अरे मैं गाजियाबाद से आ रहा हूं. जाम में फंस गया था. जाने दीजिए मुझे. टिकट लिया है...धीरे बोलिए सर! शो चल रहा है. अंदर जगह नहीं...ऐसे कैसे?’’ इस संवाद के बाद गेटकीपर भीतर झांककर आता है और दर्शक को धीरे से पीछे जाकर खड़े होने की इजाजत देता है.
भारत में नाटक वालों का मक्का कहे जाने वाले, दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के बहुमुख सभागार का यह दृश्य. यहीं के स्नातक, हिंदी सिनेमा के अहम नाम और अपनी फिल्म वध 2 के प्रोमोशन पर निकले संजय मिश्र और कुमुद मिश्र विद्यालय के बाहरी कैंपस के स्टेज पर रोमांचित प्रशंसकों को संस्मरण सुना रहे हैं. थोड़ा दूर से गुजरता एक अधेड़ रंगकर्मी भुनभुनाता है: ''ई सनीमा वालों को लाए बिना भारंगम पूरा नहीं होता.’’
भारंगम यानी भारत रंग महोत्सव, जिसका यह पच्चीसवां और विशेष संस्करण है (27 जनवरी-20 फरवरी, 2026). पहली बार यह दिल्ली समेत देश के 40 और हर सात महाद्वीप के एक-एक शहर में हो रहा है. 277 भारतीय और 12 विदेशी प्रस्तुतियां, 228 भाषाओं और बोलियों में. इस दफा नगांव (असम), तुरा (मेघालय), पारादीप (ओडिशा) और दमन-दीव सरीखी जगहों पर भी यह पहुंचा है. यह दुनिया के बड़े रंग आयोजनों में शुमार हो चुका है.
एनएसडी के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी जोर देते हैं, ''थिएटर का यह दुनिया का सबसे बड़ा फेस्टिवल है. पर पता नहीं क्यों, लोगों को कहने-बोलने में संकोच होता है.’’ 12-14 करोड़ रु. बजट वाले फेस्टिवल के पंख थोड़ा और फैलाने को अलग-अलग महीनों में होते आए बाल संगम, जश्ने बचपन और आदि महोत्सव जैसे आयोजनों को भी इसी में समेटा गया है. त्रिपाठी स्पष्ट करते हैं, ''ये फेस्टिवल 7-8 साल से बंद थे. 25वें भारंगम में इसे जोड़कर शुरू कर लिया. आगे इनके बारे में फिर से सोचेंगे.’’
जिस तरह से एनएसडी से अब तक निकले करीब 1,100 स्नातक मॉडर्न सीख के साथ रंगमंच को देश के कोने-कतरे तक ले गए, उसी तरह से एनएसडी का भारंगम भी अब थिएटर की दुनिया में एक आंदोलन बन गया है. दूरदराज के शहरों-कस्बों के उभरते युवा रंगकर्मियों के नाटक भारंगम में चुना जाना उनकी प्रतिभा पर मुहर लगने जैसा होता है. दिल्ली में शो करने और देश-दुनिया के दूसरे खिच्चों, विधाओं, भाषाओं के लोगों से बातचीत के मौके मिलने से उनमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है.
एनएसडी के रजिस्ट्रार पी.के. मोहंती जिक्र करते हैं कि ''गुजरात के एक रंगकर्मी ने तो अपना नाटक चुने जाने के बाद बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई.’’
एनएसडी के बहुत-से पूर्व छात्र एक स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा के तहत सोशल मीडिया के अलग-अलग मंचों पर इस फेस्टिवल की गुणवत्ता पर लगातार बहस करते आए हैं. मेहरून नाटक के साथ आ रहीं इप्शिता चक्रवर्ती कहती हैं, ''हमारे यहां पढ़ते समय क्वालिटी पर ज्यादा फोकस था. हर जगह में दो-दो, तीन-तीन दिन का फेस्टिवल! जैसे यूपीएससी एग्जाम की लिस्ट निकली है. ऐसे में इसे भारत रंग महोत्सव नहीं, कुछ और होना चाहिए.’’
भारंगम के बतौर ब्रांड, उसके आकार-प्रकार और गुणवत्ता पर बहस-मुबाहिसा अपनी जगह, पर उसके पच्चीसवें संस्करण पर एनएसडी के थिंक टैंक के लिए मौका है उसे एक नए मकाम पर ले जाने का.
भारत रंग महोत्सव ने रंगमंच आंदोलन को देश के कोने-कतरे तक पहुंचाया और दूरदराज की प्रतिभाओं को मौके देकर उनका हौसला बढ़ाया.

