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मालविका सरुक्कै और बिजयिनी सत्पथी: डांस को अपनी शर्तों पर स्थापित करने वाली नृत्यांगनाएं

सरुक्कै का कलावाहिनी ट्रस्ट 2016 से डांस इमर्सन प्रोग्राम (डीआइपी) का आयोजन कर रहा है, ताकि नर्तक-नर्तकियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जिससे वे तकनीक की कठिन संभावनाओं को समझें

भरत नाट्यम करती हुईं माललविका सरुक्कई
भरत नाट्यम करती हुईं माललविका सरुक्कई
अपडेटेड 15 जनवरी , 2024

बकौल भरतनाट्यम नृत्यांगना मालविका सरुक्कै, "नृत्य की छात्रा के नाते प्रेम गीत मुझे बहुत प्रिय थे. प्रेम कविता- भावनाओं की वह उथल-पुथल मेरे दिल को छूती रही, जो जीवन का अभिन्न अंग है." लेकिन कुछ वर्षों तक शृंगार रस में रमे रहने के बाद सरुक्कै के मन में सवाल उठने लगे. "मैंने कवियों की बनाई स्त्री पर गौर करना शुरू किया और महसूस किया कि मैं महिलाओं को खास ढांचे में ही पेश करने की आदी हो गई हूं... मुझे खुद को मुक्त करने का एहसास हुआ और अपने शरीर को नृत्य के जरिए बेझिझक अभिव्यक्त करना शुरू किया."

अब पांच दशकों बाद सरुक्कै ने नृत्य अपनी शर्तों पर स्थापित किया है. मसलन, 'अनुबंध-कनेक्टेडनेस' (2022) सरुक्कै की एकल, विलक्षण रचना प्रकृति और जीवन के बीच संबंधों को तलाशती है. 

सरुक्कै का कलावाहिनी ट्रस्ट 2016 से डांस इमर्सन प्रोग्राम (डीआइपी) का आयोजन कर रहा है, ताकि नर्तक-नर्तकियों को ऐसी शिक्षा दी जाए, जिससे वे तकनीक की कठिन संभावनाओं को समझें और अपने शरीर को उसी अनुरूप ढाल सकें. वे कहती हैं, "मैं नर्तक-नर्तकियों को यह प्रेरणा देने की उम्मीद करती हूं कि नृत्य को हल्के में नहीं लेना चाहिए और इसमें संपूर्णता का भाव ढूंढ़ना चाहिए."

स्त्री-प्रधान परिवार में नानी मीनाक्षी, मां सरोजा कामाक्षी और बहन प्रिया के साथ पली-बढ़ीं सरुक्कै ने भारतीय शास्त्रीय नृत्य में कायम पितृसत्ता का विरोध जारी रखा. सरुक्कै कहती हैं, मेरे इस सफर में साथ चलो, लेकिन आपको कंफर्ट जोन से बाहर निकलना होगा."

—अखिला कृष्णमूर्ति

बिजयिनी सत्पथी, 50 वर्ष
ओडिशी नृत्यांगना

बिजयिनी सत्पथी, ओडिशी नृत्यांगना

 

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में सबसे बड़ा संबंध-विच्छेद 2018 में हुआ, जब बिजयिनी सत्पथी ने प्रसिद्ध ओडिशी गुरुकुल नृत्यग्राम से नाता तोड़ लिया, जहां उन्होंने अपने जीवन के 26 साल दिए थे. सत्पथी की काया वह कैनवास थी जिस पर नृत्यग्राम की कोरियोग्राफर सुरूपा सेन ने नृत्य रचनाएं विकसित कीं, जिन्हें दुनिया भर में प्रशंसा मिली.

कहते हैं, महान कला महान पीड़ा से ही उपजती है. सत्पथी पहली बार 46 साल की उम्र में अपनी खुद की रचना के लिए विवश हुईं. वे कहती हैं, "मन में भारी संशय था और मुझे खुद को लगातार हिम्मत बंधानी पड़ती थी." निर्णायक मोड़ 2021-22 में न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन क्वयूजियम में रेजिडेंसी के दौरान आया, जिससे उनमें शैली में बदलाव का आत्मविश्वास पैदा हुआ.

नतीजतन 'अभीप्सा-ए सीकिंग' और 'प्रणति' जैसी रचनाएं आईं, जो कोरियोग्राफर की अपनी राय जाहिर करने और अलग नजरिया पेश करने की प्रतीक हैं. सत्पथी कहती हैं, "नृत्य इतने भाव, रस, सौंदर्य, भाषा, स्वरों से भरा हुआ है कि मुझे लगता है कि और कुछ भी कहने की जरूरत नहीं है."

सत्पथी खुद में परंपरा से हटने की प्रेरणा नहीं देखतीं, फिर भी कई मायनों में वे ऐसा कर रही हैं. यह सफेद बालों के साथ मंचीय प्रदर्शन करने के उनके कदम से स्पष्ट है. उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए युवा पीढ़ी को ओडिशी के प्रति आकर्षित किया है. अपनी शैली के नृत्य के छह साल बाद सत्पथी की चमक परवान चढ़ी है, बिल्कुल उनके सफेद बालों की तरह.

गीतांजलि श्री

गीतांजलि श्री, लेखिका

गीतांजलि श्री को उत्तर प्रदेश में अपने बचपन के दौरान अपने घर पर किताबों से घिरे रहना याद है.  वे बताती हैं, "पढ़ना अहम शगल था और मेरे पिता एक गंभीर हिंदी लेखक थे." गीतांजलि श्री की पुस्तक रेत समाधि (जिसका अंग्रेजी अनुवाद टूंब ऑफ सैंड के नाम से डेजी रॉकवेल ने किया) ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीतने वाली पहली भारतीय भाषा की लेखक बनाया.

गीतांजलि श्री के पिता सिविल सर्वेंट थे और उनका परिवार यूपी के कई शहरों में रहा. वे कहती हैं, "मेरा परिवार उस समय के कई मध्यम वर्गीय परिवारों के तौर-तरीकों को प्रतिबिंबित करता था—हमने अपेक्षाकृत बेहतर अंग्रेजी-माध्यम स्कूलों में पढ़ाई की, लेकिन घर पर अपनी मातृभाषा पढ़ी, सीखी और भाषा, साहित्य, शिक्षा का सम्मान किया."

विभिन्न शहरों में पलने-बढ़ने के कारण वे अपनी जड़ों से जुड़ी रहीं. प्रेमचंद, जिनके काम पर गीतांजलि श्री ने पीएचडी की, के अलावा जिन लेखकों ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया उनमें रेणु, कृष्णा सोबती और इंतेजार हुसैन शामिल हैं. 

गीतांजलि श्री की पहली कहानी बेल पत्र 1987 में छपी थी. उनके उपन्यास माई के साहित्य अकादमी पुरस्कार विजेता अंग्रेजी अनुवाद ने उन्हें व्यापक पहचान दिलाई. वे बताती हैं, "किताबें कई चीजों से बनी होती हैं. रेत समाधि के लिए वह एक बुजुर्ग पीठ की छवि थी, एक ऐसे व्यक्ति की पीठ जो जीवन से थक चुका है और जाने की प्रतीक्षा कर रहा है.

यह ऐसे व्यक्ति में बदल गया जो...एक और पारी खेलने के लिए उतावला है." गीतांजलि श्री एक महिला के रूप में लेखिका होने की चुनौतियों के प्रति सचेत हैं. वे कहती हैं, "ऐसे व्यवस्थित तरीके हैं जिनसे मुख्यधारा, जो कि बहुत ही पुरुषवादी है, हर किसी पर अपनी पितृसत्तात्मक नजर रखती है."

—हर्षिता मिश्रा

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