नीतिगत सुधारों, तकनीकी नवाचार और बदलती सामाजिक अपेक्षाओं के कारण भारत का शैक्षिक परिदृश्य बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है. राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 (एनईपी) लागू होने के बाद से बहुविषयक शिक्षा, कौशल विकास और अनुभवात्मक शिक्षा पर जोर दिया जाने लगा है. दूसरी तरफ, डिजिटल उपकरण और एआइ-संचालित प्लेटफॉर्म भी कक्षाओं को नया रूप दे रहे हैं.
शिक्षा को ज्यादा व्यावहारिक और भविष्य के लिहाज से प्रासंगिक बनाने के लिए विश्वविद्यालय और स्कूल अब उद्योग के साथ मिलकर काम कर रहे हैं. वहीं, आल्टरनेटिव क्रेडेंशियल्स, छोटी अवधि वाले कोर्स और आजीवन सीखते रहने में सक्षम बनाने वाले पाठ्यक्रम लोकप्रियता हासिल कर रहे हैं.
शिक्षक समग्र विकास, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक-भावनात्मक शिक्षा पर कहीं ज्यादा जोर दे रहे हैं, जो रटने से हटकर एक ज्यादा शिक्षार्थी-केंद्रित, लचीली और समावेशी प्रणाली की ओर बदलाव का संकेत है और जो वैश्विक मानकों के अनुरूप भी है.
नई दिल्ली में हाल ही आयोजित एक दिवसीय इंडिया टुडे एजुकेशन कॉन्क्लेव 2026 के दौरान नीति निर्माताओं, शिक्षाविदों और विचारकों ने इन मुद्दों पर मंथन किया. साथ ही इस बात पर भी चर्चा की कि आने वाले समय में भारत में शिक्षा की रूपरेखा आखिर किस तरह की होनी चाहिए.
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 'नीति से व्यवहार तक: एनईपी 2020 का कार्यान्वयन’ विषय पर अपने मुख्य भाषण के दौरान राष्ट्रीय शिक्षा नीति की परिवर्तनकारी शक्ति को उम्दा ढंग से रेखांकित किया. उन्होंने बताया कि कैसे इस नीति का उद्देश्य एक समग्र, लचीली और योग्यता-आधारित शिक्षा प्रणाली का निर्माण करना है, जो छात्रों को इक्कीसवीं सदी के कौशल से लैस करने के साथ सांस्कृतिक और भाषाई विविधता को बढ़ावा दे. उन्होंने मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा में सीखने के महत्व के बारे में भी बताया और कहा कि बहुभाषावाद से संज्ञानात्मक विकास और राष्ट्रीय पहचान को मजबूती मिलती है.
कॉन्क्लेव का समग्र संदेश स्पष्ट था—शिक्षा क्षेत्र के सुधार तभी कामयाब होते हैं जब प्रणालियां स्वायत्तता, विश्वास, समग्र विकास और मार्गदर्शन संस्कृति को बढ़ावा देती हैं. कार्यक्रम का समापन मंत्री के हाथों देशभर के प्रमुख शिक्षण संस्थानों के प्रमुखों को इंडिया टुडे बेस्ट कॉलेज और यूनिवर्सिटी अवार्ड्स 2025 से सम्मानित किए जाने के साथ हुआ.
—शैली आनंद

