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राम मंदिर पर पक्ष-विपक्ष: हिंदुत्व का औपनिवेशीकरण या देश का गौरव?

टिप्पणीकार और नेता योगेंद्र यादव कहते हैं कि ये एक ऐसा हिंदू सियासी समुदाय बनाने की कोशिश है जिसका देश में पहले वजूद नहीं था

vox pop
राम मंदिर पर विद्वानों का राय
अपडेटेड 9 फ़रवरी , 2024

रूपा गांगुली, भाजपा की नेता

आज मोदी जी और राम मंदिर आंदोलन से जुड़े कई लोगों का लंबे समय से चला आ रहा वादा प्राण प्रतिष्ठा के साथ पूरा हुआ. मैं मुख्य रूप से काली, सरस्वती और लक्ष्मी की उपासक हूं, पर राम के प्रति लोगों की भावनाओं को भी समझती हूं. लाखों भारतीयों की आस्था सिया राम में है और आज उनके सपने साकार हुए, जैसे मेरे हुए. मुद्दे को राजनैतिक बनाने का कोई मतलब नहीं है. जो लोग इस कदम के आलोचक हैं, उनसे मैं यही कह सकती हूं कि राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा उतनी ही महान उपलब्धि है जितनी चांद पर भारत का उतरना या जी20 शिखर सम्मेलन की सफल मेजबानी करना था.

आशुतोष कुमार, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय

राम मंदिर के प्रति उत्साह अखिल भारतीय परिघटना शायद न हो. प्रायद्वीपीय भारत, मसलन तमिलनाडु, में राम उतने लोकप्रिय नहीं हैं. मीडिया और भाजपा-शासित केंद्र ने जिस तरह इस आयोजन का तानाबाना रचा है, उससे पार्टी और उसके नेता की हिंदुत्व की साख में निश्चित रूप से इजाफा होगा. मंडल लहर में बनी जाति आधारित पा‌र्टियां अब इस उद्घाटन से पैदा हिंदुत्व की व्यापक लहर से जूझ रही हैं. हालांकि इससे जाति आधारित और क्षेत्रीय असमानताएं, आर्थिक संकट, बेरोजगारी और लोकतांत्रिक संस्थाओं का हनन खत्म नहीं होगा. अल्पसंख्यक भी कटे हुए और अलग-थलग हैं.

योगेंद्र यादव, नेता, एक्टिविस्ट और टिप्पणीकार
यह एक ऐसा हिंदू सियासी समुदाय बनाने की कोशिश है जिसका देश में पहले वजूद नहीं था. जो एक समान है, जिसमें संप्रदाय कोई मायने नहीं रखते. यह जाति से होकर नहीं जाता बल्कि उन पर परदा डालता है. यह क्षेत्रीय भिन्नताओं को लगभग मिला देता है. यह चतुर कोशिश है पर दुष्ट भी है. यह राज्यसत्ता और धर्म का रिश्ता उलटने की पहली कोशिश है. यह सियासी सत्ता के हाथों हिंदुत्व के औपनिवेशीकरण की पहली कोशिश है.

मुंबई के शिवाजी पार्क में शिवसेना की एक रैली

 

कुमूल अब्बी, प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, पंजाब विश्वविद्यालय

राम मंदिर 'भारतीयपन’ के दावे और पहचान की पुनर्प्राप्ति के बीच सीधी कड़ी जोड़ता है. उस उदारीकृत दुनिया में यह ज्यादा अहमियत रखता है जहां हमें छिन्न-भिन्न पहचानों, बदलती सीमाओं और अस्थिरता का सामना करना पड़ता है. जमीन से गहरे जुड़े होने का यह एहसास आस्था और राष्ट्रवाद के प्रबल बोध का निर्माण करता है. युवा पीढ़ी में धार्मिकता की भावना है. धर्म ने खासकर कोविड के बाद की अनिश्चित दुनिया में सहारा दिया और यह आश्रय है. अलगाव और सामाजिक मीडिया की बमबारी से उत्पन्न इस सारी उथल-पुथल में यह ऐसा आधार है जो जिंदगी को मायने देता है, जेनरेशन जेड की अस्तित्वगत चिंता की रामबाण दवा है.

राम समकालीन भारत के दैवीय प्रतीक के तौर पर उभरे हैं- शुचिता की भावना के साथ उदात्त और सच्चे, जिन्होने परंपरा और मूल्यों के लिए सब कुछ बलिदान कर दिया. ये गुण उन्हें कुलीनों, मध्यम वर्ग और सबाल्टर्न का दुलारा बना देते हैं.


दीया कुमारी, उपमुख्यमंत्री, राजस्थान

असल में मैं प्रफुल्लित और विनीत हूं. हम सब दशकों से इस ऐतिहासिक क्षण का इंतजार कर रहे थे. किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि हम अपने जीवनकाल में यह ऐतिहासिक दिन देखेंगे, पर पांच सौ से ज्यादा वर्षों का इंतजार आज खत्म हो गया, और यह सब प्रधानमंत्री मोदी के निर्णायक नेतृत्व की बदौलत हुआ.

राम मंदिर भारत का, आधुनिक और आत्मनिर्भर भारत का, लेकिन प्राचीन मूल्य व्यवस्था वाले भारत का प्रतीक है. यह हमारे देश की आध्यात्मिक शक्ति का निचोड़ है और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत होगा.

हिमांशु गुलाटी, सांसद, नॉर्वे

राम मंदिर हमारे लिए हिंदू आध्यात्मिकता की संस्कृति के बारे में और अधिक जागरूक होने का अवसर है. यह मंदिर भारत के लिए राष्ट्रीय गौरव का विषय होना चाहिए, फिर किसी का धर्म या राजनीति जो भी हो. इसका उद्घाटन अखिल विश्व परिघटना भी है. युवाओं का उत्साह धार्मिकता में बढ़ोतरी नहीं बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान में उनका गौरव दर्शाता है.

ध्रुब प्रतिम शर्मा, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान विभाग, गुवाहाटी विश्वविद्यालय

किसी भी मुद्दे का उभार उसकी अभिव्य‌क्ति और स्थानीय मुद्दों से उसके जुड़ाव के तरीके पर निर्भर करता है, और इसलिए मौजूदा परिदृश्य पर वह प्रासंगिकता हासिल कर लेता है. भौगोलिक जगह के तौर पर तकरीबन अप्रसिद्ध रहा अयोध्या अब हिंदू कल्पना में केंद्रीय है, ठीक उसी तरह जैसे मुसलमानों के लिए मक्का.

जातिगत अत्याचार, दरकिनार समुदायों का अलगाव और आॢथक संकट भारत भर में प्रासंगिक बने हुए हैं, पर चुनावी जोड़-तोड़ में वे तब तक केंद्रीयता हासिल नहीं कर सकते जब तक उन्हें इस ढंग से नहीं उठाया जाता कि वे धार्मिक गोलबंदी को तोड़ पाएं.

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