ईरान संघर्ष, यूक्रेन युद्ध और ट्रंप सरकार की डगमग नीतियों को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच भारत में जर्मनी, इटली और स्पेन के राजदूतों ने एक ऐसे यूरोप की तस्वीर सामने रखी जो अब अमेरिका के रणनीतिक बयानों पर पूरी तरह निर्भर नहीं. जर्मनी के राजदूत फिलिप एकरमैन ने कहा, ''यूरोप को युद्ध का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है क्योंकि ऊर्जा संकट हमारी अर्थव्यवस्थाओं को धीमा कर देगा.''
उन्होंने बताया कि ईरान को एटमी हथियार बनाने से रोकने के लिए बड़ी योजनाएं तैयार थीं. उन्होंने चिंता जताई कि अब रूस-यूक्रेन युद्ध से ध्यान हट रहा है, जबकि यूरोप के लिए अब भी सुरक्षा के लिए यह मुख्य चुनौती है. उनके मुताबिक, जर्मनी एटमी प्रसार का विरोधी है लेकिन सैन्य कार्रवाई की जगह बातचीत को प्राथमिकता देता है.
वह रूसी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंधों में ढील का भी विरोध करता है क्योंकि इससे यूक्रेन संघर्ष लंबा खिंच सकता है. हालांकि, तेल की बढ़ती कीमतें नुक्सान पहुंचा रही हैं लेकिन एकरमैन ने जोर देकर कहा, ''जर्मनी न तो रूसी तेल खरीदता है और न ही खरीदेगा.'' यह स्पष्ट नहीं है कि युद्ध का अंत कैसे होगा और सार्थक कूटनीतिक प्रयास मुश्किल हो रहा है, यह तीनों राजदूतों की प्रमुख चिंता रही.
इतालवी राजदूत एंटोनियो बर्टोली ने तीनों पक्षों की एक और साझा चिंता व्यक्त की. उन्होंने कहा, ''वैश्विक संगठन कमजोर हो रहे हैं.'' नाटो के जरिए अमेरिका के साथ अपने गहरे संबंधों को रेखांकित करते हुए बर्टोली ने मौजूदा स्थिति को ''यूरोपीय रणनीतिक स्वायत्तता के लिए चेतावनी'' बताया. उन्होंने बढ़ती मुद्रास्फीति, ऊर्जा असुरक्षा और आर्थिक मंदी जैसे गंभीर नतीजों की ओर ध्यान दिलाते हुए बताया कि इटली ने अपनी भूमिका को खाड़ी क्षेत्र में रक्षात्मक तैनाती और मानवीय प्रयासों तक ही सीमित रखा है.
स्पेन के राजदूत जुआं एंटोनियो मार्च पुजोल ने संयुक्त राष्ट्र जैसी बहुपक्षीय संस्थाओं की मजबूती की जरूरत पर जोर दिया ताकि ''शांति और विकास के लिए संघर्ष किया जा सके.'' उन्होंने आगाह किया कि निरंतर टकराव पर अड़े रहना लंबे समय तक अस्थिरता की ओर ले जा सकता है. उन्होंने युद्ध को लेकर नई पीढ़ी की मानसिकता को रेखांकित कर कहा, ''युवा पीढ़ी में कोई भी युद्ध के पक्ष में नहीं.'' स्पेन ने प्रतिस्पर्धा के बजाए वैश्विक सहयोग का आह्वान किया और एक अस्थिर दुनिया में शांति स्थापना को जरूरी प्राथमिकता बताया.
शांति की अपील के अलावा चर्चा में यह बात भी सामने आई कि इस संघर्ष तो रोकने में यूरोप की सीधी पकड़ या प्रभाव सीमित है जबकि वह ईरान समेत सभी प्रमुख पक्षों से बातचीत कर रहा है. एकरमैन ने कहा भी, ''पश्चिम एशिया के इस घटनाक्रम में मुझे यूरोपीय प्रभाव बहुत नहीं दिखता. हमारे पास इस युद्ध पर किसी तरह का असर डालने का कोई बड़ा साधन नहीं है.'' हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यूरोपीय देश पश्चिम एशिया के सभी देशों से बात करते हैं और 'अमेरिकियों से भी बात करते हैं ताकि जान सकें कि युद्ध किस दिशा में जा रहा है.''
ऐसा संघर्ष जो वैश्विक व्यापार को बाधित कर सकता है, उसमें भारत की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर एकरमैन ने कहा कि यूरोपीय देश और भारत की स्थिति एक जैसी है. ऊर्जा आपूर्ति में बाधा से दोनों को भारी नुक्सान का अंदेशा है, जबकि अमेरिका, इज्राएल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ उनके अच्छे संबंध भी हैं. उनकी राय में, भारत ऐसी स्थिति में है जहां वह अमेरिका से ज्यादा स्पष्टता और तर्क के साथ बात कर सकता है. पुजोल के शब्दों में कहें तो ''भारत को सद्भाव और समावेशिता के पक्ष में दुनिया का अगुआ बनना चाहिए.''

