- अजय साहनी
गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की कथित साजिश में निखिल गुप्ता को अमेरिकी संघीय अदालत की ओर से दोषी ठहराए जाने के बाद मामला एक खासे अहम मोड़ पर पहुंच गया है. अमेरिकी धरती पर सुपारी लेकर हत्या करने की साजिश अब महज खुफिया आकलन पर आधारित आरोप नहीं, बल्कि अदालत में स्वीकारा गया तथ्य है.
इस मुकदमे में एक भारतीय 'सरकारी अधिकारी' विकास यादव का नाम पहले ही शामिल किया जा चुका है और मौजूदा न्यायिक स्थिति अभियोजकों को दूसरे संदिग्धों के खिलाफ कार्रवाई का रास्ता देती है. गुप्ता और यादव के बीच प्रकाशित बातचीत में एक अज्ञात 'बॉस' के निर्देशों का उल्लेख है. दोनों के बीच गोपनीयता के स्पष्ट अभाव को देखते हुए, यादव की दूसरे लोगों से बातचीत भी एफबीआइ रिकॉर्ड में होने की संभावना है.
नतीजतन, इसमें उच्च अधिकारियों के भी शामिल होने का अंदेशा बना हुआ है. हालांकि, ऐसी प्रक्रिया में सिर्फ तकनीकी साक्ष्य काफी नहीं. इसे आगे बढ़ाने के लिए यादव का प्रत्यर्पण अहम होगा, जो लगभग असंभव है. एफबीआइ की तरफ से यादव को मोस्ट वांटेड सूची में डालने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने उन पर जबरन वसूली, अपहरण और मारपीट के आरोप लगाए हैं.
इससे भारत में आपराधिक कार्यवाही शुरू हो गई और प्रत्यर्पण की जरूरत नहीं रही. यादव को 18 दिसंबर, 2023 को गिरफ्तार किया गया था लेकिन अप्रैल 2024 में जमानत मिलने के बाद से वे 'लापता' हैं और अदालती समन का जवाब भी नहीं दिया है. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उनकी कोर्ट में अगली सुनवाई 20 फरवरी 2026 को होनी थी.
गुप्ता की दोषसिद्धि का एक तत्काल असर यह भी हो सकता है कि प्रवासी भारतीयों में खालिस्तान समर्थकों का हौसला बढ़े. उन्हें यह भरोसा मिल सकता है कि भारत भविष्य में, कम से कम पश्चिमी देशों में, ऐसी किसी कार्रवाई का जोखिम नहीं उठाएगा. इससे अलगाववादियों में अवज्ञा, व्यवधान और तोड़फोड़ की घटनाएं बढ़ सकती हैं, खासकर राजनयिक संपत्तियों को निशाना बनाने की आशंका के साथ. इसके अलावा अपने देश में विध्वंसक गतिविधियों में शामिल होने, बुनियादी ढांचे और प्रमुख लोगों को निशाना बनाने जैसी हिंसक घटनाओं के खतरे और बढ़ सकते हैं.
2023 में पन्नू की हत्या की साजिश के भारत-अमेरिका संबंधों पर असर को लेकर पूछे गए एक सवाल पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दो टूक कहा था, ''मुझे नहीं लगता कि कुछ घटनाओं को दोनों देशों के राजनयिक संबंधों से जोड़ना उचित है.'' देखा जाए तो बात सही भी है. इस घटना से भारत-अमेरिका संबंधों पर निर्णायक प्रभाव पड़ने की आशंका नहीं है. फिर भी, मामले में आगे की जांच वॉशिंगटन को नई दिल्ली पर अतिरिक्त दबाव बनाने का मौका दे सकती है, खासकर उस दशा में जब नई दिल्ली पहले ही कमजोर स्थिति में है.
इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि अमेरिका बातचीत के दौरान समय-समय पर इस मुद्दे को दबाव के हथियार के तौर पर इस्तेमाल करे. यह न्याय या नैतिकता का मामला नहीं है, और खुद अमेरिका इस पर दूसरों को नसीहत देने की स्थिति में नहीं है. लेकिन दबाव बनाने के लिए इसका इस्तेमाल कहीं न कहीं किया जा सकता है.
पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में इज्राएल और उसकी खुफिया एजेंसी मोसाद की नकल करने की खासी उत्सुकता रही है. विडंबना यह है कि इसके लिए क्षमताओं और सामर्म्थ का अच्छे से आकलन तक नहीं किया गया. सबसे जरूरी बात कि इज्राएल और मोसाद अमेरिका के साथ कई शक्तिशाली पश्चिमी सहयोगियों के पूर्ण संरक्षण में काम करते हैं, जबकि भारत को अकेले ही काम करना है और उसके मित्र बहुत कम हैं. कनाडा में निज्जर हत्याकांड और अमेरिका में पन्नू मामले ने नई दिल्ली को और अलग-थलग कर दिया.
बदकिस्मती यह है कि ऐसे जोखिम उठाते समय इसके फायदे का गणित कैसे नहीं देखा. पिछले दशकों में भारत ने आतंकवाद को काफी हद तक नियंत्रित किया है. पंजाब में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए कोई बड़ा खतरा नहीं था, और न ही प्रवासी खालिस्तान समर्थकों की तरफ से किसी बड़े आतंकवादी अभियान का संकेत दिख रहा था.
घरेलू राजनैतिक छवि चमकाने वाले संदेश और 'घर में घुसकर मारेंगे' जैसे नारों को सच साबित करने के अलावा, ऐसे दुस्साहिक कार्यों की कोई जरूरत न थी, खासकर उस वक्त जब निशाने पर रहे लोग बहुत ताकतवर नहीं थे. पन्नू की हत्या की साजिश केस के नतीजे दर्शाते हैं कि भाजपा सरकार जितना दिखाती है और हकीकत में उसके पास जो ताकत है, उन दोनों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है.
लेखक इंस्टीट्यूट फॉर कॉन्फ्रिलक्ट मैनेजमेंट ऐंड साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के कार्यकारी निदेशक हैं.

