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संपादकों की मास्टरक्लास

हर स्टोरी को तीन कसौटियों पर खरा उतरना होता है: अभी क्यों, इसे पढ़ेगा कौन, और आगे क्या. हमारा काम यह सवाल करना है कि क्या स्टोरी लुटियंस सर्कल से बाहर निकलती है और देशभर के पाठकों के लिए उसका कोई मायने है?

इंडिया टुडे के नए और पुराने संपादक (बाएं से क्रमश:) कावेरी बामजई, प्रभु चावला, टी.एन. नैनन, अरुण पुरी, राज चेंगप्पा, शेखर गुप्ता और स्वपन दासगुप्ता
अपडेटेड 3 अप्रैल , 2026

इंडिया टुडे के 50 वर्ष: इंडिया टुडे के नए-पुराने दिग्गजों की न्यूज मीटिंग   

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव का यह सत्र किसी चर्चा से ज्यादा एक थिएटर और टाइम कैप्सूल जैसा था. पत्रिका के 50 साल के सफर को आकार देने वाले सात दिग्गज संपादक एक मंच पर जुटे और मार्च 2026 की खबरों को आधार बनाकर इंडिया टुडे की मशहूर एडिटोरियल मीटिंग को फिर से जिया. जो हुआ, वह एक साधारण पैनल डिस्कशन नहीं था, बल्कि न्यूजमैगजीन जर्नलिज्म की असली कला की झलक थी.

कैसे हफ्ते भर की अफरातफरी को एक असरदार कवर स्टोरी में बदला जाता है. पृष्ठभूमि में था पश्चिम एशिया का युद्ध, जो अब उस मोड़ पर पहुंच चुका था जहां उसकी मार भारतीय घरों तक महसूस होने लगी थी—तेल और गैस की बढ़ती कीमतों के रूप में. पत्रिका के संस्थापक और 1975 से अब तक 2,000 से ज्यादा आवरण कथाएं तय करने संबंधी फैसलों की अगुआई करने वाले अरुण पुरी ने यहां भी वही मूल मंत्र दोहराया जो वे हमेशा से अपनाते आए थे: ''अभी क्यों? कौन पढ़ेगा इसको? आगे क्या?''

उनका कहना था कि कोई भी कहानी सिर्फ साउथ ब्लॉक की दीवारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. उसे उन लोगों तक पहुंचना चाहिए, जो कभी किसी एडिटोरियल मीटिंग का हिस्सा नहीं बनेंगे—यानी आम पाठक.

द प्रिंट के संस्थापक-संपादक शेखर गुप्ता ने जमीनी रिपोर्टिंग की अहमियत पर जोर दिया. उनका साफ कहना था कि भरोसेमंद पत्रकारिता दूर बैठकर नहीं हो सकती. संघर्षरत क्षेत्रों में रिपोर्टर भेजना ही वह चीज रही है जिसने इंडिया टुडे को हमेशा बढ़त दिलाई. वहीं न्यू इंडियन एक्सप्रेस के एडिटोरियल डायरेक्टर प्रभु चावला और बिजनेस स्टैंडर्ड के पूर्व संपादक टी.एन. नैनन ने इस बात पर जोर दिया कि पाठक की सबसे बड़ी चिंता आर्थिक असर को लेकर ही रहती है—खासतौर पर ईंधन की बढ़ती कीमतें और संभावित ऊर्जा संकट.

पूर्व संपादक कावेरी बामजई ने एक अलग राय रखी. उनका कहना था कि कवर स्टोरी के लिए ब्लॉकबस्टर फिल्म सीक्वल धुरंधर: द रिवेंज को चुना जाना चाहिए. उनके मुताबिक जब हकीकत पाठकों पर हावी हो जाती है, तो संस्कृति और सिनेमा उस दौर को समझने का एक अलग रास्ता देते हैं. भाजपा के विचारक स्वपन दासगुप्ता ने चेताया कि पॉडकास्ट और सोशल मीडिया के दौर में मैगजीन को ऐसा भारतीय नजरिया देना होगा, जो पश्चिमी मीडिया नहीं दे पाता.

मौजूदा संपादक राज चेंगप्पा ने दायरा और बढ़ाया. उन्होंने कई संभावित एंगल सुझाए—ईरान के अंदर से रिपोर्ट, युद्ध में तकनीक का बदलता स्वरूप, इससे पैदा हुआ ऊर्जा संकट और ट्रंप की वैश्विक रणनीति के व्यापक असर. उनका कहना था कि मैगजीन जर्नलिज्म को सिर्फ हेडलाइन खबरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि गहरे ट्रेंड्स को पकड़ना चाहिए.

अंतिम फैसला अरुण पुरी ने सुनाया—सटीक और संक्षेप में. अगर कोई रिपोर्टर तेहरान पहुंच सकता है, तो वही कवर स्टोरी होगी क्योंकि बमबारी झेलते शहर की आवाज, गंध और मानवीय अनुभव को उससे बेहतर कोई नहीं बता सकता. यह संभव न हो तो दूसरा विकल्प होगा—इस युद्ध का आम भारतीयों पर पड़ने वाला आर्थिक असर.

पूरे सत्र के दौरान संपादकों ने ऐसे किस्से साझा किए, जो इंडिया टुडे की असली कार्यसंस्कृति को दिखाते हैं—जहां एक अच्छी स्टोरी के लिए खर्च की परवाह नहीं होती, जहां रिपोर्टर योग्यता के आधार पर असाइनमेंट के लिए मुकाबला करते हैं, और जहां प्रधान संपादक का फैसला अंतिम होता है, लेकिन अगली सुबह एक बेहतर तर्क उसे बदल भी सकता है.

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