
मारियाजीना जॉनसन, 42 वर्ष
चांसलर, सत्यभामा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी, चेन्नई
जमीन से जुड़ी और सहज-सरल मारियाजीना जॉनसन को देखकर यह कल्पना तक कर पाना मुश्किल है कि इस हमेशा मुस्कराते चेहरे के पीछे एक फौलादी इरादों वाली महिला है, जो चुनौतियों से सीधे टकराने से कभी नहीं कतराती. चेन्नई स्थित प्राइवेट डीम्ड-टु-बी-यूनिवर्सिटी सत्यभामा इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस ऐंड टेक्नोलॉजी की चांसलर होने के नाते जॉनसन इस 36 साल पुरानी संस्था को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अकादमिक उत्कृष्टता, अनुसंधान और नवाचार का केंद्र बनाने में जी-जान से जुटी हैं.
फिर आश्चर्य क्या कि 1987 में इंजीनियरिंग कॉलेज के रूप में स्थापित और 2001 में यूनिवर्सिटी का दर्जा हासिल करने वाले इस संस्थान को नेशनल इंस्टीट्यूशनल रैंकिंग फ्रेमवर्क (एनआइआरएफ) में 2023 में सभी भारतीय विश्वविद्यालयों में 51वां पायदान हासिल हुआ.
सत्यभामा की स्थापना करने वाले राजनीतिज्ञ और शिक्षाशास्त्री दिवंगत डॉ. जेप्पिआर की बेटी जॉनसन ने मद्रास विश्वविद्यालय से मैनेजमेंट स्टडीज में डॉक्टरेट की है. शिक्षा की परिवर्तनकारी शक्ति में पूरा यकीन करने वाली जॉनसन कहती हैं, "मैं आसपास के लोगों से हमेशा कहती हूं कि देश को ताकतवर बनाने के लिए व्यक्ति को शिक्षित कीजिए."
ठीक इसी वजह से समावेशी नजरिया उनके और उनकी संस्था के लोकाचार के मूल में है. अन्बू फाउंडेशन, जिसकी सह-स्थापना उन्होंने अपने पति मैरी जॉनसन के साथ की, साधनों की कमी से जूझ रहे मेधावी छात्रों को पूर्ण छात्रवृत्ति देता है.
जॉनसन कहती हैं, "मैं भाग्यशाली हूं कि ऐसे मूल्यों के साथ पली-बढ़ी जिसने एक साथ बहुत-से काम करने का आत्मविश्वास मेरे भीतर बोया." मगर जब संभालना मुश्किल हो जाता है, तो उनका 'सपोर्ट सिस्टम’—मैरी जॉनसन और उनकी दो बेटियां—"हमेशा आगे आकर सब कुछ संभाल लेता है." युवतियों को उनकी क्या सलाह है? जॉनसन कहती हैं, "बाहर निकलो और अपनी बात कहो. सबसे अहम यह है कि अपनी पढ़ाई पूरी करो. शिक्षा बहुत सम्मान दिलाती है और आपकी जिंदगी के हर दौर में मदद करती है."
—शैली आनंद
सुधा मूर्ति, 73 वर्ष
लेखिका एवं परोपकारी

कर्नाटक की राजधानी बेंगलूरू में एक हालिया टेक इवेंट में इन्फोसिस के सह-संस्थापक और मानद चेयरमैन एन.आर. नारायण मूर्ति ने साफ स्वीकार किया कि उन्होंने अपने बच्चों अक्षता और रोहन के बचपन में उनके साथ बहुत कम वक्त बिताया और दोनों का पालन-पोषण उनकी पत्नी सुधा ने किया जबकि वे "मुझसे बेहतर इंजीनियर" थीं.
शिगगांव में 1950 में जन्मीं सुधा मूर्ति 1974 में पुणे में टेल्को, जिसे अब टाटा मोटर्स के नाम से जाना जाता है, में नौकरी पाने वाली पहली महिला इंजीनियर थीं. बेंगलूरू में भारतीय विज्ञान संस्थान में कंप्यूटर विज्ञान में मास्टर की पढ़ाई के दौरान पता चला कि कंपनी के विज्ञापन में इंजीनियरों को बुलाया गया है, पर 'महिला छात्रों को आवेदन नहीं करने’ को कहा गया है. उससे परेशान होकर उन्होंने जे.आर.डी. टाटा को एक पोस्टकार्ड भेजा और फिर उनको इंटरव्यू के लिए बुला लिया गया.
मूर्ति ने 1996 में इन्फोसिस फाउंडेशन की स्थापना की और 25 वर्षों तक उसकी चेयरपर्सन के रूप में काम किया. इस दौरान उन्होंने महिलाओं के वित्तीय और सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में काम किया. अन्य सामाजिक कार्यों में पुस्तकालयों, शौचालयों का निर्माण और 16 प्राकृतिक आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में मदद करना शामिल है.
वे बच्चों की किताबें, कहानियां, उपन्यास और यात्रा वृत्तांत समेत 248 शीर्षकों के साथ कन्नड़ और अंग्रेजी में बेस्टसेलर लेखिका रही हैं. वे खुद भी पढ़ाकू हैं. 60 साल की उम्र में मूर्ति ने इंडोलॉजी में डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया. वे बताती हैं, "मेरी दादी ने मुझसे कहा था कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती. जिस दिन आप सीखना बंद कर देंगे, आप बूढ़े हो जाएंगे."
—अजय सुकुमारन
हीरबाई इब्राहिम लोबी, 70 वर्ष
सामाजिक कार्यकर्ता

एक बार गुजरात के एक गांव में एक युवा महिला को आकाशवाणी पर आधुनिक कृषि तकनीक को समझाने वाली एक आवाज सुनाई दी, तभी उसे पता चला कि ज्ञान तो वायुतरंगों की यात्रा करता है. उस महिला हीरबाई लोबी ने सीमांत किसान और मजदूर के रूप में संघर्ष करते हुए अपने पिता से विरासत में मिली 0.5 हेक्टेयर जमीन पर खेती की. उन्होंने न केवल रेडियो पर सुनी गई जानकारी का इस्तेमाल किया बल्कि उस ज्ञान को अपने गांव जम्बूर की महिलाओं के बीच फैलाने का भी फैसला लिया.
जम्बूर के निवासी सदियों पहले भारत आए अफ्रीकियों के वंशज सिद्दी समुदाय से हैं. उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य देखभाल मुश्किल से मयस्सर थी. लोबी ने जो सबक सीखे उसे सिद्दी महिलाओं को सिखाने की कोशिश की और कुछ ही समय में जूनागढ़ जिले के तलाला तालुका के 14 गांवों में अपना काम फैला लिया. उन्होंने 2004 में महिला विकास फाउंडेशन की शुरुआत की.
इसने महिलाओं को सहकारी मॉडल में बचत करने, छोटे कर्ज, सलाह देने के साथ-साथ किराने की दुकान चलाने तथा सिलाई जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रम करने में मदद की. लोबी की कोशिशों से कई सिद्दी बच्चों को शिक्षा मिली. उनके जीवनभर के काम को 2023 में पहचान मिली जब उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया.
—जुमाना शाह

