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छवियों का नाजुक हस्तक्षेप

कई स्तरों से गुजरने के बाद चार सौ से ज्यादा नाटकों में से छनकर निकले दस. इस बार इनमें से पांच का हिंदी-हिंदुस्तानी भाषा परिवार का होना सुखद आश्चर्य.

Leisure: Theatre/Meta Festival
अतुल कुमार निर्देशित, डी फॉर ड्रामा ग्रुप के नाटक अंबा का एक दृश्य
अपडेटेड 2 अप्रैल , 2026

अब यह थिएटर की सालाना रस्म-सी बन गई है. जनवरी-फरवरी की सर्द-कुनमुनाती दिल्ली में भारत रंग महोत्सव (भारंगम) के तले 20-25 दिन अच्छे-बुरे-औसत नाटक, उन पर चर्चा-चर्खा; और फिर कुछेक पखवाड़े के फासले पर धीरे-धीरे चढ़ती गर्मी के बीच देश भर के दस चुनिंदा नाटकों का मेटा यानी महिंद्रा एक्सिलेंस इन थिएटर अवार्ड्स फेस्टिवल.

एक सरकारी (राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय का) और दूसरा निजी (महिंद्रा कंपनी का). राजधानी के कमानी और श्रीराम सेंटर सभागारों में इसकी तारीखें हैं 19 से 24 मार्च. दो-तीन साल की लिखाई और तैयारी के बाद सामने आए मिथ्यासुर की प्रासंगिकता देखिए जरा: एक राजा को सपनों में आकर राक्षसराज कुंभ कोई भी बड़े फैसले लेने में मदद करते हैं.

पर अभी राज्य ईस्ट इंडिया कंपनी से युद्ध की ड्योढ़ी पर खड़ा है लेकिन वे राजा को सपने में आ ही नहीं रहे. वह क्या करे? विवेकी रानी का तर्क है कि ऐसे अहम फैसले स्वप्न के आसरे नहीं छोड़े जा सकते; और स्वप्न राजा का अवचेतन ही है. प्रणय पांडेय के लिखे और अजीत सिंह पालावत निर्देशित मिथ्यासुर समेत मेटा-2026 का हर नाटक अपनी कथावस्तु, शैली और शिल्प में कुछ अनूठापन लिए हुए है.

संयोगवश इसके चार नाटक इस बार के भारंगम का भी हिस्सा थे: दोस्तोएवस्की की कथा ह्वाइट नाइट्स पर आधारित भव्य चांदनी रातें (निर्देशन: पूर्वा नरेश/हिंदी), केरल कलामंडलम की प्रस्तुति दि ओल्ड मैन ऐंड द सी: कथकली ऑफ द मॉरो (नीरज जीएम/मलयालम-संस्कृत), चार मोनोलॉग वाला समथिंग लाइक ट्रुथ (पर्णा पेठे/हिंदी-अंग्रेजी) और टैगोर तथा उनकी भाभी के बीच संवाद-संबंध पर केंद्रित कादंबरी (मेघना रॉयचौधरी/हिंदी-बांग्ला).

इसमें मशहूर रंगकर्मी अतुल कुमार निर्देशित अंबा  को भी जोड़ दें तो मेटा मंच पर यह दुर्लभ अवसर है जब पांच हिंदी-हिंदुस्तानी नाटक इसमें जगह बना पाए हैं. हालांकि इन्हें खेलने वाले ज्यादातर ग्रुप मुंबई के लेकिन हिंदी पट्टी से गए रंगकर्मियों के ही हैं.

शास्त्रीय, लोक और आनुष्ठानिक छटाओं को मंच पर पिरोने वाले केरल के साहसी प्रयोगधर्मियों का हमेशा की तरह दबदबा कायम है. कथकली... के साथ कोल्लम के रेमित रमेश का वाइ और पलक्कड के दिग्गज ओ.टी. शाजहां का धूमि किता किता धूमि फेस्टिवल का हिस्सा हैं.

वाइ में जहां विशुद्ध जिबरिश में इंसानी पीड़ा और जज्बात का बयान है तो धूमि में शूर्पणखा बिना किसी अपराधबोध के मुख्य धारा में आकर अपना बयान रखती है. इसके अलावा मुंबई के प्राजक्त देशमुख के करुणाष्टक (मराठी) और सौरव पालोढ़ी के जे जंगलागुलोर आकाश छिल्लो (बांग्ला) ने जगह बनाई है. भारतीय रंगमंच के इस भव्य आयोजन का आनंद लीजिए.

चार मोनोलॉग वाले नाटक समथिंग लाइक ट्रुथ  की दो अभिनेत्रियां दुशा और शर्वरी असाधारण रूप से बेस्ट ऐक्ट्रेस अवार्ड के लिए नामांकित.

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