
पद्मजा चुंदुरू का करियर 1984 में भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की प्रोबेशनरी ऑफिसर बनने के साथ शुरू हुआ, पर 2000 के दशक की शुरुआत में वे अमेरिका में बैंक के कामकाज की प्रमुख थीं. यही वजह है कि वे नौजवानों को सलाह देती हैं कि ''कभी कोई मौका हाथ से मत जाने दो.'' वे कहती हैं, ''रास्ते निकल ही आते हैं. 2001 में मैंने एसबीआई लॉस एंजेलिस में पोस्टिंग ली और अपने दो बेटों के साथ चार साल मुझे अकेले संभालना पड़ा, पर बाद में इसका फायदा मिला.''
चुंदुरू आगे चलकर देश के सबसे बड़े बैंक की डिप्टी एमडी बनीं और फिर 2018 में इसे छोड़कर एमडी के रूप में इंडियन बैंक से जुड़ीं. वहां उन्होंने अपने बैंक में इलाहाबाद बैंक के विलय की सफल देख-रेख की, जिससे संयुक्त इकाई देश में सार्वजनिक क्षेत्र का सातवां सबसे बड़ा बैंक बन गई. करियर बैंकर ने भारतीय जीवन बीमा निगम और भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के बोर्ड में भी डायरेक्टर के तौर पर काम किया.
2021 में एनएसडीएल का प्रमुख का पद संभालने के बाद उन्हें बाजार नियामक सेबी की बेहतर निगरानी और दक्ष अमल की जरूरतों के अनुरूप डिजिटल टेक्नोलॉजी और वित्तीय बाजारों की अपनी गहरी समझ को कसौटी पर कसना पड़ा. एनएसडीएल इस वक्त 370 लाख करोड़ रु. के कस्टडी मूल्य के साथ 34 लाख डीमैट खातों को संभालता है.
चुंदुरू ने डिबेंचर की सुरक्षा और कोवेनेंट मॉनिटरिंग के लिए पेचीदा डिस्ट्रिब्यूटेड लेजर ब्लॉकचेन टेक्नोलॉजी आधारित प्लेटफॉर्म के सफल एकीकरण की देखरेख की. इस सिस्टम में प्रतिभूति के सृजन से लेकर डिबेंचर न्यासियों के हाथों लगातार कोवेनेंट मॉनिटरिंग और रेरिंग एजेंसियों की तरफ से गैर-परिवर्तनीय प्रतिभूतियों की क्रेडिट रेटिंग तक पूरी प्रक्रिया शामिल है.
चुंदुरू 2022 में अनजाने ही एक वायरल घटना का हिस्सा बन गईं जब वे मंच से बोल रही थीं और केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सीट से उठकर उन्हें पानी की बोतल दी. (एनएसजीएल की मुखिया ने किसी पदधारी को इशारा किया था कि उन्हें एक गिलास पानी की जरूरत है). वित्त मंत्री की इस जेस्चर को सोशल मीडिया पर खूब सराहा गया. एनएसडीएल का 27 साल का इतिहास संस्थान के सफर को दर्शाता है, कैसे इसके नेतृत्वकर्ताओं ने इसे आकार दिया और पूंजी बाजारों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा.
अब चुंदुरू का कार्यकाल भी अलहदा नहीं रहा है, खासकर इसलिए भी कि बाजार में जोरदार चर्चा है कि यह डिपॉजिटरी सार्वजनिक होने पर विचार कर रही है. अगर ऐसा होता है तो नियमों के तहत एनएसडीएल के संस्थापकों आईडीबीआई बैंक और एनएसई को अपनी हिस्सेदारी कम करनी होगी. चुंदुरू का अगला बड़ा काम यह तय करना होगा कि एनएसडीएल वित्तीय बाजारों में उतरना चाहता है या रणनीतिक भागीदार की तलाश करना चाहता है.
सिंधु गंगाधरन

सिंधू गंगाधरन ने इंजीनियरिंग कॉलेज में जाने का फैसला किया, तो पिता ने सुझाव दिया कि इसके बजाय वे मेडिकल की पढ़ाई करें. ''मैंने कहा, 'नहीं, मुझे टेक्नोलॉजी में जाना है'. यह बिल्कुल साफ था.'' 1990 के दशक के आखिरी सालों में जब उन्होंने कंप्यूटर साइंस में ग्रेजुएशन किया, उनके गृहनगर बेंगलूरू में सॉफ्टवेयर का बूम साफ जाहिर था. वे कहती हैं, ''और देखिए टेक में होना कूल था और आप ढेरों चीजें कर सकते थे. यह बहुत साफ तौर पर आकर्षक था.''
1999 में वे एसएपी या सैप से जुड़ गईं, जिसने एक ही साल पहले बेंगलूरू में आरऐंडडी सेंटर बनाया था. उसके तुरंत बाद वे वॉलडोर्फ चली गईं, जहां टेक्लनोलॉजी की इस दिग्गज कंपनी का मुख्यालय है. वहां 18 साल काम किया. 2019 के आखिर में वे एसएपी लैब्ज इंडिया की मैनेजिंग डायरेक्टर बनकर लौटीं, जहां पांच शहरों में 12,800 कर्मियों के साथ कंपनी के वैश्विक आरऐंडडी स्टाफ के 40 फीसद लोग काम करते हैं.
वे बताती हैं कि भारत अकेली जगह है जहां एसएपी का पूरा उत्पाद पोर्टफोलियो फैला है. स्कूल और कॉलेज में टॉपर रही सिंधू का कहना है कि वे हमेशा मेहनतकश रही हैं. फिलहाल सिंधू सॉफ्टवेयर उद्योग की संस्था नैसकॉम की वाइस-प्रेसिडेंट भी हैं.
सिंधू के शुरुआती अनुभवों में स्कूल में स्काउट्स ऐंड गाइड्स का लीडर होना भी है—यानी अपने दम पर बहुत सारी चीजें करना, जैसे तंबू लगाना या अपना खाना बनाना. वे बताती हैं, ''मैं काफी बेक करती हूं. इसलिए रविवार को रसोई में रहती हूं.'' उनकी बेकिंग ऐसी है कि दफ्तर में सोमवार सुबह की बैठक में उनके सहयोगी भी इंतजार करते हैं, कुछ अच्छा फूड फॉर थॉट!

