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प्रधान संपादक की कलम से

अब ईरान युद्ध एक बार फिर स्पष्ट कर रहा है कि हमें अपनी लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. चाहे हम डिग्लोबलाइजेशन की कितनी भी बात करें, दुनिया आज भी आपस में गहराई से जुड़ी हुई है

8 अप्रैल 2026 अंक
8 अप्रैल 2026 अंक
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

- अरुण पुरी

शेयर बाजार की थोड़ी-बहुत उठापटक से किसी मुगालते में न पड़ें. पश्चिम एशिया का यह युद्ध हमारे समय के सबसे बड़े ऊर्जा झटकों में से एक को लेकर आया है. इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी का मानना है कि इसका असर आगे चलकर यूक्रेन युद्ध और 1970 के दशक के तेल संकटों को भी पीछे छोड़ सकता है.

खतरा सिर्फ इसके पैमाने पर नहीं, इसकी टाइमिंग या समय में भी है. पहले समय को समझिए. दुनिया की अर्थव्यवस्था पहले से नाजुक हालत में थी. डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ जंग और मंदी के अंदेशे मौजूद थे. ऐसे में यह संकट और गहरा गया. अब भौगोलिक पहलू देखिए. दुनिया का करीब 20 फीसद तेल-गैस होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है.

यहां से भारत की 90 फीसद एलपीजी और करीब आधा कच्चा तेल आता है. युद्ध शुरू होने के एक महीने बाद भी कच्चे तेल की कीमतें युद्ध से पहले के स्तर से 50 फीसद ऊपर बनी हुई हैं.

इसका सीधा असर बाकी हर चीज पर पड़ने वाला है. दुनिया अब सिर्फ तेल ही नहीं, बल्कि खाद, जरूरी धातुओं और हीलियम जैसे अहम संसाधनों की सप्लाइ पर भी झटके का सामना कर रही है. इसका असर खेती से लेकर हाइ-टेक इंडस्ट्री तक, अर्थव्यवस्था के हर हिस्से तक फैलेगा.

1973 के तेल प्रतिबंध ने पूरी दुनिया को एक दशक तक महंगाई और ठहराव यानी स्टैगफ्लेशन में धकेल दिया था. अब विशेषज्ञों को वही खतरा फिर से दिख रहा है. भारत सरकार ने तुरंत असर को संभालने के लिए कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि आगे चलकर मांग में गिरावट और निवेश में सुस्ती देखने को मिल सकती है. 

हमारी आवरण कथा में देश की अर्थव्यवस्था से लेकर आम लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी तक का जायजा लिया गया है. सबसे पहला झटका एलपीजी पर लगा. केंद्र सरकार ने तुरंत कूटनीति, समझदारी भरे राशनिंग और कमर्शियल सप्लाइ से डायवर्जन के जरिए हालात को बड़े संकट में बदलने से रोक लिया. इसके बावजूद अफरा-तफरी पूरी तरह नहीं थमी. कई छोटे रेस्तरां और सड़क किनारे खाने-पीने की दुकानें बंद हो गईं.

पाइप्ड नेचुरल गैस के मामले में भारत की स्थिति थोड़ी बेहतर है, लेकिन इसकी पहुंच अभी सिर्फ 1.65 करोड़ कनेक्शन तक है, जबकि एलपीजी करीब 33 करोड़ घरों तक पहुंचता है. पेट्रोलियम का रणनीतिक‌ रिजर्व अब भी 90 दिन के वैश्विक मानक से नीचे है. फिलहाल राहत की बात यह है कि ईंधन की कीमतों को वैश्विक उतार-चढ़ाव से कुछ हद तक बचाकर रखा गया है.

तेल कंपनियों ने वित्त वर्ष 23 के बाद से करीब 2 लाख करोड़ रुपए का अतिरिक्त मुनाफा कमाया है. यानी उनके पास इस झटके को कुछ समय तक झेलने की क्षमता है. लेकिन अगर युद्ध लंबा चला, तो यह सुरक्षा जल्दी खत्म हो जाएगी. और भले ही युद्ध जल्दी खत्म हो जाए, इसका असर सिस्टम में घुस चुका है और लंबे समय तक बना रह सकता है.

इस संकट का असली सबक इसके दूसरे असर में छिपा है. मान लीजिए शिपिंग रूट पूरी तरह खुल भी जाएं, तब भी बीमा की बढ़ी हुई लागत फ्रेट चार्ज को महंगा रखेगी. ऐसे में निर्यात और महंगा होगा, जबकि दुनिया में पहले ही मांग कमजोर है. यूएई भारत के लिए 39 अरब डॉलर का बड़ा निर्यात बाजार है. वहां करीब 7,000 तरह के उत्पाद जाते हैं. इसके अलावा वह एक अहम रि-एक्सपोर्ट हब भी है. उड्डयन क्षेत्र पर भी दबाव साफ दिख रहा है.

जेट ईंधन महंगा हो गया है, बीमा खर्च बढ़ गया है और फ्लाइट्स को लंबा रूट लेना पड़ रहा है. हॉस्पिटैलिटी सेक्टर भी इससे अछूता नहीं है. विदेशी पर्यटकों की संख्या में 50 फीसद तक गिरावट का अनुमान है. इंडस्ट्री अब घरेलू मांग पर टिकने की उम्मीद कर रही है, लेकिन वह भी दबाव में कमजोर पड़ सकती है. एक और बड़ा झटका खाड़ी देशों में काम कर रहे करीब 1 करोड़ भारतीयों से जुड़ा है. अगर युद्ध लंबा चला तो उन्हें वापस लौटना पड़ सकता है. इससे हर साल आने वाले करीब 50 अरब डॉलर के रेमिटेंस पर खतरा मंडरा सकता है.

इसका असर आम लोगों की जिंदगी के कई छोटे-छोटे हिस्सों में दिखेगा. हेल्थकेयर इसका एक बड़ा उदाहरण है. दवाइयों की एक पूरी शृंखला पेट्रोलियम से बनने वाले तत्वों पर निर्भर है: एस्पिरिन, पैरासिटामोल से लेकर डायबिटीज की बेसिक दवा मेटफॉर्मिन तक. थोक दवाइयों की कीमतें पहले ही 10-15 फीसद तक बढ़ चुकी हैं. इसमें प्लास्टिक सिरिंज, आइवी बैग और डिस्पोजेबल ग्लव्ज जैसे जरूरी सामान शामिल ही नहीं हैं.

हीलियम, जो गैस निकालने की प्रक्रिया का एक उप-उत्पाद है, एमआरआइ मशीनों के मैग्नेट को ठंडा रखने के लिए जरूरी होता है. इसके अलावा यह चिप बनाने, फाइबर-ऑप्टिक्स, स्पेस और साइंस रिसर्च में भी अहम भूमिका निभाता है. इसका असर भारत के सेमीकंडक्टर मिशन पर भी पड़ सकता है.

भारत के बफर स्टॉक्स ने फिलहाल खाने-पीने की महंगाई के खतरे को कुछ हद तक टाल दिया है, लेकिन यह राहत ज्यादा लंबी नहीं रह सकती. वैश्विक स्तर पर खाद की कीमतें 30-40 फीसद तक बढ़ चुकी हैं और भारत अपनी 70 फीसद से ज्यादा यूरिया जरूरत पश्चिम एशिया से पूरी करता है. असली चुनौती जून-जुलाई में सामने आ सकती है, जब खरीफ बुआई के लिए मांग चरम पर होती है.

खेतों से दूर, इस युद्ध ने शेयर बाजारों में पहले ही उथल-पुथल मचा दी है. 23 मार्च तक बीएसई में लिस्टेड कंपनियों का मार्केट कैप 48.3 लाख करोड़ रुपए यानी करीब 10.4 फीसद तक घट चुका है. मैक्रो इकोनॉमिक स्तर पर देखें तो भारत एक बड़े फिस्कल स्ट्रेस टेस्ट का सामना कर रहा है. बजट के अनुमान में करीब 1 लाख करोड़ रुपए तक का अंतर आ सकता है.

अमेरिका-इज्राएल और ईरान के बीच कभी न कभी समझौता हो सकता है, लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार का युद्ध जैसी तैयारी के साथ प्रतिक्रिया देना सही दिशा में कदम है. कोविड के अनुभव से सीख लेते हुए, सरकार ने अलग-अलग मंत्रालयों के उच्च स्तर के समूह सक्रिय कर दिए हैं, ताकि संकट से संगठित तरीके से निबटा जा सके.

मुसीबत की घड़ी में अक्सर अवसर छिपा होता है. ट्रंप के टैरिफ ने मजबूर किया कि हम नए बाजार तलाशें, ट्रेड डील करें और अपनी अर्थव्यवस्था को खोलें. इसी के साथ सरकार को कई ऐसे बोझिल नियम और प्रक्रियाएं भी ढीली करनी पड़ीं, जो हमें वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पीछे रखती थीं.

अब ईरान युद्ध एक बार फिर स्पष्ट कर रहा है कि हमें अपनी लंबी अवधि की ऊर्जा सुरक्षा पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. चाहे हम डिग्लोबलाइजेशन की कितनी भी बात करें, दुनिया आज भी आपस में गहराई से जुड़ी हुई है. यह भी साफ हो गया है कि कहीं दूर का संघर्ष कितनी तेजी से हर भारतीय के घर तक असर डाल सकता है.

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