scorecardresearch

यह दौर है व्यक्ति केंद्रित तंत्र का

इंडिया टुडे समूह की वाइस चेयरपर्सन और कार्यकारी प्रधान संपादक कली पुरी, ने कहा कि लोकतंत्र और न्यूजरूम तब मजबूत होते हैं, जब वे विवादित व्यक्तियों के सामने चुप्पी साध लेने के बजाय उनसे सवाल करते हैं और उन्हें चुनौती देते हैं

कली पुरी, वाइस चेयरपर्सन और कार्यकारी प्रधान संपादक, इंडिया टुडे समूह
अपडेटेड 3 अप्रैल , 2026

कली पुरी 

पिछले साल मैंने एक ऐसी दुनिया की बात की थी, जो लगातार बदल रही थी और दम भी दिखा रही थी. आज लगता है, वह बदलाव और दिखावा कई गुना बढ़ गया है. विश्व व्यवस्था तेजी से बिखर रही है और वैश्विक व्यापार की जैसे किसी ने गर्दन दबोच ली है.

युद्ध की रणनीति पल-पल बदल रही है और हम हक्का-बक्का होकर बस ताक रहे हैं. सीमाएं. मर्यादा. सुरक्षा. नैतिकता. युद्ध के नियम. अच्छाई की ताकत. शांति और समृद्धि की चमक. जिन चीजों को हम अब तक किसी भी समझौते से परे मानते आए थे, एकाएक उनका मोलभाव होने लगा है.

धर्मतंत्र और मोनार्की/राजतंत्र ने हमेशा परदे के पीछे से सत्ता पर पूर्ण नियंत्रण रखा है. लेकिन अब जिस पर हमला हो रहा है, वह इस सदी की सबसे प्रतिष्ठित राजनैतिक व्यवस्था यानी खुद लोकतंत्र है. उसकी संस्थाएं अपने ही नेताओं की विशालकाय शख्सियत को संभाल नहीं पा रहीं. लोकतांत्रिक नेतृत्व जिस ‌तरह के अंकुश और जिस मर्यादा के साथ संतुलन साधते हुए चलता था, वह सारा ढांचा ही ध्वस्त हो गया है.

अब हमारे सामने एक नई स्थिति है, जिसे मैं पर्सोनाक्रेसी (व्यक्ति केंद्रित तंत्र) कह रही हूं. ऐसा लोकतंत्र जो एक शख्सियत के इर्द-गिर्द घूमता है. अब मालूम होता है कि लोकतंत्र भी संपूर्ण सत्ता को वैधता प्रदान कर सकते हैं. कुछ लोग कह सकते हैं कि यह आज के वक्त की जरूरत है.

इस युद्ध की शुरुआत से ठीक पहले, शनिवार 28 फरवरी को, हम तेहरान से लौटे थे. हम वहां ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची का एक्सक्लूसिव इंटरव्यू करने गए थे, जो आज घर-घर में जाना-पहचाना नाम हैं. एक हॉल में उन्होंने हमें इंटरव्यू दिया और फिर जेनेवा में शांति वार्ता के लिए रवाना हो गए. हमारी फ्लाइट एक दिन बाद थी, सो हमने तेहरान की सड़कों पर थोड़ा वक्त बिताया. ईरान को करीब से देखने की खिड़की दुनिया के लिए काफी हद तक बंद रही है, इसलिए हमारी जिज्ञासा स्वाभाविक थी.

एक शहर, जो रमजान की पाक लय में गति कर रहा था. अपने ऊपर बरसने जा रही आफत का उसे जरा भी अंदाजा न था. तेहरान पोस्टकार्ड पर छपने वाले चित्रों-सा खूबसूरत या ऐतिहासिक शहर नहीं है. असल खूबसूरती हैं उसके लोग. गर्मजोशी और शायरी से लबरेज. हमारे सवालों का जवाब भी वे किस्सों और शेर-ओ-शायरी से देते थे.

मुमकिन है, आपको मैं किसी एक पक्ष में खड़ी दिखूं. हां, हूं. वह जो हम सबका पक्ष है. इंसानियत का पक्ष. हर इंसान का पक्ष. हमारी मेधा का पक्ष. उस हल्की-सी मुस्कान का पक्ष, जो कमरे को रौशन कर देती है. साफ नीले आसमान का पक्ष. उन मकानों का पक्ष, जो घर बनते हैं. उस प्रेम का पक्ष, जो परिवार को बांधे रखता है. उन फूलों का पक्ष, जो खिलते हैं. उन दुआओं का पक्ष, जो कुबूल होती हैं. उन लोगों का पक्ष, जिन्होंने सब कुछ टूटने के बाद भी उम्मीद न छोड़ी. उन अदृश्य धागों का पक्ष, जो हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं. या यूं कहें, हमें जोड़कर रखने चाहिए.

इस युद्ध के कई सच और कई पक्ष हैं और हमारी कोशिश है कि हम आपके सामने अलग-अलग नजरिया रखें. हमने 10 देशों के राजनयिकों को न्योता, ताकि आप समुचित-संतुलित राय बना सकें. सच तो यह है कि कॉन्क्लेव और न्यूजरूम में हमारी कोशिश हमेशा यही रही है. हर कोई हमारे मेहमानों की सूची से सहमत नहीं होता. हमने यासीन मलिक को बुलाया तो एक वैचारिक तबके को ऐतराज हुआ. हमने सलमान रुश्दी को बुलाया तो कांग्रेस को दिक्कत हुई. हमने दलाई लामा को बुलाया तो चीन को आपत्ति हुई. इस साल भी कुछ तबकों ने हमारे वक्ताओं के चयन पर सवाल उठाए हैं.

पर हमारा मानना है कि लोकतंत्र और न्यूजरूम विवादित शख्सियतों के सामने चुप्पी साधने से नहीं बल्कि उन्हें चुनौती देने, उनके विचारों को कसौटी पर कसने से मजबूत होते हैं. कठिन संवादों से हम पीछे नहीं हटते. हम मानते हैं कि रास्ता बहिष्कार में नहीं, संवाद से निकलता है. हममें से ज्यादा लोग ऐसा सोचते, तो शायद युद्ध से बचा जा सकता था.

कितने ही देश इस थोपे गए युद्ध के जख्मों से लहूलुहान हैं और अपने यहां मारे गए लोगों की गिनती कर रहे हैं. हर कोई अपने यहां बस गिनती ही कर रहा है. पर युद्ध को भला राष्ट्रीयताओं की क्या परवाह! वह सब कुछ मलबे में तब्दील किए दे रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अक्सर कहते हैं एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भ‌विष्य. बाकियों को भी अब इस बात पर ध्यान देना चाहिए.

पिछले कुछेक हफ्तों में हमारी यह नाजुक धरती दूसरे विश्व युद्ध में गिराए एटम बमों की तुलना में तीन गुना विस्फोटक आघात झेल चुकी है. आधुनिक दौर के इतिहासकार युवाल नोआ हरारी चेताते हैं, ''मुमकिन है हम पहले ही तीसरे विश्व युद्ध के बीच खड़े हों और हमें अभी इसका एहसास ही न हो.

अगर आप मई 1941 में लोगों से पूछते, तो शायद वे यह नहीं कहते कि वे दूसरे विश्व युद्ध के बीच जी रहे हैं. पीछे मुड़कर देखने पर ही हमें समझ आता है.'' उसी दृष्टि से इतिहास ईरान युद्ध को या तो इस रूप में देखेगा जिसने पूरी इंसानियत को खतरनाक ताकतों, दमन और एटमी विनाश से बचाया या फिर तीसरे विश्व युद्ध के तौर पर.

मैं अपनी बात मशहूर शायर महमूद दरवेश की पंक्तियों से खत्म करना चाहती हूं. ''युद्ध समाप्त हो जाएगा. नेता फिर हाथ मिलाएंगे. एक बूढ़ी मां अपने शहीद बेटे का इंतजार करती रह जाएगी. एक लड़की करेगी इंतजार अपने प्रिय पति का. बच्चे अपने बहादुर पिता की प्रतीक्षा करेंगे. मुझे नहीं पता किसने वतन का सौदा किया. लेकिन मैं जानता हूं कि इसकी कीमत किसने चुकाई.''

इस तरह के विचार के साथ हम इंडिया टुडे कॉन्क्लेव 2026 का समापन करते हैं. पर अंतत: हम उसी का उत्सव मनाते हैं, जो हमारे पास है. यह पल. और यह पल हमारी वजह से जिंदा है. इसलिए हमें इसे पूरी तरह जीकर इसका सम्मान करना चाहिए.

लोकतंत्र और न्यूजरूम तब मजबूत होते हैं, जब वे विवादित व्यक्तियों के सामने चुप्पी साध लेने के बजाय उनसे सवाल करते हैं और उन्हें चुनौती देते हैं.

कितने ही देश इस थोपे गए युद्ध के जख्मों से लहूलुहान हैं और अपने यहां यूं ही मार दिए गए लोगों की गिनती कर रहे हैं. इसके बावजूद इस युद्ध को कौन-सी राष्ट्रीयताओं की परवाह है! यह सब कुछ मलबे में तब्दील किए दे रहा है.

Advertisement
Advertisement