही काफी ज्यादा है और वित्त वर्ष 2026 में इसे संशोधित करके 1.86 लाख करोड़ रुपए किया गया है. अगर दुनिया भर में कीमतें लगातार बढ़ती रहीं, तो सरकार के सामने मुश्किल स्थिति होगी: या तो वह इस झटके को खुद झेले और सब्सिडी का बिल बढ़ाए, या लागत का बोझ किसानों पर डाल दे—लेकिन इस कदम से उनके पहले से ही कम मुनाफे पर और भी ज्यादा दबाव का जोखिम रहेगा.

