फरवरी की 13 तारीख को 54 साल के भारतीय नागरिक निखिल गुप्ता ने न्यूयॉर्क की एक अमेरिकी फेडरल कोर्ट में सुपारी लेकर हत्या, सुपारी लेकर हत्या की साजिश और मनी लॉन्ड्रिंग की साजिश के आरोप स्वीकार कर लिए. ये आरोप 2023 की उस कथित साजिश से जुड़े हैं जिसे अमेरिका के नागरिक और खालिस्तान आंदोलन के प्रमुख समर्थक गुरपतवंत सिंह पन्नू की हत्या की योजना बताई गई थी.
प्रॉसिक्यूटर पक्ष के मुताबिक, गुप्ता ने यह साजिश एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के निर्देश पर रची, जिसे कोर्ट के कागजों में 'सीसी-1' कहा गया है. मीडिया रिपोर्ट्स में इसे भारतीय खुफिया अधिकारी विकास यादव बताया गया है. कथित साजिश तब नाकाम हो गई, जब, जिसे सुपारी किलर समझा गया था, वह दरअसल अमेरिकी एजेंसियों का मुखबिर निकला. इसके बाद 2023 में चेक गणराज्य में गुप्ता की गिरफ्तारी हुई और 2024 में उसे अमेरिका प्रत्यर्पित किया गया.
पन्नू 'सिख्स फॉर जस्टिस' संगठन का जनरल काउंसिल (महाअधिवक्ता) है. यह संगठन उत्तर अमेरिका में सक्रिय है और भारत में इसे गैरकानूनी घोषित किया गया है. वहीं, गृह मंत्रालय ने पन्नू को आतंकी घोषित किया है. अमेरिकी अटॉर्नी जे क्लेटन ने कहा, ''निखिल गुप्ता ने न्यूयॉर्क सिटी में एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रची. उसे लगा कि देश के बाहर रहकर वह यहां किसी को मार सकता है और उसे कोई सजा नहीं होगी, सिर्फ इसलिए कि वह अपने फ्री स्पीच के अधिकार का इस्तेमाल कर रहा था. लेकिन वह गलत था और उसे न्याय का सामना करना होगा. हमारा संदेश साफ है कि कोई भी विदेशी ताकत अमेरिका और उसके लोगों से दूर रहे.''
एफबीआइ के असिस्टेंट डायरेक्टर जेम्स सी. बार्नाकल जूनियर ने और सीधा बयान दिया. उन्होंने कहा, ''एक भारतीय सरकारी कर्मचारी के निर्देश और समन्वय में निखिल गुप्ता ने अमेरिकी जमीन पर एक अमेरिकी नागरिक की हत्या की साजिश रची. यह भारत सरकार के एक मुखर आलोचक को चुप कराने की कोशिश थी.''
नई दिल्ली ने किसी भी आधिकारिक भूमिका से साफ इनकार किया है. उसने इन आरोपों को बेबुनियाद और सरकारी नीति के खिलाफ बताया है. साथ ही एक उच्च स्तरीय आंतरिक जांच समिति भी बनाई गई है. भारतीय अधिकारी इस मामले को राजनैतिक रूप से प्रेरित मानते हैं, खासकर इसलिए कि भारत ने पन्नू को आतंकी घोषित किया है. भारत का कहना है कि यह एक अलग आपराधिक घटना हो सकती है, न कि राज्य प्रायोजित अभहयान.
गुप्ता के लिए यह दोष स्वीकार करना एक बड़ा बदलाव है, क्योंकि शुरुआत में उसने खुद को निर्दोष बताया था. प्रॉसिक्यूटर पक्ष के साथ सहयोग करने पर उसकी सजा कम हो सकती है. सहयोग का मतलब अन्य लोगों के बारे में जानकारी देना भी हो सकता है, जिससे किसी अधिकारी का नाम आने पर भारत की स्थिति जटिल हो सकती है. उसे अधिकतम 40 साल की सजा हो सकती है. सजा पर फैसला 29 मई, 2026 को होना है.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उसके परिवार ने कहा कि लंबी और थकाने वाली कानूनी लड़ाई खत्म करने के लिए उसने दोष स्वीकार किया और उसने 'पूरा दोष अपने ऊपर ले लिया', न कि सरकारी गवाह बना.
भारत के लिए इसका मतलब
निखिल गुप्ता के दोष स्वीकार करने का असर भारत-अमेरिका रिश्तों पर पड़ सकता है. अमेरिका ने अब तक भारत की शुरुआती जांच पर संतोष जताया था, लेकिन अदालत में साजिश की पुष्टि होने के बाद वहां की जांच एजेंसियों और कांग्रेस का रुख सख्त हो सकता है. इससे भारत पर ज्यादा निगरानी, ज्यादा सहयोग की मांग—जैसे प्रत्यर्पण से जुड़े मुद्दे—या फिर द्विपक्षीय समझौतों में मानवाधिकार शर्तें जोड़ने जैसी बातें उठ सकती हैं.
एशिया-पैसिफिक लीडरशिप नेटवर्क के सीनियर रिसर्च एडवाइजर फ्रैंक ओ'डॉनेल कहते हैं, ''दोष स्वीकार करने से दोनों सरकारों को इस प्रकरण पर एक लाइन खींचने का मौका मिल सकता है. अगर मुकदमा लंबा चलता तो ऐसे कई संवेदनशील और असहज विवरण सार्वजनिक हो सकते थे जो भारतीय सरकार के लिए मुश्किल खड़े करते.''
विशेषज्ञ कनाडा में 2023 में सिख अलगाववादी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के आरोपों से इसकी तुलना कर रहे हैं. उनका कहना है कि पन्नू मामला प्रवासी भारतीयों के बीच असंतुष्ट आवाजों से निबटने के तरीके को लेकर चिंताएं और बढ़ा सकता है. हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि भारत-अमेरिका साझेदारी की मजबूती लंबी अवधि में नुक्सान को सीमित कर सकती है. फिर भी अमेरिका इस मुद्दे को बातचीत में दबाव बनाने के तौर पर इस्तेमाल कर सकता है.
इस मामले के दूसरे किरदार विकास यादव के खिलाफ एफबीआइ ने 'वॉन्टेड' नोटिस जारी कर रखा है. उन्हें दिसंबर 2023 में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने अपहरण और रंगदारी के एक अलग मामले में गिरफ्तार किया था. अप्रैल 2024 से वे जमानत पर बाहर हैं और भारत में कानूनी प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं. अगर अमेरिका औपचारिक रूप से उसका प्रत्यर्पण मांगता है तो प्रक्रिया को आगे बढ़ाना मुश्किल होगा, क्योंकि भारतीय कानून के तहत जब तक देश में मुकदमा चल रहा हो, उसे प्राथमिकता मिलती है. उनके खिलाफ मुकदमे की सुनवाई होनी है, लेकिन कई बार वे उसमें हाजिर नहीं हुए.
क्षति नियंत्रण
नई दिल्ली स्थित ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हर्ष वी. पंत जैसे विशेषज्ञों का मानना है कि भारत और अमेरिका दोनों इस प्रकरण को जल्दी पीछे छोड़ना चाहेंगे ताकि हाल के महीनों में द्विपक्षीय रिश्तों में आई सकारात्मक गति को आगे बढ़ाया जा सके. पंत कहते हैं, ''वॉशिंगटन पहले ही इस मामले में भारत की उच्चस्तरीय जांच पर संतोष जता चुका है. इससे संकेत मिलता है कि असर को सीमित रखा जा सकता है. लेकिन यह भी साफ है कि दोनों देशों की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों के बीच लगातार संवाद जरूरी है. साथ ही संवेदनशील मुद्दों को संभालते समय ज्यादा सावधानी बरतनी होगी, क्योंकि ये सीधे द्विपक्षीय हितों को प्रभावित कर सकते हैं.'' वे मानते हैं कि यह ज्यादा समय तक सुर्खियों में नहीं रहेगा.
आखिर में, भले ही दोष स्वीकार करने से कुछ समय के लिए नई दिल्ली पर जवाबदेही और पारदर्शिता दिखाने का दबाव बढ़ जाता है, लेकिन यह भी दिखाता है कि दोनों देशों के रिश्ते मजबूत हैं. दोनों देशों के पास ऐसे मामलों को समझदारी से संभालने के अच्छे कारण हैं. कई विशेषज्ञ यह चर्चा कर रहे हैं कि क्या यादव की कथित भूमिका किसी 'अनियंत्रित' की हरकत थी या फिर एक असफल गुप्त अभियान का हिस्सा. उनका मानना है कि अगर रिश्तों को लंबी अवधि में नुक्सान से बचाना है, तो एक भरोसेमंद आंतरिक जांच जरूरी होगी.
वहीं कुछ विश्लेषकों ने कथित टार्गेट की प्रोफाइल और अमेरिकी सबूतों की मजबूती पर भी सवाल उठाए हैं. यह पूरे मामले के इर्द-गिर्द मौजूद राजनैतिक संवेदनशीलता और संदेह को भी दिखाता है.
खुफिया अधिकारी विकास यादव के खिलाफ दिल्ली पुलिस की ओर से दर्ज किया गया मामला एक रणनीतिक कदम माना गया, जिसका उद्देश्य अमेरिका की ओर से उनके प्रत्यर्पण की किसी भी संभावित कोशिश को रोकना था. इससे इस पूरे मामले में भारत की स्थिति को भी कुछ हद तक सुरक्षित करने में मदद मिल सकती है.

