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बेवफाई की किक से कराहता फुटबॉल

आइएसएल को बचाने में सफलता भले मिल गई हो लेकिन असल समस्या बहुत गहरी है जो भारतीय फुटबॉल को अंदर ही अंदर खोखला कर रही. अधिकारियों की लापरवाही और पैसों की कमी की वजह से कई मैच रद्द हो गए, जिससे खिलाड़ियों का भविष्य तो बर्बाद हो ही रहा है, हमारी राष्ट्रीय टीम की रैंकिंग भी गिर रही

कोलकाता में 8 मार्च 2025 को आइएसएल के एक मैच के दौरान पेनाल्टी बॉक्स पर एक्शन में मोहन बागान एसजी और एफसी गोवा के खिलाड़ी
अपडेटेड 20 मार्च , 2026

अचानक 2 जनवरी को एक बेबाक और मार्मिक वीडियो सामने आया, जो कहीं न कहीं भारतीय राष्ट्रीय फुटबॉल टीम के प्रमुख खिलाड़ियों सुनील छेत्री, गुरप्रीत सिंह संधू, संदेश झिंगन और ब्रैंडन फर्नांडीस वगैरह की हताशा को जाहिर करता था. इसमें इन खिलाड़ियों ने फुटबॉल के विश्व शासकीय निकाय फीफा से सीधे अपील की कि स्थगित इंडियन सुपर लीग (आइएसएल) टूर्नामेंट का आयोजन सुनिश्चित किया जाए.

वीडियो की एक पंक्ति खासी जज्बाती थी, ''हम बस फुटबॉल खेलना चाहते हैं. अनिश्चितता करियर बर्बाद कर रही है.'' संधू ने कहा, ''हमें आइएसएल में प्रतिस्पर्धा की भावना के साथ फुटबॉल खेलना चाहिए. लेकिन हम आशंका और हताशा से घिरे हैं.'' उनकी इस अपील की ठोस वजह थी क्योंकि आइएसएल भारतीय फुटबॉल के उन प्रमुख आयोजनों में से एक है जिसमें अच्छा भुगतान किया जाता है.

लियोनेल मेसी के भारत दौरे की जबरदस्त लोकप्रियता देखकर शायद ही कोई यह मानने को तैयार होगा कि भारतीय फुटबॉल की हालत खस्ता है. हकीकत यही है. भारत में फुटबॉल का संगठनात्मक ढांचा बुरी तरह जर्जर हो चुका है. मेसी की चकाचौंध से थोड़ा हटकर देखें तो पता चलेगा कि भारतीय फुटबॉलर और कोच अपने ही दम पर प्रशिक्षण ले रहे हैं, तनख्वाह घटाने की शर्तों पर तैयार हो रहे या फिर महीनों तनख्वाह का इंतजार करना उनकी नियति है.

हालात बिगड़ने के बाहरी संकेतों पर गौर करें: आइएसएल का आयोजन समय पर नहीं हो सका (आमतौर पर यह टूर्नामेंट सितंबर में होता है); फुटबॉल ढांचे को व्यापक स्तर पर सहारा देने वाली इस क्षेत्र की दूसरी श्रेणी की प्रतियोगिता आइ-लीग बिना प्रायोजक किसी तरह चल रही है; और इस खेल के सर्वोच्च शासकीय निकाय अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआइएफएफ) को अदालती मामलों और संस्थागत गतिरोध से जूझना पड़ रहा है.

जाहिर है इसका प्रभाव सबसे ज्यादा खिलाड़ियों, कोच और सहायक कर्मचारियों पर पड़ रहा है जिनका पूरा करियर दांव पर लगा है. मैदान से बाहर की समस्याओं के चलते मैदान पर प्रदर्शन प्रभावित होना स्वाभाविक ही था. भारत एशिया में फुटबॉल के शीर्ष स्तरीय प्रदर्शन से बाहर हो चुका है. वह फीफा रैंकिंग में 141वें स्थान पर खिसक गया है. यही नहीं, एशिया के शीर्ष टूर्नामेंट एएफसी एशियन कप के लिए क्वालिफाइ तक नहीं कर पाया है.

खिलाड़ियों की अपील के चार दिन बाद 6 जनवरी को केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया ने आइएसएल के मध्य फरवरी में शुरू होने का ऐलान किया और केंद्र सरकार के समर्थन का आश्वासन दिया. इसके बाद टूर्नामेंट का एक छोटा प्रारूप 14 फरवरी को शुरू हुआ जो मई तक चलेगा.

समस्या बन गई नासूर
आइएसएल में देरी की फौरी वजह थी एआइएफएफ और फुटबॉल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट लिमिटेड (एफएसडीएल) के बीच मास्टर राइट्स एग्रीमेंट की अवधि खत्म होना. एफएसडीएल रिलायंस समर्थित एक संस्था है जिसे आइएसएल के कमर्शियल और परिचालन संबंधी नियंत्रण हासिल थे. यह समझौता दिसंबर, 2025 में समाप्त हो रहा था. 2013 में स्थापना के बाद से पहली बार आइएसएल का कोई केंद्रीय संचालक नहीं था. विडंबना यह है कि आइएसएल का स्वामित्व संभालने वाले महासंघ ने अब तक कोई उत्तराधिकारी तय नहीं किया था.

एआइएफएफ का कहना है कि उसने स्थिति संभालने की पूरी कोशिश की. महासंघ के एक सूत्र के शब्दों में, ''हमने सितंबर 2024 से मार्च 2025 के बीच एफएसडीएल को कई बार चिट्ठी लिखी लेकिन जवाब ही न मिला. जब बात शुरू हुई तो मांगें ऐसी थीं जिन्हें महासंघ स्वीकार नहीं कर सकता था. अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि एआइएफएफ संविधान को अंतिम रूप दिए जाने तक कोई नया घटनाक्रम नहीं होना चाहिए.''

एआइएफएफ के कानूनी पचड़े में फंसने की वजह से भी आयोजन में देरी हुई. इसकी एक लंबी कहानी है. 2017 से दायर याचिकाओं में पारदर्शिता, कार्यकाल सीमा और चुनावों को लेकर एआइएफएफ प्रशासन को चुनौती दी गई थी. मई 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय फुटबॉल के संचालन के लिए प्रशासकों की समिति गठित की, जिसके चलते अगस्त में फीफा ने एआइएफएफ का निलंबन किया, फिर कुछ दिनों बाद न्यायिक देखरेख में चुनाव होने के बाद निलंबन हटाया गया.

सितंबर, 2025 में सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले का उद्देश्य एआइएफएफ के लिए नए संविधान को मंजूरी देकर लंबे समय से जारी मुकदमे और अस्थिरता को समाप्त करना था. हालांकि, इसमें आइएसएल के लिए टेंडर की प्रक्रिया समेत प्रमुख व्यावसायिक निर्णयों पर निगरानी रखने का फैसला किया गया. कोर्ट ने तो अपनी तरफ से संभवत: पूरी कोशिश की लेकिन एआइएफएफ के शीर्ष अधिकारियों के बीच वर्षों से जारी आंतरिक कलह ने कामकाज सुचारु होने न दिया. शासकीय व्यवस्था ठप होने से भारत में इस खेल को खासा नुक्सान पहुंचा.

वर्ष 2025 में समय आगे बढ़ने के साथ ही यह स्पष्ट होने लगा कि एफएसडीएल की अनुबंध आगे बढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं. तब एआइएफएफ ने तीन सदस्यीय समिति गठित की—जिसमें गोवा फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष कैटानो जोस फर्नांडीस, भारतीय फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव अनिर्बान दत्ता और केरल फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष नवाज मीरान शामिल थे. इसका उद्देश्य क्लबों से बातचीत करके लीग को बचाना था.

क्लबों ने अपना निकाय बनाया, जिसमें नॉर्थईस्ट यूनाइटेड एफसी, एससी दिल्ली, मोहन बागान सुपर जाइंट, मुंबई सिटी एफसी और एफसी गोवा के प्रतिनिधि शामिल हुए. इसके बाद बातचीत आगे बढ़ने पर महासंघ ने राजस्व बंटवारे पर एक दीर्घकालिक समाधान प्रस्तावित किया, जिसके तहत क्लबों को कुल राजस्व का 50 फीसद, वाणिज्यिक अधिकार धारक को 30 फीसद और एआइएफएफ की कम हिस्सेदारी मिलनी थी. प्रस्ताव को सकारात्मक प्रतिक्रिया तो मिली लेकिन वाणिज्यिक भागीदार के बिना यह अभी कागजों पर ही है.

इसका पता इस बात से भी चलता है कि एआइएफएफ ने अंतत: जनवरी मध्य में एक नए आइएसएल संचालक को तलाशने के क्रम में अनुरोध प्रस्ताव जारी किया. निविदा पूर्व बैठक में पांच संस्थाओं ने हिस्सा लिया लेकिन एक भी बोली नहीं आई. 15 वर्षों में 37.5 करोड़ रुपए के गारंटीशुदा सालाना भुगतान, न्यायिक निगरानी, सीमित स्वायत्तता और असीमित जोखिम ने निविदा को व्यावसायिक रूप से अनाकर्षक बना दिया. यह जग जाहिर है कि पूर्व संचालक एफएसडीएल ने कुछ वर्षों में 2,000 से 2,500 करोड़ रुपए का घाटा झेला था.

लड़ाई अस्तित्व बचाने की
आइएसएल भले ही इस समय पूरे जोश के साथ जारी हो, मैच टेलीविजन पर प्रसारित हो रहे हों और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर भी स्ट्रीम किए जा रहे हों लेकिन 2026 का संस्करण छोटा होगा. हमेशा की तरह चौदह टीमें होंगी लेकिन एक ही राउंड-रॉबिन फॉर्मेट होगा और कोई प्लेऑफ नहीं होगा यानी पूरे सीजन के रंग सिर्फ आधे सीजन में सिमट जाएंगे.

आइएसएल को एक ब्रॉडकास्टिंग प्रोडक्ट के तौर पर परिकल्पित किया गया था जिसमें कई टीमें एक-दूसरे से भिड़ें और कई प्लेऑफ हों. यह फॉर्मेट निवेश को आकर्षक बनाता है. मौजूदा लीग एक राउंड-रॉबिन फॉर्मेट वाली है. एक मौजूदा आइएसएल टीम के कप्तान कहते हैं, ''ऐसा लगता है जैसे बस सीजन के फैसले के लिए 90 मिनट का खेल खेला जा रहा हो. इससे उस तरह की मेहनत का जज्बा नहीं पैदा हो रहा जो वाकई आपको चैंपियन बनाता है.''

इसका एक नुक्सान और भी है. एशियाई फुटबॉल महासंघ (एएफसी) के नियमों के अनुसार, क्लबों को एएफसी चैंपियंस लीग में सीधे प्रवेश के लिए लीग और कप में कम से कम 24 आधिकारिक मैच खेलने होते हैं. छोटे शेड्यूल के साथ, भारतीय क्लब लगभग 13 मैच ही खेल पाएंगे, जिससे वे सीधे प्रवेश पाने का मौका खो देंगे और क्वालिफायर में चले जाएंगे.

आर्थिक रूप से भी स्थिति डगमग बनी हुई है. एक आइएसएल क्लब के अधिकारी बताते हैं कि केंद्रीय राजस्व कोष से हरेक क्लब को मिलने वाला प्राथमिक वितरण 2024-25 में करीब 13 करोड़ रुपए था. उनके मुताबिक, ''स्पॉन्सरशिप से मिलने वाले अतिरिक्त 5-6 करोड़ रु. से नुक्सान को कुछ हद तक कम किया जा सकता है. इन दोनों के बिना कुछ क्लबों को 18-19 करोड़ रुपए के वार्षिक घाटे का सामना करना पड़ रहा है.'' फिर भी, क्लबों को लीग की जरूरत है क्योंकि इसके बिना खिलाड़ियों का करियर खत्म हो जाएगा.

'मुश्किल दौर'
भारतीय फुटबॉल जगत एक दर्दनाक दौर से गुजर रहा है. एक पूर्व भारतीय अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी, जो अब आइएसएल क्लब में सहायक कोच हैं, उनको दस महीने से तनख्वाह नहीं मिली है. वे कहते हैं, ''मेरे परिवार के लिए यह समय खासा मुश्किल भरा रहा है. अब जब फुटबॉल फिर से शुरू हो रहा है तो मुझे उम्मीद है कि चीजें आगे बढ़ेंगी.'' कम से कम सात क्लबों ने लागत घटाने के लिए अस्थायी रूप से गतिविधियां बंद कर दीं. एक क्लब ने दिसंबर तक वेतन रोक दिया, और जनवरी से मई के बीच किस्तों में भुगतान का वादा किया है. दूसरे क्लब ने एक या दो महीने के वेतन में कटौती के लिए बातचीत की. चेन्नैयन एफसी के डिफेंडर प्रीतम कोटल अक्तूबर से क्लब फुटबॉल से दूर हैं. उन्होंने एक ऐसी अकादमी में प्रशिक्षण लिया जिसे स्थापित करने में उन्होंने खुद मदद की थी और केंद्र सरकार की अपनी नौकरी के लिए ऊबड़-खाबड़ मैदानों पर फुटबॉल खेला. वे कहते हैं, ''यह आदर्श स्थिति नहीं है लेकिन खेल से जुड़े रहने के लिए आप जो कर सकते हैं, करते हैं.''

एआइएफएफ अध्यक्ष कल्याण चौबे 2025 को कामयाब वर्ष बताते हैं. वे कहते हैं, ''पहली बार तीनों महिला टीमों—सीनियर नेशनल टीम, अंडर-20 नेशनल टीम और अंडर-17 नेशनल टीम—ने योग्यता के आधार पर एएफसी एशियाई कप के लिए क्वालिफाइ किया. यह भारतीय फुटबॉल में एक मील का पत्थर है.'' वे यह भी बताते हैं कि अंडर-17 लड़कों की टीम ने शीर्ष क्रम में शुमार ईरान टीम को हराकर महाद्वीपीय टूर्नामेंट के लिए क्वालिफाइ किया.

हालांकि, पुरुष राष्ट्रीय टीम अक्तूबर 2025 में सिंगापुर से हारने के बाद 24 टीमों वाले एएफसी एशियाई कप के लिए क्वालिफाइ करने में नाकाम रही. इसका सबसे बड़ा कारण घरेलू टूर्नामेंट का अनियमित शेड्यूल, अनिश्चित द्वितीय श्रेणी और खिलाड़ियों का महीनों तक प्रतिस्पर्धी आयोजनों से वंचित रहना है. फीफा रैंकिंग में टीम के 2017 में 96वें स्थान से गिरकर अब 141वें स्थान पर पहुंच जाना कोई अचानक नहीं हुआ है क्योंकि रैंकिंग अंतरराष्ट्रीय मैचों की संख्या, मजबूत प्रतिद्वंद्वी और प्रदर्शन में निरंरता पर निर्भर करती है.

भारत इन तीनों मामलों में पिछड़ता गया है. जापान, दक्षिण कोरिया, ईरान, उज्बेकिस्तान, जॉर्डन और वियतनाम जैसे एशियाई देशों में फुटबॉल का खेल अलग ही स्तर का है, भारत इसमें पिछड़ गया है और समय पर अपना सत्र आयोजित करने, द्वितीय श्रेणी के फुटबॉल को जीवित रखने और अपने पेशेवर खिलाड़ियों को उम्दा सहूलतें मुहैया करने के लिए जूझ कर रहा है.

विडंबना यह है कि इंग्लिश प्रीमियर लीग और फीफा विश्व कप जैसे वैश्विक फुटबॉल आयोजनों के लिए भारत सबसे आकर्षक टेलीविजन बाजारों में एक बना हुआ है. लेकिन लिवरपूल या मैनचेस्टर सिटी के मैचों के लिए जागते रहने वाले प्रशंसक शनिवार शाम को आइएसएल देखने नहीं आते. क्यों? क्योंकि लीग को अभी खुद ही खेल जगत में अपनी साख बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है.

एआइएफएफ के पूर्व महासचिव कुशल दास कहते हैं, ''बतौर स्पोर्टिंग प्रोडक्ट आइएसएल की औसत दर्जे की स्थिति को हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं. फुटबॉल के नजरिए से लीग खुद को एक आकर्षक और टिकाऊ प्रतियोगिता साबित करने में नाकाम रही है.'' उनका तर्क है कि अधिकांश क्लबों का फैन बेस सीमित और राष्ट्रीय स्तर पर योगदान न के बराबर है.

खिलाड़ियों और कोचों के लिए फुटबॉल एक ऐसी काम है जिसे मैदान पर बिताए गए समय, फिटनेस और अनुबंधों के पालन से मापा जाता है. भले ही आइएसएल को अभी बचा लिया गया है लेकिन जब तक सही प्रबंधन और आर्थिक स्पष्टता नहीं लौटती, तब तक भारतीय फुटबॉल इंजरी टाइम में ही खेलती रहेगी.

एशियाई फुटबॉल महासंघ के अनुसार, क्लबों को एएफसी चैंपियंस लीग में सीधे प्रवेश के लिए कम से कम 24 आधिकारिक मैच खेलने होते हैं. लेकिन बदले आइएसएल स्वरूप में भारतीय क्लब लगभग 13 मैच ही खेल पाएंगे.

मुश्किलों की गिनती नहीं
संकट की इस घड़ी में भारतीय फुटबॉल के विभिन्न हितधारक किस तरह की चुनौतियों से जूझ रहे?

दूर की कौड़ी केंद्रीय खेल मंत्री मांडविया 10 जनवरी फीफा विश्व कप 2026 ट्रॉफी टुअर के दौरान फुटबॉलर गिल्बर्टोसिल्वा के साथ

> अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ (एआइएफएफ) अदालती निगरानी, व्यावसायिक गतिरोध, आंतरिक कलह और मुकदमों के इतिहास में घिरा रहा महासंघ आइएसएल का मालिक है लेकिन संचालन संबंधी विश्वसनीयता की कमी के कारण क्लबों, खिलाड़ियों, निवेशकों और अंतरराष्ट्रीय निकायों के बीच भरोसा बढ़ाने में नाकाम रहा है.

> इंडियन सुपर लीग के क्लब अस्तित्व बचाए रखने की मजबूरी में क्लबों ने नुक्सान झेला, ट्रेनिंग रोकी, वेतन कटौती की और एक छोटे टूर्नामेंट फॉर्मेट को स्वीकारा. उनके पास और कोई चारा भी न था क्योंकि फुटबॉल न होने का मतलब था—खिलाड़ियों की कीमत घटना और क्लब का अस्तित्व खतरे में पड़ना.

> फुटबॉल स्पोर्ट्स डेवलपमेंट लिमिटेड (एफएसडीएल) एक समय आइएसएल पर व्यापक अधिकार रखता था और कुछ लोगों का आरोप है कि पूरे भारतीय फुटबॉल में इसका सिक्का चलता था. भारी नुक्सान झेलने के बाद बिना किसी उत्तराधिकारी के लीग बंद होने से एक ऐसा शून्य उपजा जिसने साबित कर दिया कि एक मजबूत व्यावसायिक स्तंभ के बिना इसे चलाया नहीं जा सकता.

> पेशेवर खिलाड़ी और कोच सबसे कमजोर हितधारक, वेतन भुगतान न होने, करियर ठप पड़ने और प्रतिस्पर्धात्मक लय खो देने जैसी मुश्किलों का सामना किया. प्रशासनिक विफलताओं का खामियाजा भुगतने को मजबूर, फिटनेस और आजीविका बेहतर बनाने के लिए संघर्ष झेला.

> फैंस और ब्रॉडकास्टर भारत के विशाल फुटबॉल दर्शक वैश्विक लीग के राजस्व में योगदान करते हैं लेकिन घरेलू क्लब की प्रतिस्पर्धाओं को बड़े पैमाने पर नजरअंदाज करते हैं क्योंकि अस्थिरता और प्रशासनिक अराजकता भावनात्मक/वित्तीय प्रतिबद्धता में बाधा साबित हो रही.

इस वक्त हमें आइएसएल में खेलते हुए आपके सामने स्क्रीन पर होना चाहिए था. पर हम तो अंदेशों और हताशा से घिरे हैं.
गुरप्रीत सिंह संधू, भारतीय फुटबॉल टीम के सदस्य, खिलाड़ियों की फीफा से वीडियो अपील में

हम खेल उत्पाद के रूप में आइएसएल की औसत दर्जे की स्थिति नजरअंदाज कर देते हैं. फुटबॉल के नजरिए से लीग खुद को आकर्षक और टिकाऊ प्रतियोगिता साबित करने में नाकाम रही है.
कुशल दास, पूर्व एआइएफएफ महासचिव

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