अन्नपूर्णी सुब्रह्मण्यम जब छोटी थीं, तो गर्मी से बचने के लिए रोज सुबह सूर्योदय से कुछ घंटे पहले ही पढ़ने बैठ जाती थीं. तब उन्हें रात को सितारों भरे आकाश के बारे में जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई. उनके मुताबिक, "मैं रोज तड़के आकाशगंगा निहारती थी. लेकिन यह नहीं पता था कि आखिर यह है क्या...हर सुबह आकाश के एक ही हिस्से में बादलों जैसा एक टुकड़ा नजर आए. यह संभव नहीं है, है ना? तो, मुझे यह तो समझ आ गया कि यह वायुमंडलीय भी नहीं है. लेकिन कोई ऐसा नहीं था जिससे मैं इस पर चर्चा कर पाती."
केरल के पलक्कड़ की रहने वाली सुब्रह्मण्यम फिजिक्स में मास्टर डिग्री के बाद शोध में करियर बनाना चाहती थीं और उनका इरादा स्पष्ट था कि 'आकाश से संबंधित कुछ भी' करना है. इसी जुनून ने उन्हें इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी) तक पहुंचाया. यहीं उन्होंने आईआईएससी, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (आईआईए), इसरो और रमन रिसर्च इंस्टीट्यूट की तरफ से खगोल विज्ञान में कराए जाने वाले एक प्रोग्राम को चुना. इसके बाद, 1990 में आईआईए ने उन्हें रिसर्च फेलो के तौर पर एक पद की पेशकश की और करीब तीन दशक बाद 2019 में सुब्रह्मण्यम उसी आईआईए की प्रमुख के तौर पर जिम्मेदारी संभालने वाली पहली महिला बनीं. संस्थान थर्टी मीटर टेलीस्कोप (टीएमटी) प्रोजेक्ट के लिए भारत का समन्वय केंद्र है, जो कैलटेक और कैलिफोर्निया, कनाडा, जापान, चीन और भारत के विश्वविद्यालयों के बीच वैश्विक साझेदारी है.
सितारों का विकसित होना सुब्रह्मण्यम के अनुसंधान का विषय है. वे बताती हैं कि खगोल विज्ञान विभिन्न मॉडल पर आधारित विज्ञान है. उनके मुताबिक, "आप डेटा एकत्र करते हैं और किसी मॉडल के बिना डेटा की व्याख्या नहीं की जा सकती." टीएमटी जितने बड़े अपर्चर के लिए तो अलग-अलग खंड वाली मिरर टेक्नोलॉजी की जरूरत है. खासकर मधुमक्खी के छत्ते जैसे मिरर की, जिन्हें एक साथ लगाया जा सके. टीएमटी में 492 खंड होंगे और हरेक 1.4 मीटर का होगा. वे कहती हैं, "भारत इस परियोजना के लिए मुख्य तौर पर पॉलिश्ड मिरर मुहैया करा रहा है, जो करीब 80 हैं. हमें हर माह दो मिरर उपलब्ध कराने होंगे."
कम ही लोगों को पता होगा कि वे प्रशिक्षित वायलिन वादक भी हैं. उनके परिवार का संगीत से गहरा नाता है, उनके माता-पिता दोनों ने कर्नाटक संगीत सीखा था. वे बताती हैं, "मेरे पिता वीणा वादक थे. मैं वीणा सुनते-सुनते सोती थी और सुबह उठती तो वे गाने का रियाज कर रहे होते थे." सुब्रह्मण्यम ने पलक्कड के विक्टोरिया कॉलेज से फिजिक्स की पढ़ाई की थी, जहां पर प्रोफेसर सुदर्शन कुमार ने उन्हें बेहद प्रभावित किया. वे याद करती हैं, "वे हर चीज पर गहराई से सोचने को प्रेरित करते थे." संगीत उनके लिए हमेशा प्लान-बी की तरह था.
पलक्कड के एक 'अग्रहारम' में पले-बढ़े होने का मतलब ही है कि कई अन्य शौक अपने आप विकसित हो जाएंगे. जैसे कोई 'कोलम' बनाना. सुब्रह्मण्यम बेंगलूरू के जिस अपार्टमेंट में रहती हैं, वहां सप्ताह में कम से कम दो बार रंगोली जरूर बनाती हैं. वे कहती हैं, "मेरे लिए यह मॉर्निंग पजल की तरह है."
अजय सुकुमारन

