
तीन भाई-बहनों में सबसे छोटी और एक स्कूल शिक्षक की इकलौती बेटी नल्लाथम्बी कलैसेल्वी को याद है कि दक्षिणी तमिलनाडु के ग्रामीण अंबासमुद्रम में बड़े होने के दौरान उन्हें कई बार लैंगिक भेदभाव का सामना करना पड़ा था. लेकिन माता-पिता से मदद मिली. कोयंबटूर के सरकारी कॉलेज से केमिस्ट्री में एम.एससी करने के बाद माता-पिता ने उन्हें पीएचडी करने के लिए प्रोत्साहित किया, जो उन दिनों इतना आम नहीं था.
कलैसेल्वी ने सीएसआईआर-सीईसीआरआई में अपने 25 साल के कार्यकाल में ली-आयन बैटरी की भंडारण क्षमता में सुधार के लिए नई इलेक्ट्रोड सामग्री विकसित करने पर बड़े पैमाने पर काम किया. 1942 में स्थापित सीएसआईआर में पहली बार एक महिला कलैसेल्वी को अगस्त 2022 में महानिदेशक के रूप में नियुक्त किया गया. और इस तरह वे 38 प्रमुख अनुसंधान संस्थानों के राष्ट्रीय नेटवर्क का नेतृत्व करने के लिए आई हैं. ये संस्थान संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स (एसडीजी) को पूरा करने की खातिर तकनीकी के लिए कई परियोजनाओं का नेतृत्व कर रहे हैं.
कलैसेल्वी कहती हैं, "हमने ग्रीन तकनीकें विकसित कर ली हैं जो भविष्य की जरूरतों को पूरा करने के लिए मजबूत सप्लाई चेन में वैल्यू जोड़ती हैं. यह अमृत काल—2047 के लिए निर्धारित योजनाओं के अनुरूप है."
महारत मन के इलाज में

वर्ष 2020 और 2021, जो कि कोविड-19 महामारी से पैदा हुई चुनौतियों वाले साल थे, संभवत: डॉ. प्रतिमा मूर्ति के करियर में सबसे कड़े इम्तिहान का वक्त था. डॉ. मूर्ति बताती हैं, "हमारे बंद वार्डों में इसका प्रकोप था. इसलिए हमें लगातार सतर्क रहना था. अपने छात्रों, वहां रहने वालों, संकाय की देखभाल करनी थी, और मनोरोग से पीड़ित रोगियों के लिए अलग-अलग कोविड वार्ड स्थापित करने थे." तब वे बेंगलोर के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ ऐंड न्यूरो साइंसेज (निमहैंस) में मनोचिकित्सा की प्रमुख थीं. इसके साथ ही, पोस्टग्रेजुएट स्टूडेंट्स के टीचिंग प्रोग्राम्स और परीक्षाएं सभी सामान्य रूप से चलनी थीं. इस संस्थान की निदेशक के रूप में जून 2021 में कार्यभार संभालने वाली मूर्ति कहती हैं, "हमें लगातार कुछ नया करना था और किसी भी अन्य समय की तुलना में कहीं ज्यादा आपात स्थितियों को संभालना पड़ा."
बेंगलोर में जन्मीं और पली-बढ़ीं मूर्ति अपने परिवार में पहली डॉक्टर हैं. वे याद करती हैं, मनोचिकित्सा कुछ हद तक उनके नसीब में ही थी. मूर्ति कहती हैं, "यह जानना हमेशा दिलचस्प था कि मानव मस्तिष्क अच्छी सेहत और बीमारी में कैसे काम करता है." उनकी एमडी थीसिस शराब की लत पर थी—इसके इलाज का अध्ययन मूर्ति के लिए आजीवन प्रयास बन गया. मूर्ति कहती हैं, "यह लत व्यक्ति के साथ परिवार के सदस्यों की भी दुर्गति कर देती है. लेकिन जब आप व्यक्ति को लत से बाहर निकाल देते हैं, तो बड़ा बदलाव आता है." मूर्ति ने बचपन में अपने अनुभवों से सीखा कि 'भले ही आपने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास किया है, इसका यह मतलब नहीं कि आप अगले चरण पर स्वत: पहुंच जाएंगी.' वे कहती हैं, "और इसलिए अपना सर्वश्रेष्ठ देना महत्वपूर्ण बात है." इस भली डॉक्टर की नसीहत से सीख लें!
—अजय सुकुमारन
टीबी योद्धा

लंबे वक्त से दुनिया में ट्यूबरक्यूलोसिस (टीबी) या तपेदिक की राजधानी रहे भारत ने 2018 में 2025 तक इस मर्ज को देश से उखाड़ फेंकने का लक्ष्य तय किया. इस लक्ष्य को पूरा करने में 65 साल पुराना चेन्नई स्थित राष्ट्रीय क्षय रोग अनुसंधान संस्थान (एनआईआरटी) अहम भूमिका निभा रहा है. इसकी प्रमुख हैं डॉ. पद्मा प्रिया. क्लिनिकल ट्रायल में विशेषज्ञता के लिए जाना-माना यह संस्थान न केवल टीबी के टीके की संभावनाओं का बल्कि भारत के इस सबसे घातक संक्रमणों में से एक के लिए मल-आधारित निदान विधि का भी अध्ययन कर रहा है. पिछले साल संस्थान करीब 35 रिसर्च पब्लिकेशन लेकर आया. लेकिन एनआईआरटी के लिए टीबी अकेली लड़ाई नहीं है.
प्रिया कहती हैं, "लॉकडाउन के दौरान भी हमारा काम चौंकाने वाला रहा. हम बारी-बारी से काम कर रहे थे और वायरस के टीकों के परीक्षण में भी हमने प्रमुख भूमिका निभाई." 2021 में प्रिया कोविशील्ड वैक्सीन के दूसरे/तीसरे चरण के मानव अध्ययनों की अगुआई कर रही थीं, और यही काम भारत के औषधि महानियंत्रक (डीसीजीआइ) के लिए कोविशील्ड को आपातकालीन इस्तेमाल की मंजूरी देने का आधार बना. बाद में कोवैक्सिन की शुरुआत के लिए आईसीएमआर ने अन्य केंद्रों के साथ एनआईआरटी का चयन किया.
तमिलनाडु में जन्मीं प्रिया के पिता सेना में थे और मां इतिहास की टीचर. दादी उन्हें डॉक्टर बनाना चाहती थीं. संक्रामक रोगों के अनुसंधान के क्षेत्र में गहरे धंसे लैंगिक पूर्वाग्रहों के बारे में बात करते हुए प्रिया याद करती हैं कि किस तरह एनआईआरटी के कमरे में कई बार वे अकेली महिला हुआ करती हैं. वे इस संस्थान में 23 वर्षों से काम कर रही हैं. वे कहती हैं, "शोध कठिन काम है. आपको महिला के रूप में और भी ज्यादा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है. मगर काम जारी रखना पड़ता है. एक सीनियर ने एक बार मुझे सलाह दी—तमिल में एक कहावत है कि जिस पेड़ पर ढेरों आम लगते हैं, पत्थर भी उसी पर फेंके जाते हैं.''
प्रिया को उम्मीद है कि उनका काम कहीं ज्यादा लोगों को चिकित्सा अनुसंधान का काम चुनने को प्रोत्साहित करेगा. वे कहती हैं, ''हम इसी दिशा में काम कर रहे हैं.''
—सोनाली आचार्जी

