पाकिस्तान में अकेला सबसे ताकतवर शख्स आम तौर पर फौज प्रमुख ही होता है और अभी उस ओहदे पर जनरल आसिम मुनीर हैं, जिन्होंने 29 नवंबर, 2022 को कुछ विवादों के बीच पाकिस्तान फौज की कमान संभाली थी, हालांकि उस समय वे सबसे वरिष्ठ लेफ्टिनेंट जनरल थे.
प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने उनको जनरल कमर जावेद बाजवा के स्थान पर चुना था जो एक विस्तार पाने के बाद अपने तीन साल के कार्यकाल की दो अवधि पूरी कर चुके थे. पता चला कि पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान जनरल मुनीर की नियुक्ति के पक्ष में नहीं थे. हालांकि असल में पीटीआई के सर्वेसर्वा ने सार्वजनिक रूप से इससे इनकार किया लेकिन बाद में हुई घटनाओं से इन शुरुआती अफवाहों की पुष्टि होती दिखाई दी.
जनरल मुनीर के प्रति इमरान की चिढ़ की कुछ वजहें थीं. पहला यह कि उनकी नियुक्ति से इमरान खान के पसंदीदा उम्मीदवार जनरल फैज हामिद की सेना प्रमुख बनने की संभावना तुरंत खत्म हो जाती. जनरल फैज पर आरोप है कि वे इमरान का मजबूत हाथ थे और 2018 के चुनाव से पहले नेताओं पर पीटीआई में शामिल होने के लिए दबाव डालने में मदद कर रहे थे और जब इमरान प्रधानमंत्री थे तो उस दौरान वे सियासी मामले भी देख रहे थे.
लेकिन जनरल मुनीर और इमरान खान के बीच तनाव होने का सबसे बड़ा संकेत यह था कि उन्हें अचानक आईएसआई के महानिदेशक पद से हटा दिया गया जबकि उन्होंने आठ महीने पहले ही 2019 में यह पद संभाला था. आईएसआई के मुखिया का सामान्य कार्यकाल तीन साल होता है.
यह भी चर्चा थी, कि जनरल मुनीर ने जब इमरान के नजदीकी लोगों के भ्रष्टाचार के मसले की तरफ उनका ध्यान खींचा तो समस्याएं खड़ी होने लगीं. उनकी जगह जनरल फैज को आईएसआई का मुखिया बनाया गया. हालांकि इसकी कभी पुष्टि नहीं हुई.
काफी अनुभवी अधिकारी
रावलपिंडी में जन्मे जनरल मुनीर को उत्कृष्ट अधिकारी माना जाता है. हालांकि यह भी सच है कि वे किसी फौजी अफसर के खानदान से नहीं हैं और वे मंगला में ऑफिसर्स ट्रेनिंग स्कूल के जरिए 1986 में फौज में भर्ती हुए. मंगला में उन्हें 'स्वर्ड ऑफ ऑनर' का प्रतिष्ठित सम्मान मिला. वे काकुल का हिस्सा कभी नहीं रहे जबकि उनसे पहले के सभी सेनाध्यक्ष काकुल में लंबे प्रशिक्षण दौर से गुजरे हैं.
उनकी सैन्य परिवार की भी पृष्ठभूमि नहीं है. उनके पिता स्कूल शिक्षक थे और एक मस्जिद में इमाम थे. उनकी शुरुआती शिक्षा मदरसे में हुई. उन्होंने साल साल की उम्र में ही कुरान को कंठस्थ कर लिया. यही वजह है कि उन्हें अक्सर हाफिज साहब कहा जाता है जिसका मतलब है जिसने कुरान को कंठस्थ कर रखा हो.
वे जनरल बाजवा के करीबी रहे हैं और उन्होंने उनकी मातहती में इन्फैंट्री ब्रिगेडियर के रूप में काम किया, सियाचिन समेत फोर्स कमान नॉर्दर्न एरियाज में फौज की कमान संभाली. वे गुजरांवाला में भी कोर कमांडर रहे और अपने करियर के दौरान पूरी फौज को आपूर्ति करने वाले क्वार्टर मास्टर जनरल रहे. सबसे दिलचस्प शायद यह है कि वे इकलौते ऐसे फौज प्रमुख हैं जो मिलिट्री इंटेलिजेंस (सैन्य खुफिया) और आईएसआई दोनों के प्रमुख रहे.
इस्लामाबाद हाइकोर्ट के अहाते से इमरान खान की गिरफ्तारी के बाद जब 9 मई, 2023 को पूरे पाकिस्तान में हिंसक झड़पें हुईं तो पीटीआई समर्थकों के खिलाफ देश भर में धरपकड़ की गई. सेना के भीतर मौजूद सूत्रों का दावा है कि जनरल मुनीर इससे सहमत थे कि यह दंगा-फसाद फौज के भीतर बगावत भड़काने की सुनियोजित कोशिश थी. लिहाजा, फौज ने दंगाइयों के खिलाफ सैन्य अदालतों में मुकदमा चलाने के लिए दबाव डाला, हालांकि नागरिक समाज के एक तबके और अदालतों ने इसका विरोध किया.
जनरल मुनीर ने सियासी तौर पर पक्षपात का जोरदार तरीके से खंडन किया है और देश में जम्हूरियत को समृद्ध होते देखने का अपना संकल्प जताया है, लेकिन पीटीआई में कई लोग मान रहे हैं कि उनकी मौजूदा समस्याएं तब तक खत्म नहीं होंगी जब तक कि जनरल मुनीर के हाथ में कमान है.
विदेश में बैठे पार्टी के कई समर्थक सोशल मीडिया पर उन्हें लगातार निशाना बनाते रहे हैं. पाकिस्तान की सियासत जिस तरह बंटी हुई है, उसमें आने वाले महीनों में जनरल मुनीर को राजनैतिक रूप से तटस्थ रहते हुए सेना की मांगों के साथ संतुलन साधना पड़ेगा. साथ ही, यह आश्वस्त करना होगा कि सशस्त्र सेना का उम्मीदों भरा यह विश्वास बना रहे कि उसके भले में ही पाकिस्तान का भला है.
—हसन जैदी

