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राज्यों की रस्साकशी

भाजपा को भले ही नया अध्यक्ष मिल गया हो, मगर उसे अभी भी चार अहम राज्यों, कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली में पार्टी की मजबूती के लिए बहुत कुछ करना बाकी है.

THE BIG STORY: BJP
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और पूर्व अध्यक्ष जे.पी. नड्डा
अपडेटेड 2 अप्रैल , 2026

असल में, साल 2025 की सर्दियों के दौरान भारतीय जनता पार्टी के संगठन के बारे में लगभग सारी खबरें नए पार्टी अध्यक्ष के चुनाव के लंबे समय से टलते आने को लेकर थीं. दिसंबर के आखिर हफ्ते में वह दौर खत्म हुआ जब भाजपा आलाकमान ने बिहार के मंत्री और पांच बार के विधायक नितिन नवीन को जे.पी. नड्डा की जगह नया पार्टी अध्यक्ष घोषित किया.

पार्टी के आंतरिक नियमों के मुताबिक, राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव के लिए केंद्रशासित प्रदेशों समेत 36 राज्य इकाइयों में से कम-से-कम 50 फीसद का होना जरूरी होता है. पार्टी की 31 राज्य इकाइयां पहले ही चुनी जा चुकी थीं. मगर दिक्कत बाकी पांच राज्यों में है और यह परेशानी आज भी बरकरार है.

सियासी रूप से अहम चार राज्य कर्नाटक, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली हैं. यहां भाजपा को कड़े फैसले लेने हैं और अभी तक औपचारिक रूप से इनके राज्य अध्यक्षों का चुनाव नहीं हुआ है. पांचवें राज्य मणिपुर में स्थिति संवेदनशील होने के कारण इसकी चर्चा तक मुश्किल मानी जा रही है.

एक साल से अधिक समय तक राष्ट्रपति शासन और बीच-बीच में हिंसा के बाद पार्टी ने फरवरी के पहले हफ्ते में युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री बनाया, ताकि सामान्य स्थिति लौट सके. केंद्र सरकार और भाजपा यहां बहुत सावधानी से कदम रख रहे हैं ताकि स्थिति और न बिगड़े.

चार अन्य राज्यों में हर एक की चुनौती अलग हैं. कर्नाटक में भाजपा के सामने प्रभावशाली जातीय गठबंधन को फिर से खड़ा करने की चुनौती है; हरियाणा में उसे आंतरिक शक्ति-संतुलन को साधना है; पंजाब में जमीनी सियासी आधार तैयार करना है; और दिल्ली में गुटबाजी को सुलझाना है.

पार्टी सूत्रों के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा फिलहाल इंतजार और निगरानी की रणनीति अपना रही है, क्योंकि इन चार राज्यों में राज्य अध्यक्ष का चयन भविष्य की चुनावी रणनीति से गहरे जुड़ा हुआ है.

बी.एस. येदियुरप्पा और उनके बेटे विजयेंद्र

कर्नाटक की खींचतान
कर्नाटक भाजपा की संगठनात्मक पहेली का सबसे जटिल हिस्सा है. 2023 के विधानसभा चुनाव में हार और 2024 के लोकसभा चुनाव में झटका लगने के लगभग तीन साल बाद भी राज्य इकाई आंतरिक शक्ति संघर्ष में उलझी हुई है.

उसमें पूर्व मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा (बीएसवाइ) और उनके बेटे बी.वाइ. विजयेंद्र का प्रभाव कायम है. पार्टी मोटे तौर पर दो हिस्सों में बंटी है. एक ओर लिंगायत नेताओं का पुराना समूह है जो येदियुरप्पा के साथ है. दूसरी ओर वे नेता जो लंबे समय से उनके वर्चस्व का विरोध करते रहे हैं.

मौजूदा राज्य अध्यक्ष विजयेंद्र को राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन प्राप्त है, मगर फिर से उनकी नियुक्ति का कड़ा विरोध हो रहा है. विरोधियों में पूर्व मुख्यमंत्री और मौजूदा लोकसभा सांसद बसवराज बोम्मई तथा भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बी.एल. संतोष शामिल हैं.

मगर, फिलहाल भाजपा के पास ऐसा कोई वैकल्पिक नेता नहीं है जो लिंगायत वोट को एकजुट रखते हुए व्यापक जातीय गठबंधन भी बना सके. भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''विजयेंद्र को औपचारिक रूप से फिर से राज्य अध्यक्ष घोषित न करके राष्ट्रीय नेतृत्व ने विकल्प खुला रखा है और शक्ति संतुलन साधे रखा है. वरना येदियुरप्पा अब तक उन्हें 2028 के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कराने की कोशिश कर चुके होते.’’

इस बीच केंद्रीय नेतृत्व गुटबाजी को लेकर कड़ा रुख दिखा चुका है. वरिष्ठ विधायक बसनगौड़ा पाटील यत्नाल को पिछले साल बीएसवाइ और विजयेंद्र पर हमलावर रहने के कारण पार्टी से निष्कासित कर दिया गया था.

हरियाणा की उलझन
हरियाणा में नेतृत्व का सवाल पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमता है. वह अब भी राज्य संगठन के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं.  फिलहाल, उनके करीबी नायब सिंह सैनी मुख्यमंत्री हैं तो मोहन लाल बडोली राज्य संगठन के अध्यक्ष हैं.

नए राज्य अध्यक्ष को लेकर बहस खट्टर की विरासत से भी जुड़ी है. कई अंदरूनी नेताओं का आरोप है कि उनके दस साल के शासन ने संगठन को गुटों में बांट दिया. वहीं, पिछले दशक में भाजपा की तेज और कुछ हद तक असमान्य वृद्धि ने भी समीकरण जटिल बना दिए हैं.

वहीं कांग्रेस, इंडियन नेशनल लोक दल और जननायक जनता पार्टी जैसे दलों से आए कई असरदार नेताओं को भी पार्टी में जगह मिली है. इनमें किरण चौधरी, राव इंद्रजीत सिंह और कुलदीप बिश्नोई जैसे नेता भी शक्ति केंद्र बने हुए हैं. अनिल विज और राम कुमार गौतम सरीखे पुराने भाजपा नेता भी अलग-अलग सियासी आधार की अगुआई करते हैं. ऐसे में नए राज्य अध्यक्ष की नियुक्ति संतुलन साधने की बेहद चुनौतीपूर्ण कवायद है.

पंजाब की पहेली
अगर गौर करें तो पंजाब ऐसा राज्य है जहां भाजपा को अभी भी कोई राह नहीं सूझ रही. 2020 में शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन टूटने के बाद राज्य में भाजपा का आधार कमजोर हुआ है. फिर भी, पार्टी आलाकमान आशान्वित है और 14 मार्च को अमित शाह की मोगा में प्रस्तावित रैली को कई नेता 'नई शुरुआत’ का संकेत मान रहे. मगर, अनिश्चितता कुछ वक्त से साफ नजर आ रही है.

हरियाणा के  मनोहर लाल खट्टर और मुख्यमंत्री नायब सैनी

बीते साल जुलाई में पार्टी ने वरिष्ठ नेता अश्विनी शर्मा को पंजाब इकाई का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया क्योंकि कांग्रेस से आए सुनील जाखड़ से अपेक्षित नतीजे नहीं मिल सके. जाखड़ रोजमर्रा के संगठनात्मक काम से दूर हो चुके हैं, मगर वे प्रेस कॉन्फ्रेंस करते और भाषण देते नजर आते हैं. वहीं, शर्मा संगठन का अधिकांश कामकाज संभालते हैं. इस दोहरी नेतृत्व व्यवस्था ने कार्यकर्ताओं में भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है.

असल समस्या यह है कि मंडल और जिला स्तर पर पार्टी का मजबूत संगठनात्मक ढांचा बन ही नहीं सका है. दो दशकों तक भाजपा ग्रामीण इलाकों में पहुंच बनाने के लिए अकाली दल पर निर्भर रही. फिर 2020-21 के किसान आंदोलन के दौरान नाराजगी ने स्थिति और जटिल कर दी.

2022 के विधानसभा चुनाव में 117 में से वह सिर्फ दो सीट जीत सकी और फिर लोकसभा चुनाव में उसे एक भी सीट नहीं मिली. अगले विधानसभा चुनाव फरवरी 2027 में होने हैं, इसलिए भाजपा आलाकमान को जल्द तय करना होगा कि पंजाब इकाई को पुराने संगठनात्मक नेताओं के सहारे पुनर्गठित किया जाए या फिर अन्य दलों से आए नए नेताओं पर भरोसा किया जाए.

राजधानी की रार
हालांकि दिल्ली में भाजपा की चुनौती चुनावी कमजोरी नहीं बल्कि आंतरिक एकता को लेकर है. लोकसभा चुनाव में लंबे समय से मजबूत रहने के बावजूद पार्टी स्थानीय राजनीति में उतनी सफलता नहीं दोहरा पाई थी. मगर फरवरी 2025 में 27 वर्षों बाद सत्ता में वापसी के साथ स्थिति बदली.

अब एक साल बाद भाजपा नेतृत्व पार्टी को और मजबूत करना चाहता है. ऐसे में उसे ऐसा राज्य अध्यक्ष चाहिए जो दिल्ली इकाई के अलग-अलग गुटों को एकजुट कर सके. अब उसे यह फैसला लेना है कि क्या किसी हाइप्रोफाइल सांसद या विधायक को राज्य अध्यक्ष बनाया जाए, और किसी समुदाय को प्रतिनिधित्व दिया जाए.

फिलहाल वीरेंद्र सचदेवा ही संगठन का नेतृत्व कर रहे हैं. केंद्रीय नेतृत्व यह विचार कर रहा है कि उन्हें जारी रखा जाए या किसी अधिक प्रभावी सियासी चेहरे को लाया जाए जो कार्यकर्ताओं में नई ऊर्जा भर सके और पार्टी के सियासी संदेश को तेज कर सके. यह फैसला इसलिए भी अहम है क्योंकि दिल्ली में भाजपा अब 'ट्रिपल-इंजन सरकार’ चला रही है. केंद्र, राज्य सरकार और दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) तीनों में पार्टी सत्ता में है.

राज्य अध्यक्ष का निर्णय आने वाले 2027 के एमसीडी चुनाव को भी प्रभावित करेगा. भाजपा यह जोखिम नहीं लेना चाहती कि हालिया जीत की गति धीमी पड़े, खासकर तब जब 'शराब घोटाले’ केस में सकारात्मक अदालत फैसले से आम आदमी पार्टी को नया उत्साह मिला है. भाजपा के लिए नगर निगम चुनाव यह परखने का भी मौका होंगे कि हालिया चुनावी सफलताएं क्या जमीनी स्तर पर स्थायी समर्थन में बदल पाई हैं. नए नेतृत्व में जीत मिलना न सिर्फ दिल्ली बल्कि अन्य राज्यों के लिए भी एक स्पष्ट संदेश होगा. 

दिल्ली भाजपा के लिए साल 2027 के नगर निगम के चुनाव बेहद महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि वे उसके लिए यह परखने का भी मौका होंगे की पार्टी की हालिया चुनावी सफलताएं क्या असल में जमीनी स्तर पर भी स्थायी समर्थन में तब्दील हो पाई हैं

जटिल सियासी गणित

पंजाब 
साल 2020 में अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने के बाद पार्टी का पतन शुरू. अब कांग्रेस से आए सुनील जाखड़ और भाजपा के वरिष्ठ नेता अश्वनी शर्मा के 'दोहरे’ नेतृत्व का प्रयोग कार्यकर्ताओं में और अधिक भ्रम पैदा कर रहा है.

हरियाणा 
पूर्व मुख्यमंत्री खट्टर का प्रभाव अब भी कायम है. उनके करीबी मुख्यमंत्री नायब सैनी और राज्य अध्यक्ष मोहन बडोली कमान संभाल रहे हैं. मगर राज्य संगठन में गुटबाजी अभी भी मौजूद है. दल-बदल कर आए नेताओं और राज्य के क्षत्रपों नें स्थिति को और जटिल बना दिया है.

दिल्ली 
'ट्रिपल-इंजन’ सरकार के साथ भाजपा हर सत्ता पर काबिज है. मगर, राज्य अध्यक्ष वीरेंद्र सचदेवा ने भले ही चुनावों के दौरान पार्टी का नेतृत्व किया, मगर वे राष्ट्रीय राजधानी के लिए पर्याप्त प्रभावशाली नहीं माने जाते हैं.

मणिपुर 
एक साल से अधिक समय से राष्ट्रपति शासन और बीच-बीच में हुई हिंसा के बाद, भाजपा ने युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री बनाया. हालात अभी भी जोखिमपूर्ण और संवेदनशील बने हुए हैं.

कर्नाटक 
एक तरफ येदियुरप्पा और उनके बेटे तथा राज्य इकाई के अध्यक्ष विजयेंद्र हैं तो दूसरी ओर हैं भाजपा के पिछले मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और संगठनकर्ता बी.एल. संतोष. कौन बाजी मारेगा?

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