करुणा नंदी को 2018 का वो लम्हा याद है. करीम मोरानी बलात्कार केस की सुनवाई थी. अदालत में आरोपी की ओर से देश के शीर्ष फौजदारी वकीलों में शुमार और पूर्व अटॉर्नी जनरल समेत लगभग 50 वकीलों का अमला उनके सामने थे. वे कहती हैं, "मुश्किल हालात में भी व्यक्ति को मालूम होना चाहिए कि हर किसी की अपनी ताकत होती है. अगर आप बहस करने की ताकत का इस्तेमाल करें, तो मुश्किल हालात में भी आप जगह बना लेंगी." आखिरकार, पीड़िता वह मुकदमा जीत गई. उसके पास नंदी समेत कुल छह वकील थे.
नंदी कहती हैं, "यह अहम बात थी कि मेरा पेशा ही मेरा शौक था. संवैधानिक और मानवाधिकारों के लिए लड़ना भी मेरे लिए ऐसा ही है." अर्थशास्त्र और कानून की पृष्ठभूमि वाली नंदी अब कमर्शियल लिटिगेशन के क्षेत्र की शीर्ष वकीलों में से एक हैं. उन्होंने 2015 में आइटी अधिनियम की धारा 66ए को रद्द कराने और एक दिव्यांग जीजा घोष के लिए मुआवजे का मामला जीतने में अहम भूमिका निभाई. घोष को 2012 में स्पाइसजेट की उड़ान से उतार दिया गया था. नंदी मानवाधिकारों, खासकर लैंगिक समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और मीडिया की स्वतंत्रता से संबंधित मामलों के लिए समान रूप से प्रतिबद्ध हैं.
नंदी मानती हैं, "संवैधानिक रूप से कहें तो यह मुश्किल वक्त है लेकिन हम कठिन समय के लिए तैयारी करते हैं." वे कहती हैं कि भोपाल गैस त्रासदी मामले को दोबारा खोलना और यह सुनिश्चित करना कि पीड़ितों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा और पीने लायक पानी मिले, एक बड़ी जीत थी. उनकी दूसरी लड़ाई भारत में बौद्धिक संपदा अधिकारों के लिए थी. वे हाइ लेवल पैनल ऑफ लीगल एक्सपर्ट्स ऑन मीडिया फ्रीडम (मीडिया स्वतंत्रता पर कानूनी विशेषज्ञों के उच्च स्तरीय पैनल) का भी हिस्सा हैं, जिसकी स्थापना 2019 में अमाल क्लूनी ने की थी. वे कहती हैं, "हमने कई पत्रकारों के लिए सुरक्षित ठिकाना खोजने के रास्ते तैयार किए हैं." नंदी देश में समलैंगिक विवाह के अधिकार और वैवाहिक बलात्कार के खिलाफ लड़ाई में शामिल हैं. उन्हें उम्मीद है कि वे जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में योगदान देंगी. सुप्रीम कोर्ट की चंद महिला वकीलों में से एक नंदी का कहना है कि उन्होंने अपने सहयोगियों से बहुत कुछ सीखा है. वे कहती हैं, "जब आप किसी मामले पर बहस करते हैं तो कुछ बारीकियां होती हैं—मुखर रहें लेकिन कर्कश नहीं, दृढ़निश्चयी हों लेकिन झगड़ालू न दिखें."

