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वर्चस्व पर नया कानून

केंद्रीय गृह मंत्रालय का नया प्रस्ताव केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में आइपीएस की पकड़ मजबूत करने की बात करता है, जिससे प्रमोशन और नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद और बढ़ सकता है

नवंबर 2025 में गुजरात के भुज में बीएसएफ के डायमंड जुबली समारोह में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह
अपडेटेड 7 अप्रैल , 2026

प्रमोशन और वरिष्ठ पदों से जुड़े नियम लंबे समय से आइपीएस और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों के बीच तनाव की वजह रहे हैं. अब केंद्रीय गृह मंत्रालय, जो दोनों का नियंत्रण करता है, इस व्यवस्था को कानून के जरिए औपचारिक रूप देना चाहता है.

प्रस्तावित केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) विधेयक 2026 पूरे सीएपीएफ के कर्मियों के प्रबंधन का कानूनी ढांचा तैयार करेगा. इसमें वरिष्ठ कमान पदों पर आइपीएस अधिकारियों की व्यापक मौजूदगी की संहिता बनाई गई है.

इससे सीएपीएफ के काडर अधिकारियों के बीच करियर में ठहराव की चिंता फिर उभर आई है. सुप्रीम कोर्ट ने मई 2025 में तस्दीक की थी कि सीएपीएफ के अधिकारी संगठित समूह 'ए' सेवाओं का हिस्सा हैं और वे ऐसी ही अन्य सेवाओं के साथ समानता के हकदार हैं. उसने सरकार को अगले दो साल में इंस्पेक्टर जनरल (आइजी) स्तर पर आइपीएस अफसरों की मौजूदगी को कम करने का निर्देश भी दिया. लेकिन यह विधेयक दूसरी ही दिशा में जा रहा है.

असिस्टेंट कमांडेंट (एसी) के पद पर भर्ती होने वाले सीएपीएफ के अधिकारी लंबे समय से कहते आ रहे हैं कि उनकी करियर प्रगति जल्द ही रुक जाती है क्योंकि प्रमुख वरिष्ठ पद—डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल (डीआइजी), इंस्पेक्टर जनरल (आइजी) और एडिशनल डायरेक्टर जनरल (एडीजी)—प्रतिनियुक्ति पर आए आइपीएस अधिकारियों से भर दिए जाते हैं. आइपीएस अधिकारी केंद्रीय लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की सिविल सेवा परीक्षा के जरिए भर्ती किए जाते हैं, वहीं सीएपीएफ के अधिकारी यूपीएससी की ही एक अलग प्रक्रिया के जरिए सेवा में दाखिल होते हैं.

सभी प्रमुख पांचों बलों—केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ), सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ), इंडो-तिब्बतन सीमा पुलिस (आइटीबीपी), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (सीआइएसएफ) और सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी)—में करीब 13,000 अधिकारी हैं.

आइपीएस अधिकारियों के लिए फिलहाल डीआइजी के पदों में करीब 20 फीसद और आइजी के पदों में करीब 50 फीसद कोटा है. यह विधेयक इस ढांचे को औपचारिक दर्जा देता है, जिसमें आइजी के 50 फीसद पद और एडीजी के 67 फीसद पद आइपीएस अधिकारियों के लिए तय किए गए हैं, जबकि डीआइजी के स्तर के पदों के मामले में विधेयक खामोश है. यहीं सीएपीएफ के अधिकारियों के लिए कुछ गुंजाइश बचती है.

पदों में असमानता
सीआरपीएफ के एसी अपनी पहली पदोन्नति के लिए आम तौर पर 15-16 साल इंतजार करते हैं; बीएसएफ में यह इंतजार करीब 12-13 साल है. वहीं आइपीएस कहीं ज्यादा तेजी से आगे बढ़ते हैं. वे एक समकक्ष पद पर आमतौर पर करीब दो साल बिताते हैं और मोटे तौर पर 18 साल में आइजी के स्तर पर पहुंच जाते हैं—यह वह स्तर है जो सीएपीएफ के अधिकारी कभी हासिल नहीं कर पाते.

बीएसएफ के सेवानिवृत्त एडीजी संजीव सूद कहते हैं, ''आइपीएस अफसरों के खिलाफ कोई निजी खुन्नस नहीं है और सिविलियन पुलिसिंग के अपने अधिकार क्षेत्र में उन्हें महारत है.'' सूद अपने को खुशकिस्मत मानते हैं कि वे बल में दूसरे सर्वोच्च पद तक पहुंच सके.

वे कहते हैं, ''सीएपीएफ विद्रोह-विरोधी कार्रवाईयां या सरहदों की रखवाली करते हुए सेना से मिलते-जुलते कामों को अंजाम देते हैं.'' वे पदोन्नति से इनकार को 'घोर अनुचित' बताते हुए कहते हैं कि यह मुद्दा तनख्वाह से कहीं आगे का है. वे कहते हैं, ''एसी मुश्किल हालात में अपनी सेवाएं दे रहे हैं; कई तो अपनी जान भी गंवा चुके हैं.''

सूद बताते हैं कि संगठित समूह 'ए' में 60 से ज्यादा सेवाएं हैं, सीएपीएफ अधिकारियों को अपने करियर में समकक्ष बढ़ोतरी हासिल करने में लगातार रुकावटों का सामना करना पड़ा है. सरकार ने नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेड के जरिए ठहराव की परेशानी को दूर किया है, लेकिन पदों के मूल ढांचे में कोई बदलाव नहीं किया गया.

दूसरी तरफ आइपीएस अधिकारी इसे प्रशासनिक जरूरत का मुद्दा बताते हैं. उनका कहना है कि सीएपीएफ में वरिष्ठ भूमिकाओं के लिए ऐसे अनुभव की जरूरत होती है जो बल के प्रबंधन से आगे जाता है, खासकर जब ये इकाइयां नागरिक व्यवस्थाओं में काम करती हैं. चार सीएपीएफ में डीजी के पद पर काम कर चुके सुजॉय थाओसेन कहते हैं, ''सरकार का आकलन सही है.

आइपीएस अधिकारी न केवल बल के सदस्यों को, बल्कि आम जनता को भी संभालने में ज्यादा सक्षम होते हैं.'' अन्य लोग जमीनी स्तर पर तालमेल से जुड़ी चुनौतियों की तरफ इशारा करते हैं.

पूर्व आइपीएस अधिकारी और मॉरिशस के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार शांतनु मुखर्जी कहते हैं, ''पुलिस अधीक्षक, जिला मजिस्ट्रेट और दूसरे अधिकारियों के बीच तालमेल सुनिश्चित करने के लिए आइपीएस अधिकारी बेहतर होते हैं.'' हालांकि वे यह भी कहते हैं कि मंत्रालय को ''सीएपीएफ अधिकारियों की पदोन्नति सुनिश्चित करनी चाहिए. इसके लिए ज्यादा पद बनाए जा सकते हैं.''

सांस्थानिक टकराव
सीएपीएफ के अधिकारियों ने 2012 में दिल्ली हाइकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और दलील दी कि उनके करियर में धीमी प्रगति की मुख्य वजह यह है कि वरिष्ठ पद प्रतिनियुक्ति पर आए आइपीएस अधिकारियों से भरे जा रहे हैं. हाइकोर्ट ने उनके दावे को सही माना. केंद्र ने फैसले को चुनौती दी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने सीएपीएफ अधिकारियों के पक्ष में फैसला दिया.

हालांकि सरकार ने 'छत्र कानून' का बचाव करते हुए कहा कि यह बार-बार होने वाले मुकदमों को खत्म करने की कोशिश है. विधेयक में सीएपीएफ की दोहरी भूमिका पर भी जोर दिया गया है, जो सरहदों की देखभाल और विद्रोह-विरोधी कार्रवाइयों से लेकर युद्ध के समय सशस्त्र बलों की सहायता करने तक फैली है, लेकिन साथ ही यह भी कहा गया है कि आइपीएस ऐतिहासिक रूप से उनके नेतृत्व के ढांचे का हिस्सा रहे हैं.

यह मुद्दा अब राजनैतिक अखाड़े में भी आ गया है. लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी 16 मार्च को सीआरपीएफ के मेस गए जहां उन्होंने सीआरपीएफ की कमांडो बटालियन फॉर रिसॉल्यूट ऐक्शन (सीओबीआरए या कोबरा) में तैनात एसी अजय मलिक से मुलाकात की, जो झारखंड में एक आइईडी धमाके में अपना पैर गंवा बैठे थे. गांधी ने मलिक को भरोसा दिलाया कि वे सीएपीएफ अधिकारियों की पदोन्नतियों का मुद्दा उठाएंगे.

सरकार के लिए इस विधेयक को पारित करवाना शायद आसान न हो. जानकारों के मुताबिक, इसे प्रवर समिति में भेजा जा सकता है, जहां सीएपीएफ अधिकारी अपनी बात पुरजोर ढंग से रख सकते हैं. कानूनी विकल्प भी खुले हैं. संख्याबल सीएपीएफ के पक्ष में है, तो ताकत आइपीएस के साथ, ऐसे में सरकार को दो खूंटियों से बंधी नाजुक रस्सी पर चलना होगा. 

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