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पैर जमाने के नए दांवपेच

भाजपा को असम का अपना गढ़ बचाए रखने के अलावा बंगाल में सीटें बड़े पैमाने पर बढ़ाने का पूरा भरोसा. उसे दक्षिणी राज्यों में भी अपनी स्थिति मजबूत होने की उम्मीद.

mandate 2026: BJP 
प्रधानमंत्री मोदी 14 मार्च को कोलकाता की एक रैली में विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी (दाएं) और दूसरे नेताओं के साथ
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

भाजपा के लिए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में पश्चिम बंगाल ही सबसे महत्वपूर्ण है. असम में सत्ता बचाए रखने का उसे पूरा भरोसा है और करीब समूचे पूर्वोत्तर को वह कांग्रेस के हाथ से छीन चुकी है, सिर्फ 'बांग्ला’ ही पार्टी के पूरबी ताज से गायब है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके गृह मंत्री अमित शाह के लिए यह राज्य सबसे ज्यादा चुनौती बना हुआ है.

उनकी अथक चुनावी मशीनरी को यहां एकदम सटीक प्रदर्शन करना होगा. राज्य में 2024 के लोकसभा चुनावों में झटके ने उन्हें विचलित नहीं किया, जब भाजपा की सीटें (कुल 42 सीटों में) 18 से घटकर 11 रह गईं. उसके बाद से पार्टी ने ज्यादा चुस्त तरीका अपनाया. बूथ स्तर पर डेटा के साथ फोकस, पहले उम्मीदवारों का ऐलान और सामुदायिक समीकरणों को साधने की जुगत लगाई.

2024 के बाद जरूरत के मुताबिक हिंदुत्व के हल्ले को थोड़ा हल्का करने, सहयोगियों के साथ तालमेल मजबूत करने और पूरा अनुशासित प्रचार चलाने की रणनीति महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के चुनावों में काफी फायदेमंद रही है. अब सबसे बड़ी चुनौती का वक्त है. यानी बंगाल इस साल क्या नतीजे देता है, 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी की तैयारी की दिशा उससे तय हो सकती है.

लेकिन इसके ठीक पड़ोस में असम का मामला एकदम अलग है. वहां कमान पूरी तरह से मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा के हाथ पूरी में है और भाजपा को आराम से नाव पार लगा ले जाने की उम्मीद है. जहां तक दक्षिणी राज्यों का मामला है तो केरल, तमिलनाडु और पुदुच्चेरी में पार्टी के पास अभी भी न तो दबदबे वाले नेता हैं और न ही संगठनात्मक पकड़, जो उसे बढ़त दिला सकें.

उन राज्यों में पार्टी स्थानीय राजनीति की सख्त हकीकतों के बीच वहां की हवा के ही सहारे है. मसलन, वह स्थानीय विरोधाभासों से बढ़त लेने की कोशिश करती है, जिससे हर चुनाव में वह कुछ सीटें जीतने के करीब पहुंचती जा रही है. ऐसे में बड़ा दांव बंगाल पर ही है.

पश्चिम बंगाल

कोलकाता के भाजपा मुख्यालय में बात अब मैदानी इलाकों से आई रिपोर्ट, जाति और बूथ स्तर के आंकड़ों और बेशक 'जीत पाने की संभावनाओं’ को लेकर हो रही है. पार्टी ने 255 उम्मीदवारों के नामों का ऐलान कर दिया है और बाकी 39 के नामों को अंतिम रूप दिया जा रहा है. जल्द शुरुआत का मकसद वोटरों को गोलबंद करने के लिए ज्यादा से ज्यादा वक्त जुटाना है.

पार्टी का दावा है कि पहले की तरह दलबदलुओं और सेलेब्रिटी उम्मीदवारों पर निर्भर करने के बजाय इस बार जोर स्थानीय नेटवर्क से जुड़े उम्मीदवारों पर है. मगर फिर 'केंद्र से थोपे गए उम्मीदवारों’ के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी हुए. अलीपुरद्वार से लेकर हुगली और उत्तर 24 परगना से लेकर कोलकाता तक स्थानीय कार्यकर्ताओं के कुछ तबके ऊपर से उतारे गए बाहरी उम्मीदवारों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं.

 ऊंचे मंसूबे असम के मुख्यमंत्री सरमा 24 मार्च को बरपेटा की एक रैली में


इस बीच पार्टी ने हिंदुत्व पर बढ़-चढ़कर जोर देने वाले नैरेटिव की सीमाओं को भी पहचाना. पश्चिम बंगाल में मुसलमान आबादी के 27 फीसद हैं और विधानसभा के कुल 294 निर्वाचन क्षेत्रों में करीब एक-तिहाई है. हिंदुत्व पर नरम रुख से पार्टी को आधार बढ़ने की उम्मीद है. उसके आंतरिक आकलनों के मुताबिक, अल्पसंख्यक वोट में 4-6 फीसद का बिखराव भी 40-50 सीटों पर असर डाल सकता है.

लेकिन भाजपा बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा, आबादी में आए बदलावों, अवैध घुसपैठ और सुरक्षा के लिए कथित खतरों के इर्द-गिर्द अपना नैरेटिव फैलाने के लिए संघ से जुड़े नेटवर्क पर भरोसा करके चल रही है. पिछले साल के आखिर में संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों ने राज्य में घर-घर पहुंचने का कार्यक्रम चलाया था.

अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, पिछले महीने पूरे बंगाल में करीब 94,000 'मोहल्ला बैठकें’ की गईं. संघ का शताब्दी वर्ष कार्यक्रम घर-घर संपर्क अभियान के लिए माकूल मौका बन गया. आरएसएस के स्वयंसेवकों ने दलित और आदिवासी आबादी की सघन बस्तियों में पहुंचने की शिद्दत से कोशिश की. करीब 1,000 जगहों पर राम नवमी के दौरान जनजागरण भी चुनाव-पूर्व प्रचार का साधन बना बताते हैं.

संघ का नेटवर्क भी बढ़ा है. सूत्रों के मुताबिक, दक्षिण बंगाल में ही आरएसएस शाखाओं की संख्या दोगुनी होकर फिलहाल करीब 12,000 हो गई है. मनोबल भी ''बड़े नेताओं’’ के दौरे से बढ़ा है. आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत फरवरी में 10 दिन के दौर पर थे.

भाजपा ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर निजी हमले करने से भी जानबूझकर परहेज किया है क्योंकि उसे पता है कि आक्रामक लफ्फाजी से महिला मतदाता और मध्यवर्गीय भद्रलोक छिटक सकता है. पार्टी ने उनके खिलाफ भवानीपुर सीट से प्रतिपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारा है (पिछली बार उन्होंने अपने गढ़ नंदीग्राम में ममता को हराया था).

पार्टी महिलाओं की सुरक्षा, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था सरीखे मुद्दों पर भी जोर दे रही है. 2024 में व्यापक विरोध प्रदर्शनों का सबब बने आरजी कर मेडिकल कॉलेज बलात्कार-हत्याकांड सरीखी चर्चित घटनाओं का इस्तेमाल टीएमसी की हुकूमत की नाकामियों को उजागर करने के लिए किया जा रहा है. खबरें हैं कि पार्टी आरजी कर पीडि़ता की मां को उत्तर 24 परगना की पानीहाटी सीट से मैदान में उतार सकती है.

भगवा पार्टी को चुनाव आयोग के कुछ फैसलों से भी बढ़ावा मिला है. एक तो एसआइआर प्रक्रिया के जरिए, जिसमें एक के बाद एक हुए पुनरीक्षणों के बाद 2-4 फीसद (7 लाख से 15 लाख) मतदाताओं को वोटर लिस्ट से नाम हटाने के लिए चिन्हित किया गया, जबकि नए वोटर भी जोड़े गए.

दूसरा बढ़ावा उसे टीएमसी के करीब माने जाने वाले अधिकारियों को हटाने से मिला. करीब 60 बड़े अफसरों को हटा दिया गया है, जिनमें मुख्य सचिव, डीजीपी, गृह सचिव और यहां तक कि कोलकाता के पुलिस कमिश्नर भी हैं.

असम

दूसरे भाजपा-शासित राज्यों के विपरीत यहां मुख्यमंत्री हेमंत बिस्व सरमा पार्टी के चुनाव अभियान के चेहरे हैं. उनका निजी नेटवर्क, प्रशासन पर पकड़ और क्षेत्रीय साख पार्टी के लिए बेहद अहम है. उनसे न सिर्फ असम में सत्ता बनाए रखने की, बल्कि निर्णायक जनादेश हासिल करने की भी उम्मीद की जा रही है. मुख्यमंत्री का असर तमाम निर्वाचन क्षेत्रों, समुदायों और गठबंधनों के समीकरणों में है, जिसकी बदौलत भाजपा राज्य की पेचीदा आबादी विविधता के बीच रास्ता बना पाती है.

सरमा मुस्लिम वोटों को भी बेअसर कर पाए हैं (जो राज्य की आबादी के 34 फीसद हैं लेकिन 35-40 निर्वाचन क्षेत्रों में ही केंद्रित हैं). यह बांग्लादेश से कथित अवैध घुसपैठ के खिलाफ तीखे अभियान, दरांग, नगांव और बरपेटा सरीखे जिलों में बेदखली के अभियानों, आदिवासी पट्टियों में जमीन कानूनों को सख्त बनाने और संदिग्ध वोटरों के खिलाफ कार्रवाई करके किया गया है. सरमा ने असमिया मुसलमानों और 'मियां घुसपैठियों’ के बीच फर्क किया जिससे पार्टी के खिलाफ अल्पसंख्यक गोलबंदी रोकने में मदद मिली.

पार्टी ने अपना गठबंधन भी मजबूत किया. वह 126 में से सिर्फ 89 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि असम गण परिषद और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) को क्रमश: 26 और 11 सीटें दी गई हैं. बीपीएफ का एनडीए में लौटना भी अहम है. उसका बोडोलैंड क्षेत्रीय परिषद की पट्टी में 12-15 सीटों पर असर है.

तमिलनाडु

भाजपा 2021 के बाद अकेले चुनाव लड़ने की कोशिश की सीमाएं भांपकर ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कलगम (अन्नाद्रमुक) के साथ गठबंधन में लौट आई. अब पार्टी के नए राज्य अध्यक्ष नयनार नागेंद्रन की नरम और सौदेबाजी की काबिलियत की बदौलत पार्टी पिछली बार से सात ज्यादा यानी 27 सीटों पर लड़ेगी. हालांकि कुछ सीटों को लेकर खींचतान जारी है.

पार्टी अपने पारंपरिक समर्थन आधार तमिल-ब्राह्मण और नाडर समुदायों से आगे जाने की भी कोशिश कर रही है. नागेंद्रन ओबीसी थेवर समुदाय के हैं, जो दक्षिणी और मध्य जिलों में काफी प्रभावी है. राज्य इकाई में राजनैतिक और सांगठनिक बदलाव भी लाया गया है. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलै से शैली में नरमी लाने के लिए कहा गया है. उनकी टकराव वाली शैली की वजह से पहले अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन टूट गया था.

आंकड़ों से इस मजबूरी की वजह पता चलती है. 2021 के विधानसभा चुनाव में अन्नाद्रमुक के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ते हुए भाजपा 2.6 फीसद वोट हिस्सेदारी के साथ चार सीटें जीतने में कामयाब रही थी. लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने मोटे तौर पर अकेले चुनाव लड़ा, जिसमें उसकी वोट हिस्सेदारी तो बढ़कर 11 फीसद पर पहुंच गई लेकिन वह एक भी सीट नहीं जीत पाई. जाहिर है, संदेश बिल्कुल साफ था: गठबंधन के सहारे के बिना राज्य में भाजपा की वोट हिस्सेदारी सीटों में तब्दील नहीं होती.

केरल

केरल भाजपा के लिए बेगाना बना हुआ है, जहां पार्टी माकपा की अगुआई वाले वाम लोकतांत्रिक मोर्चे (एलडीएफ) और कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे (यूडीएफ) के बीच दो ध्रुवीय मुकाबलों के सख्त ढांचे को तोड़ नहीं पाई. 2021 में भाजपा को 11.4 फीसद वोट मिले लेकिन सीट एक भी नहीं. पहली सफलता उसे 2024 में मिली जब अभिनेता सुरेश गोपी ने त्रिशूर की सीटी जीती, जो राज्य में लोकसभा की सीट पर पार्टी की पहली जीत थी. उन्हें हाथोहाथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में जगह दी गई. पार्टी ने हाल ही स्थानीय निकाय चुनाव में राजधानी तिरुवनंतपुरम के निगम पर कब्जा कर लिया.

भाजपा 2026 के लिए 140 सीटों के सदन में 'जीतने लायक’ 15 सीटों का लक्ष्य लेकर चल रही है. उसके पास पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव चंद्रशेखर, वी. मुरलीधरन, और पूर्व डीजीपी आर. श्रीलेखा सरीखे कुछ भारी-भरकम उम्मीदवार भी हैं. जोर उन निर्वाचन क्षेत्रों पर है, जहां उसे 15-25 फीसद वोट मिलते हैं, जो ज्यादातर तिरुवनंतपुरम, त्रिशूर और पलक्कड़ जिलों में हैं.

यह जोर वह बड़ी हद तक इसलिए दे पा रही है क्योंकि खासकर सायरो मालाबार चर्च और केरल कैथोलिक बिशप्स काउंसिल सरीखी संस्थाओं के जरिए 18 फीसद ईसाई आबादी तक पहुंच बनाई गई है. इस पहुंच को सर्वोच्च स्तर से भी समर्थन मिला, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नवंबर में और अभी हाल ही एक बार फिर चर्च के नेताओं से मिले.

फिर भी फायदा सीमित ही रहा. ईसाई मतदाता एलडीएफ-यूडीएफ के ढांचे के भीतर ही टिके रहे, जिसे चर्च के समूहों और सामुदायिक नेताओं के सहकारी नेटवर्क और लंबे वक्त से चले आ रहे राजनैतिक गठबंधनों से और बल मिला. भाजपा की बूथ-स्तर की मशीनरी भी दोनों मोर्चों के जमीनी संगठन के मुकाबले फिसड्डी है. उस राज्य में जहां 75 फीसद से ज्यादा वोट पड़ते हैं और वोटिंग के पैटर्न भी बहुत सुव्यवस्थित हैं, संगठन की यह कमी निर्णायक हो जाती है.

पुदुच्चेरी

कभी फ्रांसीसी उपनिवेश रहे इस केंद्रशासित प्रदेश में एनडीए सरकार होने के कारण यह भगवा सियासी परिदृश्य में काफी मायने रखता है. यहां ऑल इंडिया एन.आर. कांग्रेस (एआइएनआरसी) की अगुआई में सरकार है और भाजपा उसकी दूसरी प्रमुख साझेदार. यह गठबंधन अब भी जारी है और 30 सदस्यीय विधानसभा के लिए एआइएनआरसी 16 सीटों पर तो भाजपा पिछली बार से एक ज्यादा 10 सीटों पर चुनाव लड़ रही है. बाकी चार सीटें अन्नाद्रमुक और लक्षिया जननायक काच्चि के बीच बांटी गई हैं.

यहां भी, भगवा पार्टी के लिए धीरे-धीरे बढ़त हासिल करने का मामला है. 2021 में नौ सीटों पर लड़कर छह पर फतह के साथ वह अहम खिलाड़ी के रूप में उभरी और उसने अन्नाद्रमुक को एनडीए में हाशिए पर धकेल दिया है. भाजपा ने महज कुछ साल पहले ही और वह भी अन्य दलों से आए दल-बदलुओं के सहारे यहां की सियासी मुख्यधारा में मौजूदगी दर्ज कराई थी. और फिलहाल उसका प्रभाव घटता नजर नहीं आ रहा.ठ्ठ

गढ़ तोड़ने और बढ़ने की रणनीति

भाजपा ने बेहद सुनियोजित और राज्य विशेष के हिसाब से अलग-अलग रणनीति तैयार की: बंगाल की करीने से चुस्त की गई चुनावी मशीनरी हो, असम में एक नेता की अगुआई वाला मॉडल, या फिर दक्षिण में धीरे-धीरे बढ़ते कदम

●पश्चिम बंगाल: भाजपा ने हिंदुत्ववादी बयानबाजी नरम की है, स्थानीय स्तर पर मजबूत नेटवर्क वाले उम्मीदवार उतारे हैं, और टीएमसी की कानून-व्यवस्था संबंधी नाकामियों को जोर-शोर से उठा रही है. चुनाव आयोग की वजह से मिलने वाली 'बढ़त’ भी उसके लिए फायदेमंद.

●तमिलनाडु: अकेले चुनाव लड़ने से वोट फीसद तो बढ़ा मगर सीटें नहीं मिलीं. यह समझ आने के बाद भाजपा ने अन्नाद्रमुक के साथ फिर गठबंधन किया है. फिलहाल धीरे-धीरे बढ़त बनाने की कोशिश में.

●असम: अपने व्यक्तिगत नेटवर्क और साख की वजह से मुख्यमंत्री सरमा चुनावी अभियान का मुख्य चेहरा हैं. उन्होंने मुस्लिम वोट के असर को सीमित कर दिया है और गठबंधनों को पुख्ता किया. इन वजहों से उन्हें निर्णायक जनादेश की भरपूर उम्मीद.

●केरल: 2024 में पहली लोकसभा सीट हासिल होने से पार्टी का उत्साह बढ़ा है. पार्टी अब हाइ-प्रोफाइल उक्वमीदवारों के सहारे 10-15 सीटों का लक्ष्य साध रही है मगर संगठनात्मक कमजोरी उसकी राह में बड़ी अड़चन.

●पुदुच्चेरी: 2021 में छह सीटें जीतने के साथ भाजपा एआइएनआरसी की अगुआई वाली सरकार में शामिल हुई. अब गठबंधन में अन्नाद्रमुक को हाशिए पर धकेलते हुए वह दूसरी सबसे प्रमुख साझेदार बन गई है.

सरमा का असर तमाम निर्वाचन क्षेत्रों, समुदायों और गठबंधनों में है. इसी की बदौलत भाजपा राज्य में मतदाताओं के पेचीदा समीकरणों के बीच रास्ता बना पाती है.

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