भारत में आदिवासी समुदाय राज्य की सामाजिक व्यवस्था में सबसे निचले पायदान पर रखे गए हैं. वही पितृसत्तात्मक नजरिए वाली कल्याणकारी व्यवस्था जो नई दिल्ली से रिसते-खिसकते आगे बढ़ती है और दूरदराज तक पहुंचती है. मुल्क के आर्थिक पिरामिड को जो आकार देती है. लेकिन उसी समाज से आकर वे देश की पहली राष्ट्रपति के तौर पर पिछले साल भर से केंद्र में सबसे ऊंचे पायदान पर हैं. राष्ट्रपति भवन की शोभा बढ़ाने वाली 15वीं प्रथम नागरिक के तौर पर द्रौपदी मुर्मू समावेशिता का शानदार प्रतीक बनकर उभरी हैं. वे इस बात का जीवंत मिसाल भी पेश करती हैं कि एक वंचित समुदाय—जिसकी विशाल मानव क्षमता का इस्तेमाल नहीं हो सका है—के लिए क्या-क्या संभव है, वह क्या कुछ हासिल कर सकता है.
मुर्मू आदिवासियों के जीवन को परिभाषित करने वाली कठोर वास्तविकताओं के लिहाज से कोई अपवाद नहीं हैं. वे खुद संघर्ष की भूमि पर पनपी हैं. ओडिशा के मयूरभंज जिले में एक संताली किसान के घर में जन्मीं मुर्मू आज भारत के 10 करोड़ से ज्यादा आदिवासियों के लिए एक प्रकाशस्तंभ की तरह खड़ी हैं. ओडिशा भारत के सर्वाधिक 63 आदिवासी समुदायों का घर है, जबकि मयूरभंज जिले की आबादी में जनजातीय समूहों की हिस्सेदारी लगभग 60 फीसद है.
मुर्मू आत्मबोध के लिए एक दृढ़ मार्ग का अनुसरण करने में कामयाब रहीं क्योंकि वे ऐसा कर सकती थीं. दरअसल, उनके परिवार के सदस्य ग्राम प्रधान थे और उनका घर रायरंगपुर के आसपास था, जो एशिया की सबसे पुरानी आधुनिक लौह खदानों और जमशेदपुर और दुर्गापुर जैसे इस्पात केंद्रों के बीच संपर्क शहर की भूमिका निभाता है. इसलिए, आधुनिकता आधी सदी से अधिक समय से उनसे कुछ मील दूर पांव पसार चुकी थी. यह वही कारक है, जो उन्हें बचपन में उपरबेड़ा गांव से निकालकर भुवनेश्वर में स्कूली शिक्षा और स्नातक तक की पढ़ाई के लिए ले गया.
कुछ समय तक एक क्लर्क और शिक्षक के तौर पर काम करने के बाद मुर्मू नगर पंचायत पार्षद चुनी गईं. उन्होंने भाजपा की सदस्यता ग्रहण की और दो बार विधायक निर्वाचित हुईं, और इसी दौरान 2007 में वे 'सर्वश्रेष्ठ विधायक' के पुरस्कार से नवाजी गईं. आगे चलकर उन्होंने राज्यपाल पद संभाला और फिर अंतत: रायसीना हिल (राष्ट्रपति भवन) पहुंच गईं.
ऐसा नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने उन्हें अचानक ऐसे ही राष्ट्रपति पद के लिए चुना. भारत में सामाजिक उत्थान का रास्ता लोकतांत्रिक सशक्तीकरण है और राष्ट्रपति के तौर पर मुर्मू का कार्यकाल भाजपा के लिए बेहद प्रतीकात्मक है. खंडित राजनैतिक व्यवस्था में आदिवासी क्षेत्रों को महत्व मिलने से पहले ही यह भाजपा-आरएसएस के लिए ठोस सांस्कृतिक पैठ का साधन रहा है. जाति और लैंगिक पूर्वाग्रहों को खत्म करने के उद्देश्य वाली एक श्वेत वस्त्रधारी ब्रह्मकुमारी के तौर पर मुर्मू इस भूमिका में फिट बैठती हैं.
राष्ट्रपति पद उन्हें उनकी जड़ों से दूर नहीं ले जाता, बल्कि उस समृद्ध मिट्टी को एक पहचान दिलाता है. खासकर कमजोर जनजातीय समूहों के 1,750 से अधिक सदस्य उन हजारों लोगों में शामिल हैं, जिनकी आवाज को मुर्मू ने मुखर बनाया है. जुलाई में राष्ट्रपति पद पर काबिज होने की पहली वर्षगांठ पर मुर्मू ने राष्ट्रपति भवन में आदिवासियों पर समर्पित एक गैलरी का उद्घाटन किया. हालांकि, उनके दृष्टिकोण के हिसाब से भारत के आदिवासियों का भविष्य किसी संग्रहालय में नहीं, बल्कि उसकी तरफ जाने वाले मुख्य मार्ग पर दर्ज होगा.
- सुनील मेनन

