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पीवी सिंधु, मीराबाई चानू, हरमनप्रीत: खेलों में पुरुष प्रधानता को चुनौती देेने वाली महिलाएं

पीवी सिंधु दो अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल कर चुकी हैं. पहली, 2019 में बैडमिंटन की विश्व चैंपियन बनने वाली पहली और अकेली भारतीय एथलीट. दूसरी, लगातार दो ओलंपिक पदक

बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु

पीवी सिंधु

पुसर्ला वेंकट सिंधु यानी पीवी सिंधु दो अभूतपूर्व उपलब्धियां हासिल कर चुकी हैं. पहली, 2019 में बैडमिंटन की विश्व चैंपियन बनने वाली पहली और अकेली भारतीय एथलीट. दूसरी, लगातार दो ओलंपिक पदक (रजत और कांस्य). अब पेरिस 2024 की तैयारी करते हुए 28 साल की इस एथलीट की निगाह एक और ओलंपिक मेडल पर है, जो कि उम्मीद है, इस बार गोल्ड होगा.

हालांकि, विश्व चैंपियनशिप में पांच बार की पदक विजेता को पिछले अगस्त से चोटों से जूझना पड़ा, यहां तक कि उस दौर में भी जब उन्होंने बर्मिंघम में 2022 के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीता. अब वे जल्द हालात बदलने की उम्मीद कर रही हैं. वे कहती हैं, ''अगले ओलंपिक में सोना जीतने के लिए मुझे हर दिन अपना सर्वश्रेष्ठ देना है. पेरिस पहुंचने से पहले एक लंबी यात्रा है. यह मुझे रोज कड़ी मेहनत करने के लिए प्रेरित करती है, ताकि शारीरिक और मानसिक रूप से ज्यादा मजबूत बनूं.'' भारत के पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी प्रकाश पादुकोण उनके खेल में सुधार लाने में मदद कर रहे हैं.

सिंधु 10 साल की थीं जब वे अपने पिता और वॉलीबॉल के अर्जुन पुरस्कार विजेता खिलाड़ी पी.वी. रमण के साथ खेल देखने गईं. लेकिन बगल के बैडमिंटन कोर्ट पर जो कुछ हो रहा था, उसने उनका मन मोह लिया. रमण उन्हें भारत के दूसरे ऑल इंग्लैंड चैंपियन पुलेला गोपीचंद की अगुआई में संचालित अकादमी ले जाते. गोपीचंद की देखरेख में सिंधु ने 14 साल की उम्र में पहली बार 2009 में इंटरनेशनल सर्किट में खेला और तब से लगातार कामयाबियां हासिल करते हुए वे चैंपियन बनकर उभरीं.
 

बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु

वे दूसरों से सुझाव लेने को हरदम तैयार रहती हैं. शीर्ष खिलाड़ियों में यह गुण विरले ही होता है. उनका आभामंडल लंबी-छरहरी और आक्रामक खिलाड़ी के तौर पर है, जो कोर्ट के हर कोने में पहुंचने के लिए अपनी लंबाई का इस्तेमाल करती हैं. फिलहाल वे विश्व रैंकिंग में 11 नंबर पर हैं. सिंधु ने 2024 में अपने लक्ष्य साफ तय कर रखे हैं. आने वाला साल उनके और भारत के लिए ऐतिहासिक हो सकता है.

मीराबाई चानू

मणिपुर की वेटलिफ्टर मीराबाई चानू ने अपने अगले लक्ष्य ओलंपिक स्वर्ण पदक पर पूरा ध्यान केंद्रित कर रखा है. 2020 टोक्यो ओलंपिक (जो 2021 में आयोजित हुआ था) में रजत पदक जीतकर कर्णम मल्लेश्वरी के बाद वे ओलंपिक पदक जीतने वाली दूसरी भारतीय वेटलिफ्टर बन गई थीं. अभी अपनी चोट से पूरी तरह उबर न पाने के बावजूद चानू टोक्यो ओलंपिक के अपने प्रदर्शन को सुधारने की कोशिश में दिसंबर में दोहा में IWF ग्रॉन प्री-2 में शामिल हईं. 2024 पेरिस ओलंपिक के टिकट के लिए इसमें हिस्सा लेना जरूरी है. उन्होंने सितंबर में रियाद में आयोजित 2023 विश्व चैंपियनशिप के दौरान भी यही किया था. उनका लक्ष्य अब एशियाई चैंपियनशिप के लिए फिट होना है, जो एक और ओलंपिक क्वालीफाइंग प्रतियोगिता है.

राष्ट्रमंडल खेलों में दो बार स्वर्ण पदक जीतने वाली चानू को 2018 में मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. 2022 में कलाई में दिक्कत के बावजूद उन्होंने कोलंबिया के बोगोटा में वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीता. 2016 में रियो ओलंपिक से बाहर होने के बाद उन्होंने खुद को दुनिया से अलग-थलग कर लिया और सिर्फ अपने खेल पर फोकस किया. पांच साल बाद ताशकंद में एशियाई चैंपियनशिप में उन्होंने अविश्वसनीय ढंग से 119 किलोग्राम वजन उठाकर एक नया विश्व रिकॉर्ड बनाया.

वेटलिफ्टर मीराबाई चानू

इंफाल से 45 किमी दक्षिण में नोंगपोक काकचिंग गांव में जन्मीं चानू पहले तीरंदाज बनना चाहती थीं. लेकिन आठवीं कक्षा में उन्होंने मणिपुर की वेटलिफ्टर कुंजारानी देवी के बारे में पढ़ा और उनके ही नक्शेकदम पर चलने का फैसला कर लिया. इसमें उन्हें अपनी मां का पूरा समर्थन भी मिला जो देखती थीं कि चानू घर में ऐसी भारी चीजों को भी आसानी से उठा लेती थीं, जो उनके भाई नहीं उठा पाते थे. आगे चलकर उन्होंने भी कभी मां को निराश नहीं किया.

हरमनप्रीत कौर

पंजाब में 1980 के दशक के खराब माहौल की वजह से हरमिंदर सिंह भुल्लर का खेलों में कुछ कर दिखाने का सपना तो परवान नहीं चढ़ सका, पर उन्होंने कसम खाई कि सपने साकार करने में अपने बच्चों की मदद जरूर करेंगे. खेल की सबसे पुरानी याद कौर को तब की है जब वे पिता के साथ बाइक पर जाती थीं और उनके मोहल्ले वाले मैचों में फील्डिंग करती थीं. वे बताती हैं, ''वे निचले क्रम पर बल्लेबाजी करते थे. मैं बस इतना जानती थी कि छक्के मारने वालों को बहुत सराहा जाता है.'' यह बात उन्होंने पकड़ ली.

कौर ने 15 साल की उम्र तक लड़कों के साथ क्रिकेट खेला. उनके तेज-तर्रार और आक्रामक होने की वजह शायद यही है कि उन्होंने ऊबड़खाबड़ गली क्रिकेट खेला है. वे कहती हैं, ''आप हारेंगे तो दोस्त चिढ़ाएंगे. इसलिए अगला मैच जीतने को पूरी जान लड़ा देनी पड़ती.'' अलबत्ता स्कूल में लड़कियों के साथ खेलना शुरू करने पर उन्हें अपने को शांत करने के साथ बात करने का तरीका बदलना पड़ा.

क्रिकेटर हरमनप्रीत कौर

भारतीय महिला क्रिकेट टीम में कौर बीते एक दशक से दबदबा रखने वाली ताकत रही हैं. उन्होंने महिला क्रिकेट को विकसित होते देखा है. वो कहती हैं, ''हमें पता था कि हमें कुछ खास करना होगा, तभी हम दर्शक, पैसे और मीडिया को आकर्षित कर पाएंगे.'' कौर अपनी कथनी को करनी में बदल भी रही हैं. 2016 में वे ऑस्ट्रेलियन बिग बैश लीग खेलने वाली पहली भारतीय (महिला या पुरुष दोनों में) खिलाड़ी बनीं. उनकी कप्तानी में भारत ने जितने T20I खेले, उनमें से आधे से ज्यादा जीते (57 जीते, 38 हारे). पिछले साल कैंटरबरी में इंग्लैंड के खिलाफ उनके सनसनीखेज 143 नाबाद रन याद दिलाते हैं कि वे खेल का रुख बदल सकने वाली खतरनाक बल्लेबाज क्यों हैं. कौर को खुशी है कि वे खेल में करियर बना पाईं.

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