scorecardresearch

प्रधान संपादक की कलम से

ऑटो सेक्टर को देखें तो महंगी गाड़ियों पर इंपोर्ट टैरिफ नहीं लगेगा, पर इसका बाजार में बहुत छोटा हिस्सा है. लेकिन 23 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट्स निर्यात को बढ़ावा मिलेगा, जिससे छोटे उद्योग भी वैल्यू चेन में ऊपर चढ़ सकते हैं.

इंडिया टुडे हिंदी 25 फरवरी 2026 अंक
इंडिया टुडे हिंदी 25 फरवरी 2026 अंक
अपडेटेड 6 मार्च , 2026

—अरुण पुरी.

भारत संकट के समय सबसे अच्छा जवाब देता है. इतिहास बताता है कि बड़े सुधार अक्सर दबाव की घड़ी में ही शुरू हुए हैं. 1991 के आर्थिक सुधार, जिनसे लाइसेंस राज खत्म हुआ और धीमी विकास दर के दौर का अंत हुआ, भुगतान संतुलन संकट से ही शुरू हुए थे. अब भू-राजनीतिक उथल-पुथल और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का पुराने वैश्विक व्यापार ढांचे पर टैरिफ हमला, दुनिया को रीसेट दौर में ले गया है.

भारत के लिए यह दूसरा 1991 जैसा मौका है. हम इसे 'सबका साथ, सबसे व्यापार’ कह रहे हैं, यानी ऐसा नीतिगत बदलाव जो उदारीकरण के अधूरे काम को आगे बढ़ाए. तीन दशक के सुधारों के बाद भी संरक्षणवाद की सोच हमारी राजनैतिक अर्थव्यवस्था में बनी रही. जब भी बड़े व्यापारिक समूहों में शामिल होने का मौका आया, हम पीछे हट गए. 2019 में भारत आखिरी समय पर रीजनल कॉ‌म्प्रिहेन्सिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसीईपी) से बाहर हो गया.

ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप की तरफ भी हमने कदम नहीं बढ़ाए. सावधानी हमारी नीति बन गई थी. लेकिन महामारी के बाद वैश्विक व्यापार में आए झटकों ने हमें बदलने पर मजबूर किया. टैरिफ की ऊंची दीवारें, जो 1991 से पहले के आयात-प्रतिस्थापन दौर की याद दिलाती थीं, अब धीरे-धीरे कई व्यापार समझौतों के जरिए हटाई जा रही हैं.

सबसे बड़े और चर्चा में रहने वाले समझौते अमेरिका और यूरोपीय संघ (ईयू) के साथ हुए हैं. अमेरिका के साथ हुआ समझौता एक साल से चल रही टैरिफ की उठापटक के अंत जैसा है, जिसमें ड्यूटी 50 फीसद तक पहुंच गई थी. अब इसे घटाकर 18 फीसद कर दिया गया है. इसमें एक अहम शर्त है, रूस से कोई तेल खरीद नहीं. ईयू के साथ हुई 'मदर ऑफ ऑल डील्स’ लगभग पूरी तरह टैरिफ को शून्य पर ले जाती है.

दोनों मिलकर 50 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा जीडीपी वाले दो बड़े बाजार खोलते हैं. इससे पहले ऑस्ट्रेलिया, यूएई, ओमान, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड के साथ समझौते हो चुके हैं. आगे कनाडा, खाड़ी देशों के समूह और लैटिन अमेरिका के मर्कोसुर के साथ भी बातचीत चल रही है. 40 से ज्यादा विकसित अर्थव्यवस्थाओं को कवर करते हुए यह भारत के लिए एक बड़ा रणनीतिक मोड़ है, जबकि वैश्विक व्यापार में उसकी हिस्सेदारी अभी सिर्फ 2.5 फीसद है.

हालांकि इन सबके बीच बहस के मुद्दे भी हैं. लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार स्वदेशी की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश कर रही है. 'मेक इन इंडिया’ के नाम पर आत्मनिर्भरता को अब ऐसी सोच में बदला जा रहा है जो हमारी उत्पादन क्षमता को तेज कर सके. अब नारा है 'मेक फॉर द वर्ल्ड’. तर्क मजबूत है. युद्ध के बाद जर्मनी से लेकर जापान, चीन, एशियन टाइगर देश, सबकी तरक्की निर्यात आधारित औद्योगिक नीति से हुई. लेकिन भारत पीछे रहा है. 438 अरब डॉलर का भारत का माल निर्यात, इसकी जीडीपी का सिर्फ 10-14 फीसद है.

यानी विकास का बड़ा इंजन पूरी ताकत से चल ही नहीं रहा. वैश्विक सप्लाइ चेन से मजबूती से जुड़ने पर प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, उत्पादन बढ़ेगा, गुणवत्ता वैश्विक स्तर की होगी, रोजगार बढ़ेंगे और उपभोक्ताओं को बेहतर सामान मिलेगा.

यह पूरी प्रक्रिया नपी-तुली है. कोशिश यही रही कि झटका न लगे, बल्कि रफ्तार मिले. ऑटो सेक्टर को देखें तो महंगी गाड़ियों पर इंपोर्ट टैरिफ नहीं लगेगा, पर इसका बाजार में बहुत छोटा हिस्सा है. लेकिन 23 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट्स निर्यात को बढ़ावा मिलेगा जिससे छोटे उद्योग भी वैल्यू चेन में ऊपर चढ़ सकते हैं. कृषि क्षेत्र में हमने दरवाजा थोड़ा ही खोला है. मुख्य अनाज और जरूरी फसलें बाहर रखी गई हैं.

जैसा वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इंडिया टुडे से कहा, ''स्विट्जरलैंड, ईयू, न्यूजीलैंड ने कभी डेयरी को बाहर रखकर फ्री ट्रेड डील नहीं की. हम पहले हैं.’’ फिर भी खास किस्म के उत्पादों के लिए जगह है. जैसे केंटकी बॉर्बन और कैलिफोर्निया बादाम. दूसरी तरफ हमारे तटीय इलाकों में सीफूड कारोबार फिर से रफ्तार पकड़ सकता है. मसाले, चाय और कॉफी को भी नया बाजार मिलेगा. लेकिन कुछ उत्पाद जोखिम भरे भी हैं. सोयाबीन तेल का आयात ऑयलसीड मिशन के साथ असहज बैठता है, और जीएम फसलों पर बहस भी है. डिस्टिलर्स ग्रेन्स, लाल ज्वार और सेब जैसे उत्पाद स्थानीय किसानों पर असर डाल सकते हैं.

अन्य क्षेत्रों, जैसे श्रम आधारित उद्योग और हाइ-टेक सेक्टर में फ्री ट्रेड सीधे विकास की रक्रतार बढ़ाने वाला इंजन सा है, टेक्सटाइल में 2030 तक ईयू को पांच गुना निर्यात तक बढ़ सकता है. सोचिए, हर साल गारमेंट हब से 20 फीसद की बढ़त का असर कितना बड़ा होगा. दूसरे छोर पर इंजीनियरिंग सामान का निर्यात 2030 तक तीन गुना होकर 300 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है. फार्मा कंपनियों को दुनिया के दो सबसे बड़े और कीमती दवा बाजारों में पहुंच मिलेगी. इससे भारतीय मरीजों को महंगी और उन्नत दवाएं सस्ती दर पर मिल सकेंगी.

एक खास पहलू है पश्चिम की 'चाइना प्लस वन’ रणनीति. इससे इलेक्ट्रॉनिक्स, अहम टेक्नोलॉजी और उन्नत सेमीकंडक्टर सेक्टर को लाभ मिलेगा. और देश में एआइ और डेटा सेंटर के पूरे इकोसिस्टम में बदलाव आ सकता है. भारत के सबसे मजबूत निर्यात क्षेत्र, सर्विसेज, को भविष्य के लिए तैयार करने का यह सबसे समझदारी भरा तरीका है. लेकिन हैरानी की बात है कि अमेरिका संग समझौते में सर्विसेज का जिक्र ही नहीं है. अगर हम सस्ता रूसी तेल छोड़ रहे हैं और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता कर रहे हैं, तो बदले में कम से कम वीजा नियमों में ढील मिलनी चाहिए थी. खासकर तब, जब व्हाइट हाउस हमसे 500 अरब डॉलर के आयात की प्रतिबद्धता चाहता है.

बाजार खोलने से मौके मिलते हैं पर खतरे भी आते हैं. एफटीए अपने आप प्रतिस्पर्धा की गारंटी नहीं देते. दो बुनियादी शर्तें अब भी बाकी हैं. पहली, रिसर्च और डेवलपमेंट. अभी आरऐंडडी पर खर्च जीडीपी का सिर्फ 0.6 फीसद है. इतने कम निवेश को साथ, दिमागी क्षमता होते हुए भी हम, इनोवेटर की जगह असेंबलर बनकर रह जाएंगे.

दूसरी शर्त है नियमों में ढील. उदारीकरण के साथ सच में आसान कारोबार का माहौल भी जरूरी है. संकट ने तस्वीर साफ कर दी है. भारत ने पीछे हटने की जगह दुनिया से जुड़ने का रास्ता चुना है. लेकिन यह बड़ा आर्थिक खुलापन बुनियादी बदलाव बनेगा या सिर्फ छोटा सा एडजस्टमेंट, यह साथ-साथ चलने वाले सुधारों पर टिका होगा. 1991 में मजबूरी ने बदलाव को जन्म दिया था. आज फिर वही अवसर है. इसे हमें पूरी तरह अपनाना होगा.

Advertisement
Advertisement