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कॉन्क्लेव 2024: ध्रुव जुरेल और सरफराज खान, साहस और क्रिकेट की दो दास्तान

साफ है, जब बच्चे कड़ी मेहनत करते हैं तो उनके माता-पिता दृढ़ संकल्प के साथ उनके पीछे खड़े रहते हैं. फिर ध्रुव तथा सरफराज की सफलता सरीखी कहानियां रची जाती हैं

बल्ला पकड़े क्रिकेटर ध्रुव जुरेल और गेंद को हवा में उछालते सरफराज खान
बल्ला पकड़े क्रिकेटर ध्रुव जुरेल और गेंद को हवा में उछालते सरफराज खान
अपडेटेड 3 अप्रैल , 2024

अपनी आक्रामक और बहुप्रचारित बैजबॉल शैली के लिए मशहूर अंग्रेज क्रिकेट टीम कुछ महीने पहले जब पांच मैचों की टेस्ट सीरीज खेलने भारत पहुंची तो मेजबान टीम पहले से ही मुश्किल में थी. अजिंक्य रहाणे और चेतेश्वर पुजारा की अनुभवी टेस्ट बल्लेबाज जोड़ी के विकल्प के तौर पर देखे जाने वाले के.एल. राहुल और श्रेयस अय्यर चोटों से जूझ रहे थे.

भारत की मुश्किल और बढ़ गई जब इसके स्टार बल्लेबाज विराट कोहली ने भी ब्रेक लेने का फैसला कर लिया. ऐसे में चयनकर्ताओं ने दो युवाओं को इन वरिष्ठ खिलाड़ियों की जगह लेने के लिए बुलाया. और फिर जो हुआ, आज सब कुछ सबके सामने है. 

अपनी पहली सीरीज में 23 वर्षीय ध्रुव जुरेल और 26 वर्षीय सरफराज खान, दोनों ने अहम योगदान दिया और उस सीरीज को भारत ने 4-1 से जीता. सरफराज ने अपने तीन टेस्ट मैचों में तीन पचासे बनाए, तो चौथे मैच की पहली पारी में विकेटकीपर-बल्लेबाज ध्रुव के शानदार 90 रनों और दूसरी पारी में नाबाद 39 रनों ने भारत को मैच जीतने में मदद की. इस तरह से पहली इनिंग में लीड से पिछड़ने के बावजूद भारत ने मैच और सीरीज अपने नाम कर ली. 

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में ध्रुव और सरफराज ने अपने जीवन संघर्ष को साझा किया. इससे न केवल उनके अदम्य साहस और दृढ़ संकल्प का पता चला, बल्कि यह भी जानकारी मिली कि उन्हें यहां तक पहुंचाने में उनके माता-पिता ने कितने त्याग किए हैं.

करगिल की जंग लड़ने वाले अनुभवी पिता के अनुशासन का युवा ध्रुव पर प्रभाव पड़ा और इससे उत्तर प्रदेश के क्रिकेटर को बैगी ब्लू कैप पहनने के अपने बचपन के ख्वाब को साकार करने में मदद मिली.

वहीं सरफराज के पिता की कविताएं उनके लिए ज्ञान का खजाना साबित हुईं जो मुंबई के इस बल्लेबाज को प्रेरित करती रहीं. खासकर उस समय, जब उन्हें घरेलू सर्किट में कई प्रभावशाली पारियां खेलने के बाद भी राष्ट्रीय टीम में अपना पहला मैच खेलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा. 

ध्रुव ने याद किया कि उनकी पहली क्रिकेट किट खरीदने के लिए किस तरह उनकी मां ने अपनी सोने की चेन बेच दी थी. उन्होंने वादा किया था कि जब वे अच्छी कमाई करने लगेंगे तो मां के लिए 'सोने का कुछ' खरीदेंगे. उन्होंने बताया, "मैंने पिछले साल वैसा ही किया." और फिर वह भावनात्मक क्षण आया जब ध्रुव के पिता नेम चंद ने कॉन्क्लेव में बेटे के पहले अर्धशतक के बाद उसकी प्रसिद्ध सलामी का जवाब अपनी गौरवपूर्ण सलामी के साथ दिया.

सरफराज ने याद किया कि वे अगले अभ्यास के लिए समय बचाने के लिए किस तरह ग्राउंड पर सोना पसंद करते थे. अन्य मौकों पर, उनके पिता बारिश में भीगते हुए उन्हें ग्राउंड तक ले जाते थे. अगर सरफराज आज जर्सी नंबर 97 पहनते हैं तो ऐसा केवल इसलिए नहीं कि उनका जन्म 1997 में हुआ था, बल्कि इसलिए भी कि जब 9 और 7 अंकों को हिंदी में एक साथ 'नौ-सात' बोला जाए तो वह उनके पिता के नाम नौशाद की तरह सुनाई देता है. किसी पिता के लिए, यह जानने से सुखद क्या होगा!

साफ है, जब बच्चे कड़ी मेहनत करते हैं तो उनके माता-पिता दृढ़ संकल्प के साथ उनके पीछे खड़े रहते हैं, और फिर ध्रुव तथा सरफराज की सफलता सरीखी कहानियां रची जाती हैं. ध्रुव कहते हैं, "टेस्ट क्रिकेट खेलना हमेशा से मेरा सपना था. मेरा मानना है कि यह क्रिकेट का सबसे खरा प्रारूप है."

वहीं सरफराज ने कहा, "टेस्ट क्रिकेट मुश्किल है क्योंकि यह पांच दिनों तक चलता है. इसके लिए लंबी रेस का घोड़ा बनना पड़ता है." हालांकि यह कहना अभी जल्दबाजी हो सकती है, मगर जिस तरह इन युवा खिलाड़ियों ने अपने अंतरराष्ट्रीय करियर का आगाज किया है, ऐसा लगता है कि भारत में टेस्ट क्रिकेट का भविष्य सुरक्षित हाथों में है.

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