हठ या जिद और धुन का पक्का होना क्या होता है, यह कोई भी मासूमा रिजवी को देखकर सीख सकता है. किसी चुनौती को न कहना तो शायद उनके शब्दकोश का हिस्सा ही नहीं है. हो सकता है कि उनके फैसले कई लोगों को बहुत साहसिक लगें लेकिन उनका मानना है कि कुछ भी असंभव नहीं होता. और वे अपनी इसी धारणा पर कायम रहती हैं कि अगर कोई एक चीज काम नहीं करती है तो हमेशा एक प्लान बी मौजूद होता है.
देश के कुछ सबसे ज्यादा चर्चित और सराहनीय सार्वजनिक आर्ट प्रोजेक्ट के पीछे छिपी मासूमा की मेहनत उनके इसी दृढ़विश्वास का नतीजा है. इस प्रतिष्ठित सूची में नई दिल्ली के नए संसद भवन का 'इंडिया कॉरिडोर’, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति भवन का एक प्रोजेक्ट, मानेकशॉ केंद्र और सुषमा स्वराज भवन, और जयपुर का अमर जवान ज्योति स्मारक पार्क आदि शामिल हैं.
'वोकल फॉर लोकल’ की समर्थक रिजवी ने अपनी कला यात्रा 22 साल पहले शुरू की थी और उन्होंने हमेशा जगहों और इमारतों को उपयोगी बनाने और उन्हें अपने आसपास के परिवेश के अनुरूप ढालने का प्रयास किया. उन्होंने अमेरिका में आर्किटेक्चर में अध्ययन किया और मास्टर डिग्री और पीएचडी हासिल की.
ललित कला संरक्षण को लेकर उनका कहना है, "मैं वॉलपेंटिंग को संरक्षित करना चाहती हूं क्योंकि मेरा मानना है कि इनमें हमारे अतीत और भविष्य की कहानी समाई है." रिजवी का मानना है कि हर त्योहार मनाने वाले उनके परिवार की बहु-धार्मिक और बहु-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि ने ही उन्हें ऐसे इंसान के तौर पर विकसित किया, जो वे आज बन पाई हैं. सेना से रिटायर पति और दो बच्चों—एक बेटा और एक बेटी—को वे अपनी सबसे बड़ी ताकत मानती हैं.
रिजवी दबाव में आकर झुकने या शॉर्टकट अपनाने वालों में नहीं हैं. वे कहती हैं, "आखिर में जब आप सोने जाते हैं तो आपने जो किया, उसकी खुशी होनी चाहिए. तो, समझौतों वाली जिंदगी क्यों जिएं?"
—शैली आनंद

