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'नारायणमूर्ति के 70 घंटे' वाले सिद्धांत पर क्यों नहीं चलना चाहती जेन-ज़ी पीढ़ी?

यही बात दुनियाभर के नियोक्ताओं को बाल नोचने पर मजबूर कर रही है, क्योंकि उन्हें युवा पीढ़ी की बदलती प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठाना है

हेड्स अप फॉर टेल्स नामक पेटकेयर चेन ने अपने कर्मचारियों को पालतू पशु को ऑफिस में लाने की छूट दी है
हेड्स अप फॉर टेल्स नामक पेटकेयर चेन ने अपने कर्मचारियों को पालतू पशु को ऑफिस में लाने की छूट दी है

महज 22 साल की रिया दासगुप्ता पहले ही तीन पूर्णकालिक नौकरियां कर चुकी हैं और अब चौथी नौकरी एक प्रकाशन में कर रही हैं. वे नौकरी छोड़ने को लेकर कोई शिकवा नहीं करतीं. कलकत्ता विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में ग्रेजुएट रिया कहती हैं, "पहली दो नौकरियों में मेरे साथ काम करने वालों और सुपरवाइजरों से नहीं निभी. तीसरी में मुझे अधिक घंटों तक और सप्ताहांत में बिना किसी अतिरिक्त पारिश्रमिक के काम करने को कहा जाता था.

मैंने अपने माता-पिता को काम के लिए जिंदगी और सेहत की परवाह नहीं करते देखा है. मैं वैसा नहीं करना चाहती. मैं ऐसे मौके चाहती हूं जो आगे बढ़ने का अवसर दें." दासगुप्ता की ही उम्र की मुंबई की श्रेया प्रसाद का भी नजरिया कुछ ऐसा ही है. उन्हें याद है कि उनके पिता बुखार में भी काम पर जाया करते थे. श्रेया कहती हैं, "उनके पास विकल्प नहीं था." उनके पिता को 30 साल की उम्र में कर्ज चुकाना था और एक बच्चे की परवरिश करनी थी. वे कहती हैं, "मैं बच्चा नहीं चाहती और मेरे पास पहले ही घर और कार है. मुझे पैसे के लिए नहीं, बल्कि संतुष्टि के लिए काम करने की सुविधा है. अगर मैं संतुष्ट नहीं हूं तो नौकरी छोड़ सकती हूं."

'बेबी बूमर्स’ और जेन एक्स (जिनका जन्म क्रमश: 1946-1964 और 1965-1980 के बीच हुआ था) पीढ़ी के लोग रिया और श्रेया जैसी युवाओं पर नाक-भौंह सिकोड़ेंगे और उन्हें 'लापरवाह’ पीढ़ी कहेंगे. माजरा यह है कि 'जेन जेड’ खुद की परवाह कम नहीं कर सकती. यही बात दुनियाभर के नियोक्ताओं को बाल नोचने पर मजबूर कर रही है, क्योंकि उन्हें युवा पीढ़ी की बदलती प्राथमिकताओं के साथ तालमेल बिठाना है, जो पिछली पीढ़ी की तरह 'भाग-दौड़’ नहीं करना चाहती या कॉर्पोरेट सफलता की तलाश में जिंदगी को कुर्बान नहीं करना चाहती.

इसके बदले वह सार्थक, जोशीले काम को तरजीह देती है. शायद यही वजह है कि हाल ही में इन्फोसिस के सह-संस्थापक एन.आर. नारायणमूर्ति की युवाओं को सप्ताह में 70 घंटे काम करने की दी गई सलाह पर आलोचनाओं की झड़ी लग गई. उस सलाह को लेकर अविश्वास और क्षोभ जताने से लेकर निर्मम मीम्स और चुटकुलों की बाढ़ आ गई.

विश्व आर्थिक फोरम के मुताबिक, 2025 तक दुनियाभर में कार्यबल में एक-तिहाई से अधिक जेन जेड (यानी 1996 और 2010 के बीच पैदा हुए लोग) होंगे. इस पीढ़ी के युवा किसी डेस्क के बंधन में जकड़ने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं. यह दृढ़ विश्वास पिछले कुछ दशकों में बेहतर शिक्षा मानकों और नए क्षेत्रों के विकास का नतीजा है, जिससे आज ढेर सारे अवसर खुल गए हैं. डेलॉइट के 44 देशों में 22,000 से अधिक जेन जेड के अध्ययन 2023 ग्लोबल जेन जेड और मिलेनियल सर्वे के मुताबिक, 66 फीसद भारतीय जेन जेड युवाओं के पास मूल नौकरी के अलावा दूसरा काम है.

श्रेया उनमें एक हैं. एक जगह सहायक शिक्षक होने के अलावा वे घर पर बने केक ऑनलाइन बेचती हैं. वे कहती हैं, "मुझे लगता है कि मेरे पिता को इससे संतुष्टि मिलती थी कि वे काम कर रहे थे. मुझे और मेरे दोस्तों को पसंदीदा काम से संतुष्टि मिलती है न कि किसी भी तरह के काम से." उनके लिए "मौज-मस्ती, ओटीटी शो देखने और सैर-सपाटा से कोई समझौता नहीं हो सकता" और उसमें किसी नौकरी की रुकावट "बर्दाश्त के काबिल नहीं." पैसा कोई बड़ी चीज नहीं है; डेलॉइट के 2022 के अध्ययन से पता चला कि 60 फीसद से ज्यादा भारतीय जेन जेड युवा आर्थिक रूप से सुरक्षित महसूस करते हैं.

बिलाशक, टेक-सेवी, अत्याधुनिक जेन जेड युवाओं को कोई नौकरी इतनी प्रिय नहीं है कि उसे छोड़ा न जाए, खासकर जिनके लिए जिंदगी का चैन-सुकून ज्यादा अहम है. पिछले साल की लिंक्डइन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 88 फीसद जेन जेड पेशेवर साल 2023 में नौकरी बदलने की सोच रहे थे. यह नौकरी-पेशा बदलने की काफी ऊंची दर वाली पीढ़ी है.

हायरिंग सॉल्यूशंस कंपनी एक्सफेनो के एक अध्ययन में एक साल से अधिक के अनुभव वाले 50 लाख सक्रिय कामगारों के डेटा का अध्ययन किया गया. उसमें पता चला कि 22 से 24 वर्ष की उम्र के युवाओं ने एक कंपनी के साथ औसतन केवल नौ महीने बिताए और उनकी नौकरी बदलने की दर 20 फीसद थी जबकि 36 वर्ष से अधिक उम्र वाले औसतन 3.8 वर्ष एक कंपनी में बिताते हैं और उनकी नौकरी बदलने की दर सिर्फ पांच फीसद है. 

हाल के वर्षों में बहुत-से लोग इसे 'महा त्यागपत्र’ (ग्रेट रेजिगनेशन) कहना पसंद करते हैं. दरअसल, यह कोविड-19 महामारी के दौरान काम की प्रकृति में आए बदलाव का भी नतीजा है, जिसने हाइब्रिड नौकरियों के सिलसिले ने काम की जगहों और घर के फर्क को धुंधला कर दिया है. एडोब के 2021 के एक अध्ययन में 57 फीसद जेन जेड युवाओं ने स्वीकार किया कि उन्हें हर वक्त मौजूद रहने का तनाव परेशान करता है और यह भावना सबसे अधिक इसी आयु वर्ग में है.

वहीं, 74 फीसद ने कहा कि वे काम और जिंदगी में बेहतर संतुलन के लिए नौकरी बदल लेंगे. सो, ताज्जुब नहीं कि जेन जेड के पास काफी कुछ है, और खासकर जो पैसों के मामलों में मजबूर नहीं हैं, वे ऐसे काम को सहने को तैयार नहीं हैं, जहां किसी तरह का शोषण है. मसलन, मुंबई की 20 साल की सारा बोथरा को अपनी मार्केटिंग फर्म के लिए पूंजी जुटाने के लिए मार्केटिंग इंटर्नशिप छोड़ने का कोई अफसोस नहीं है. वे कहती हैं, "मैं घर से काम करना चाहती हूं. मुझे लगता है कि जिस जगह मुझे चैन मिलता है, वहीं मैं अपना सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक प्रदर्शन कर सकती हूं. लेकिन इन दिनों भी कार्यालयों में कामकाज घंटों से नापा जाता है, न कि आपके काम से. इसलिए मैं किसी की गुलाम बनने के बजाए एक उद्यमी बनकर कम कमाई करना पसंद करूंगी."

अपने ढंग से काम

यह समझने की भूल अलबत्ता न करें कि जेन जेड भ्रमित, निकम्मी या अनुत्साहित है. वह तो अपने ढंग से काम करने के लिए कसमसा रही है. खुद अपनी कंपनियां शुरू करने से लेकर विभिन्न ऑनलाइन कोर्सों में नाम लिखवाने तक काम के मायने को लेकर जेन जेड के बिल्कुल अलहदा ख्याल हैं. 23 वर्षीया सागरिका एस. ने अपने अंतराल के साल में पूरी किताब लिख डाली और यह सोचकर इंटर्नशिप ले ली कि उनका वक्त फलदायी ढंग से गुजरे.

हाल के वर्षों में कई 'गैप ईयर कम्युनिटीज’ उभर आए हैं जो पढ़ाई या काम से थोड़े वक्त की छुट्टी लेने के इच्छुक लोगों को रास्ता दिखाते हैं. मसलन, हरियाणा की अशोका यूनिवर्सिटी में 40 छात्रों का समूह गैपएक्स है. कई आईआईटी भी छात्रों को ग्रेजुएशन के बाद कुछ महीने प्लेसमेंट टालने और आंत्रप्रेन्योरशिप के नए विचारों में हाथ आजमाने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं.

दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस-चांसलर और शिक्षाविद् दिनेश सिंह कहते हैं, "मैं समझता हूं कि यह पीढ़ी किसी चीज में खुद को पूरी तरह झोंकने से पहले उसके बारे में पूरी तरह इत्मीनान कर लेना चाहती है. कइयों को अपने हाथ से कुछ रचकर बहुत संतुष्टि मिलती है और करियर की राह का फैसला करने से पहले वे विभिन्न अवसरों की पड़ताल करना चाहेंगे."

अगर उनकी बेहतरीन ढंग से बनाई योजनाएं भी तय या मनचाहे रास्ते से भटक जाएं? तब कुछ और तो है ही. ग्राफिक डिजाइनर का दो साल का कोर्स करने के बाद इसके बजाए समाजशास्त्र में आगे की पढ़ाई करने का फैसला करने वाले इंदौर के 23 वर्षीय अनुपम गर्ग कहते हैं, "मुझे नौकरी छोड़कर किसी दूसरे उद्योग में फिर नए सिरे से शुरू करने में डर नहीं लगता. अफसोस और मजबूरी की जिंदगी जीने से बदलना बेहतर है."

आत्मविश्वास और ऊर्जा के साथ जेन जेड वाले ढेरों चीजें साथ लेकर आते हैं. लिंक्डइन इंडिया के आंकड़ों से पता चलता है कि जेन जेड कर्मियों को 'डेस्क बॉम्बिंग’ करना यानी अनौपचारिक बातचीत, बिना तैयारी के नए-नए विचारों की छानबीन और आसानी से मिलकर काम करने के लिए आगे बढ़कर अपने साथियों के पास जाना बहुत अच्छा लगता है.

एक्सफेनो के सहसंस्थापक कमल कारंथ कहते हैं, "घर पर उदार परवरिश की वजह से उनमें से कई बेधड़क रवैया लेकर आते हैं. इससे उन्हें ग्राहक से रू-ब-रू होने वाली भूमिकाएं सौंपना आसान हो जाता है. ऊर्जा और उत्साह से जुटे होने पर किसी काम को चुटकियों में कर देने की अपनी क्षमता के कारण कम समय सीमा वाले प्रोजेक्ट के लिए वे आदर्श होते हैं."

यह सब करते हुए जेन जेड को अपनी चिंताएं सामने रखते हुए ग्लानि या परेशानी नहीं होती. कारंथ कहते हैं, "वे सबसे मुखर पीढ़ियों में से एक हैं और कुछ नया करने की अपनी वजहें बताते हुए हिचकिचाते नहीं हैं. एग्जिट इंटरव्यू में अक्सर सबसे ज्यादा बताई जाने वाली वजह होती है 'बेहतर मौके’. नियोक्ता की तरफ से दी गई वृद्धि के विकासपथ की वे सराहना करते हैं, बाहर बेहतर मौके खोजने और झपटने में भी जरा नहीं हिचकते."

जेन जेड के करीब आधे कर्मी उस पारंपरिक पदानुक्रम मॉडल में यकीन नहीं करते जिसमें शीर्ष मैनेजमेंट तक पहुंचना मुहाल होता है. आरपीजी ग्रुप की तरफ से भारत के 13 शहरों में जेन जेड के 4,000 कर्मियों के बीच किए गए सर्वे से पता चलता है कि उनमें से 10 में से छह मानसिक सेहत और समावेशिता को अहमियत देने वाले कार्यस्थल की खातिर बेहतर तनख्वाह छोड़ने के लिए तैयार हैं.

नियोक्ता इस नए सामाजिक अनुबंध से हैरान और भौचक हैं. भारत की एक अग्रणी आईटी कंपनी की एचआर डायरेक्टर कहती हैं, "मेरे लिए नया बदलाव यह है कि मेरे युवा कर्मचारी मुझे मेरे नाम से बुलाते हैं. यह दिलचस्प है कि 60 साल का कोई व्यक्ति मुझे 'मैडम’ कहता है लेकिन बोर्डरूम में 20 साल का कोई व्यक्ति ऐसा नहीं कहेगा. मैंने इसको अन्यथा न लेना सीख लिया है. इसमें केवल नजरिए का फर्क है, सम्मान में कमी नहीं है." 

हालांकि, मोंडेलेज इंडिया की सीनियर डायरेक्टर और पीपल लीड नगीना सिंह इससे जुड़ी एक सीमा का भी जिक्र करती हैं. वे कहती हैं, "जेन जेड वाले आमने-सामने की बातचीत या व्यक्तिगत चर्चाओं के बजाए संवाद के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म पसंद करते हैं, जिससे कार्यस्थल पर पैदा होने वाली विभिन्न परिस्थितियों से निबटने की उनकी क्षमता प्रभावित हो सकती है.

इससे व्यक्तिगत बातचीत के फायदे और समझ खत्म हो जाती है कि कैसे लोगों के बीच संवाद करने के कौशल कुछ परिस्थितियों में गेम चेंजर हो सकते हैं. कई बार, कार्यस्थल पर उपजी विभिन्न परिस्थितियों के प्रति जिस लचीलेपन की जरूरत होती है, उनमें उसका अभाव भी देखा जाता है. इसलिए, उन्हें नियमित परामर्श, समर्थन और मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है." कई एचआर विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि जेन जेड के छोटे कार्यकाल को देखते हुए उनके प्रशिक्षण में निवेश करना एक जोखिम भरा दांव हो सकता है और यह उन्हें दीर्घकालिक परियोजनाओं के लिए अनुपयुक्त भी बना देता है.

कारंथ का कहना है, "मैनेजर लगातार सतर्क रहते हैं क्योंकि जेन जेड अधिक ध्यान/सम्मान चाहते हैं और उन्हें इसी में खुशी मिलती है. वे सम्मान की जिस मानसिकता के साथ काम करने आते हैं उससे मैनेजरों के लिए काम करना काफी पेचीदा और मुश्किल हो जाता है. उनकी दिलचस्पी और भागीदारी बनाए रखने के लिए संगठनों को अधिक निवेश करना होगा जो चुनौतीपूर्ण हो सकता है."

डॉक्टर भी स्थायित्व की इस कमी की ओर ध्यान दिलाते हैं. दिल्ली स्थित मनोचिकित्सक डॉ. समीर मल्होत्रा कहते हैं, "यह समूह यह नहीं समझता कि समाधान के लिए कुछ लचीलेपन, धैर्य और माहौल के अनुसार खुद को थोड़ा ढालने की जरूरत होती है. उन्हें फौरन जवाब चाहिए. यह आमतौर पर इंटरनेट के माध्यम से उन्हें मिलने वाली झटपट खुशी की वजह से है. उन्हें इंतजार करने का हुनर हासिल करने की जरूरत है."

कंपनियां अन्य चुनौतियों से भी पार पाने की कोशिश कर रही हैं. जेन जेड की ख्वाहिशों की सूची में लचीलेपन को बहुत ज्यादा तरजीह मिलती है, और इसलिए कोविड-19 महामारी के बाद युवा कर्मचारियों को केवल उनके कार्यघंटों के लिए भी दफ्तरों तक वापस लाना बड़ा काम रहा है.

मसलन, आरपीजी समूह के सर्वेक्षण में लगभग 64 फीसद जेन जेड ने कहा कि वे कामकाज के माहौल में लचीलापन चाहते हैं. एक्सफेनो में, जहां एक साल पहले 40 फीसद कार्यबल जेन जेड था, वह 2023 में 26 फीसद रह गया. कई अन्य कंपनियों को भी अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना पड़ा. 2022 के लिंक्डइन डेटा से पता चला है कि उस साल भारत में ऑन-साइट रोल में 10 फीसद की कमी आई, जबकि एंट्री लेवल के पदों के लिए हाइब्रिड कार्य व्यवस्था में 60 फीसद की वृद्धि हुई.

इन्फोसिस के मानव संसाधन विकास के ग्रुप हेड शाजी मैथ्यू कहते हैं, "उन्नत प्रौद्योगिकियों, पीढ़ीगत बदलावों और काम की प्रकृति से जुड़े पहलुओं में बदलाव की वजह से आज प्रतिभा की तलाश कहीं अधिक प्रतिस्पर्धी हो गई है. हमने ऑफिस लौटने के संबंध में बहुत लचीला दृष्टिकोण अपनाया है और हमारे कर्मचारियों का फीडबैक बहुत सकारात्मक रहा है."

जेन जेड ने दुनियाभर की कंपनियों को मानसिक और भावनात्मक कल्याण के उपायों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रेरित किया है, और यह सही भी है. मसलन, ब्यूटी और वेलनेस कंपनी मैरिको लिमिटेड में ऑनसाइट वर्कशॉप और काउंसलिंग सेशन नियमित रूप से आयोजित होते हैं. मैरिको के मुख्य मानव संसाधन अधिकारी अमित प्रकाश कहते हैं, "हमने महसूस किया कि बदलते समय और बदलती व्यावसायिक प्राथमिकताओं के साथ, भविष्य के कार्यबल की आकांक्षाएं भी बदल रही हैं.

इसलिए, हमने इसके आसपास खुली चर्चा को प्रोत्साहित करने और समर्थन करने के लिए सही मंच प्रदान किए हैं. हमने '1टू1’ मोबाइल ऐप्लिकेशन भी शुरू किया है जो हमारे सदस्यों के लिए एक विशेष इमोशनल वेलनेस प्लेटफॉर्म के रूप में काम करता है." दूसरी ओर, पालतू जनवरों के अनुकूल कार्यस्थल भी हैं जो कर्मचारियों को अपने पालतू जानवरों को ऑफिस लाने की सुविधा देते हैं और माना जाता है कि इससे कर्मचारियों की भलाई में वृद्धि होगी.

पालतू जानवरों की देखरेख वाली चेन हेड्स अप फॉर टेल्स के ऑफिसों में कर्मचारियों के पालतू जानवरों को व्यस्त रखने के लिए कार्यस्थल पर पानी के कटोरे, चबाने वाले खिलौने और चटाई नजर आना असमान्य बात नहीं. चेन संस्थापक और सीईओ राशि नारंग कहती हैं, "हमारा दृढ़ विश्वास है कि हर घर और कार्यस्थल में पालतू जानवरों की ओर से लाई जाने वाली गर्मजोशी होनी चाहिए."

लिंक्डइन इंडिया की मानव संसाधन डायरेक्टर सूजन मैथ्यू कहती हैं, "आज का युवा कार्यबल उन संगठनों के साथ काम करने के लिए ज्यादा प्रतिबद्ध है जो उनके मूल्यों और सांस्कृतिक प्राथमिकताओं को साझा करते हैं. भारत में, 88 फीसद पेशेवर ऐसी कंपनियों को पसंद करते हैं जो न केवल अच्छी-अच्छी बातें करती हैं बल्कि बात पर अमल भी करती हैं; खासकर जब बात स्थिरता, विविधता और समावेशिता को महत्व देने वाली कार्य संस्कृति को बढ़ावा देने की आती है."

वे कहती हैं, "कई युवा एक काम में पेशेवर महारत की बजाए कई कार्यों में मौकों के लिए भी खुले हैं, जिससे उनके रोजगार विकल्पों में कौशल विकास और सीखने के अवसर महत्वपूर्ण कारक बन गए हैं. वे दफ्तर के एक ऐसे संतुलित माहौल को महत्व देते हैं जहां उनके परस्पर सहयोग और व्यक्तिगत फोकस, दोनों के लिए स्थान मिलता हो."

रिसर्च भी समय निकालने के लाभों को रेखांकित करती है. हृदय रोगों पर सबसे बड़ा और सबसे लंबे समय तक चलने वाला लैंडमार्क अध्ययन फ्रामिंघम हार्ट स्टडी बताता है कि जिन पुरुषों ने कई वर्षों तक छुट्टी नहीं ली, उनमें दिल का दौरा पड़ने की संभावना 30 फीसद ज्यादा थी. वहीं, जिन महिलाओं ने हर छह साल में केवल एक बार या उससे कम छुट्टी ली, उनमें हृदय संबंधी समस्याएं पैदा होने की संभावना लगभग आठ गुना ज्यादा थी.

दुनिया को ऐसा लग सकता है कि जेन जेड अव्यावहारिक है, या 'कुछ ज्यादा ही मांग रहा है.’ शायद ऐसा है नहीं. नगीना सिंह इसे अच्छी तरह समझाती हैं. वे कहती हैं, "उनके लिए पदानुक्रम उतना महत्वपूर्ण नहीं है, वे ज्यादा अहमियत उस कौशल को देते हैं जो उनके काम से जुड़ा है और जिसे वे सीख सकते हैं. उनकी नजर में, आज का उनका हर काम कल उनके लिए बेहतर संभावनाओं का निर्माण करने वाला होना चाहिए." यह एक अर्थ में, आज के आजाद ख्याल जेन जेड के उसके कार्यस्थलों के लिए एक ऐसी यात्रा है जो नौ से पांच की दफ्तर की कहानी को पीछे छोड़ चुका है.

- साथ में सोनल खेत्रपाल और एम.जी. अरुण


"यह समूह यह नहीं समझता कि समाधानों के लिए लचीलापन, धैर्य और अनुकूलन  क्षमता की जरूरत होती है... उन्हें प्रतीक्षा करने का कौशल हासिल करने की जरूरत है"
 - डॉ. समीर मल्होत्रा, मनोचिकित्सक

"यह पीढ़ी किसी चीज में खुद को पूरी तरह झोंकने से पहले उसके बारे में पूरी तरह इत्मीनान कर लेना चाहती है. इनमें से कई करियर की राह का फैसला करने से पहले विभिन्न अवसरों की पड़ताल करना चाहेंगे"
 - दिनेश सिंह, शिक्षाविद्


"जब बात विविधता और समावेशिता की आती है तो भारत में 88 फीसद जेन जेड के लोग ऐसी कंपनियों को तवज्जो देते हैं जो बातों पर अमल भी करती हैं"
 - सूजन मैथ्यू, एचआर डायरेक्टर, लिंक्डइन इंडिया

एलीशा पारिख, 17 वर्ष
एली द बेकर और केकीफाइ मिक्सेज की संचालक

अपने दो कारोबारों की मालकिन पारिख कहती हैं कि उद्यमी होने का सबसे अच्छा पहलू यह है कि आप अपना खुद का कुछ क्रिएट कर रहे हैं. वे कहती हैं, "जब लोग मुझसे बेकिंग के बारे में सलाह मांगते हैं तो बहुत संतोष होता है." पारिख अभी यूके में बोर्डिंग स्कूल में पढ़ रही हैं लेकिन बिजनेस पर नजर रखने के लिए अक्सर मुंबई आती हैं.

पारिख कहती हैं, "मैं सिर्फ बेकिंग के बारे में नहीं सोचती बल्कि कंपनी के वित्त और परिचालन पर भी विचार करती हूं. इस क्षेत्र में बहुत सारे अवसर हैं और मैं उन सभी में अपना कौशल बढ़ाना चाहती हूं." यह पूछने पर कि आपने कभी किसी दूसरे की कंपनी के लिए काम करने की बात सोची? उन्होंने कहा, "मैं एली द बेकर को तब से चला रही हूं जब मैं 13 साल की थी. मुझे अपना खुद का काम करने में आनंद आता है और इस काम को मैं किसी दूसरी फर्म के लिए नहीं कर सकती."

एलीशा पारिख, 17 वर्ष

 

उदिति मित्तले, 21 वर्ष
संस्थापक, चिक स्टेशनरी, मुंबई

उदिति मित्तले तब महज 13 साल की थीं जब उन्होंने अपने लिए विशेष नोटबुक तैयार करने के साथ वीकली प्लानर तैयार किया. मित्तले कहती हैं, "बचपन से ही मुझे घर पर स्टेशनरी एकत्र करने का जुनून था. स्कूल वाली नोटबुक के उबाऊ रंगों और कवर को देखकर मैं लगातार निराश थी." जूलरी डिजाइनर और उद्यमी मां से प्रेरणा पाकर मित्तले ने परिजनों और मित्रों के लिए अपने ब्रांड चिक स्टेशनरी के नाम से पर्सनलाइज्ड स्टेशनरी बनाना शुरू किया, जिसके "हरेक आइटम को डिजाइन करने 
के दौरान क्रिएटिविटी और लग्जरी का पूरा ख्याल रखा जाता है."

उदिति मित्तले, 21 वर्ष

उन्होंने पिछले साल ग्रेजुएशन किया और अपने सहपाटियों से अलग कैंपस प्लेसमेंट में न जाने की राह चुनी तथा अपना कारोबार चलाने को तवज्जो दी. हालांकि उन्होंने नौकरी करने के विचार को खारिज नहीं किया है. वे कहती हैं, "अनुशासन, उत्तरदायित्व, सामंजस्य, मेल-जोल जैसे कई गुण हैं जो कॉर्पोरेट नौकरी से आपमें आते हैं. हालांकि अपना बॉस खुद होने में आप और ज्यादा लचीला रुटीन अपना सकते हैं, कॉर्पोरेट नौकरी में टीम वर्क जैसी मूल खूबियों की जरूरत होती है जो अन्यथा आवश्यक नहीं समझी जाती हैं."

अद्वैत ठाकुर, 20 वर्ष


संस्थापक, एपेक्स इन्फोसिस इंडिया, मुंबई

अद्वैत ठाकुर ने 15 साल की आयु में अपनी टेक्नोलॉजी फर्म शुरू करने का फैसला किया. आज उनकी कंपनी स्मार्ट होम सिस्टम्स की माहिर है और लाइट, ऑडियो, सिक्योरिटी आदि के घरेलू उपकरणों को ऑटोमेट करती है. ठाकुर इस उद्यम को लेकर चिंतित रहते थे लेकिन सही माहौल बनाकर उन्होंने लंबी छलांग लगाई.

ठाकुर कहते हैं, "मैं बड़े लक्ष्य की ओर देख रहा था. मेरे आसपास मेरे मेंटोर और समान सोच वाले लोग थे जो मेरे नजरिए से इत्तेफाक रखते थे. उनके मार्गदर्शन से मैं शुरुआती बाधाएं पार कर सका." ठाकुर को अपना बॉस होना पसंद है. वे कहते हैं, "सर्विस सेक्टर की कंपनी में स्थायित्व और ढांचे में बंधा माहौल होता है लेकिन अपनी कंपनी होने की वजह से मुझे अपने रचनात्मक विचारों को जमीन पर उतारने और अपना रास्ता खुद ही बनाने का अवसर मिला."

- साथ में सोनल खेत्रपाल और एम.जी. अरुण

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