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मायावती: दबे कुचलों की आवाज बनने वालीं एक कुशल नेता

अपने कार्यकाल के दौरान मायावती ने उत्तर प्रदेश में शानदार शासन किया. उन्होंने प्रदेश को पहली बार विकास के क्षेत्र के रूप में खोला और कुछ वक्त के लिए पूंजीपति इससे खूब आकर्षित हुए

मायावती
अपडेटेड 5 जनवरी , 2024

इंद्रपुरी जेजे कॉलोनी उन बदहाल और संघर्षपूर्ण झुग्गी कॉलोनियों में से एक है जिनसे शासन-व्यवस्था मुंह मोड़ लेती है. 21 वर्षीया कुमारी मायावती दास वहां स्कूल शिक्षिका थीं और आईएएस अधिकारी बनने का ख्वाब देख रही थीं. तभी कांशीराम उनके पारिवारिक घर में आए थे. वह साल था 1977. कांशीराम उस वक्त आंबेडकर के बाद भारत की सबसे बड़ी दलित शख्सियत बनने की राह पर थे—सियासी रूप से सशक्त बहुजन बनाने की खातिर गांव-गांव बैठकें करने के लिए साइकिल से यात्रा कर रहे थे.

उनकी शिष्या ने न केवल उनके दृष्टिकोण को बल्कि गतिशील, स्वतंत्र और बहुत प्रभावशाली आदर्श को मूर्त रूप दिया. साल 1995 में वे भारत में पहली महिला दलित मुख्यमंत्री बनीं और जेंडर तथा जाति, दोनों के पूर्वाग्रहों को दरकिनार करते हुए उन्होंने खुद का एक आदर्श संस्करण निर्मित किया—खुद को संगमरमर की मूर्ति तक ऊंचा कर लिया जिसमें उनकी छवि हैंडबैग के साथ उकेरी गई है. वह चीज उपहास उड़ाने वाले जातीय अभिजात्य तबके के लिए हंसी का विषय थी, तो वंचित जनता के लिए आशा की प्रतीक थी जिनकी आवाज मायावती उठाती रही हैं.

अपने कार्यकाल के दौरान मायावती ने उत्तर प्रदेश में इस तरह शानदार शासन किया जैसा किसी और ने कभी नहीं किया था. उन्होंने प्रदेश को पहली बार विकास के क्षेत्र के रूप में खोला और कुछ वक्त के लिए पूंजीपति इससे खूब आकर्षित हुए, ताज एक्सप्रेसवे की नींव रखी और प्रदेश को अराजकता से बाहर निकालकर कानून का ऐसा राज स्थापित किया कि प्रभुत्वशाली जातियों के अपराधियों से लेकर तौलिये वाली कुर्सी पर बैठे पुलिस अधिकारियों की रीढ़ में सिहरन पैदा हो जाती थी.

अपने गुरु के सिद्धांत के अनुरूप, मायावती ने अपनी दलित केंद्रित बसपा की सत्ता हासिल करने और उसे बढ़ाने के लिए हरसंभव प्रयास किए: कड़वाहट आने से पहले तक मुलायम सिंह यादव से मित्रता बनाए रखी, भाजपा की मदद से खुद को मुख्यमंत्री पद तक पहुंचाया, दलित-मुसलमानों को एक साथ लाकर वंचितों का गठजोड़ बनाया, दलित-ब्राह्मण गठजोड़ पर वापस लौटीं, प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए वामपंथियों से मेल-जोल किया लेकिन नाकाम रहीं, और फिर मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव के साथ महागठबंधन बनाया जो विचार तो शानदार था लेकिन तुरंत ही दफ्न हो गया. साल 2012, 2017 और 2022 में लगातार विधानसभा चुनावों में हार के बाद उनकी किस्मत छोटी पड़ती जा रही है. पिछली बार उन्होंने राज्य में केवल एक सीट जीती और 12.7 फीसद वोट पाए थे जहां दलितों की आबादी 20 फीसद है.

सात बार की सांसद और चार बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती ने खुद को प्रासंगिक बनाए रखने के लिए हर रणनीति अपनाई है, जिसमें अपने अगले कदम को लेकर रहस्यमय तरीके से चुप्पी साधना भी शामिल है. 15 राज्यों में उनकी मौजूदगी (और एक राष्ट्रीय वोट हिस्सेदारी जो कभी 6 फीसद से अधिक थी) होने की वजह से इंडिया गठबंधन की दिलचस्पी उनमें कायम है—और भाजपा भी उन्हें बड़ी उत्सुकता से देखती है. यह वही पुरानी अप्रत्याशित गतिशीलता है.

सुनील मेनन, साथ में प्रशांत श्रीवास्तव

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