4 साल मोदी सरकार 2.0
शिक्षा
धर्मेंद्र प्रधान
केंद्रीय शिक्षा मंत्री
अचानक आ धमका कोविड-19 का प्रकोप शिक्षा के मामले में अब तक की सबसे बड़ी परीक्षा साबित हुआ. इसके चलते लगभग रातोरात ऑनलाइन पढ़ाई की ओर बढ़ने का फैसला करना पड़ा. इतने भारी संकट के मद्देनजर देश ने इस चुनौती का सामना सराहनीय ढंग से किया. हालांकि, धीरे-धीरे जब महामारी के असर के दूसरे पहलू खुले तो पता चला कि वायरस ने कई तरीकों से गहरा नुकसान पहुंचाया है. मसलन, पढ़ाई-लिखाई की खाई को देखिए.
एनजीओ प्रथम की सालाना शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर), 2021 में पाया गया कि 2018 और 2021 के बीच बच्चों की बुनियादी पढ़ाई और गणित की समझ के स्तर में काफी गिरावट आई. आर्थिक गैर-बराबरी ने इस खाई को और भी चौड़ा कर दिया. जिन्हें टेक्नोलॉजी सहज उपलब्ध थी, वे तो आगे बढ़ने में कामयाब रहे लेकिन वंचित पृष्ठभूमि के छात्र पिछड़ गए.
इन तमाम मामलों ने 2020 में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) पर अमल को और भी जरूरी बना दिया. शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि नया पाठ्यक्रम अगले साल तक तैयार हो जाएगा. इस बीच, पाठ्यक्रम सामग्री को 'तर्कसंगत’ बनाने की सरकार की कोशिशों पर भारी हंगामा खड़ा हो गया है.
लेकिन असल चुनौती यह नहीं बल्कि उस पर अमल की है. मंत्रालय के लिए बजटीय आवंटन भी पिछले वर्ष की तुलना में 8,000 करोड़ रुपए या 8 फीसद से ज्यादा बढ़ गया है, लेकिन एनईपी पर अमल तो देश के शिक्षकों पर निर्भर है और हमारे यहां पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित शिक्षक ही नहीं हैं. यह सचाई हाल ही में स्थायी संसदीय समिति की रिपोर्ट में भी उजागर हुई, जिसमें कहा गया कि देश में राज्यों के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के करीब 62 लाख स्वीकृत पदों में से 9,80,000 से अधिक पद खाली पड़े हैं.
ध्यान रहे कि यहां प्रॉक्सी शिक्षकों की बात नहीं हो रही है. बदतर तो यह है कि इन खाली पदों में 7,40,000 या 75 फीसद से अधिक पद प्रारंभिक स्तर (कक्षा 1 से 8) के शिक्षकों के हैं, जो छात्रों की बुनियादी पढ़ाई की नींव है. समिति के दूसरे निराशाजनक निष्कर्ष थे कि 258 केंद्रीय विद्यालयों (केवी) के पास अपना स्थायी भवन तक नहीं है और वे अस्थायी ढांचों में चल रहे हैं.
समिति ने सिफारिश की कि मंत्रालय केंद्रीय विद्यालयों के लिए भूमि उपलब्ध कराने की खातिर राज्य सरकारों से बात करे. पीएम पोषण योजना, जिसे पहले मध्यान्ह भोजन योजना के रूप में जाना जाता था, भी धीरे-धीरे खत्म होने के कगार पर है. उसकी 2020 और 2023 के बीच कोई स्वतंत्र समीक्षा नहीं की गई. जब हमें हालात का पता ही न हो तो सुधार की बात कैसे की जा सकती है.
दरअसल शिक्षा राज्य का विषय है, इसलिए अमूमन केंद्र-राज्य टकराव में कई परियोजनाएं पटरी से उतर जाती हैं. ऐसा ही एक मामला प्रधानमंत्री स्कूल फॉर राइजिंग इंडिया (पीएम-एसएचआरआइ या पीएम-श्री) का है, जिसके तहत शिक्षा मंत्रालय पांच वर्षों में 27,360 करोड़ रुपए की लागत से देश भर में 14,500 सरकारी स्कूलों को अपग्रेड करना चाहता है.
संसदीय समिति की रिपोर्ट में पाया गया कि आठ गैर-भाजपा शासित राज्यों—बिहार, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, केरल, ओडिशा, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल—ने अभी भी पीएम-श्री स्कूलों के लिए केंद्र सरकार के साथ करार पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं.
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में जरूर कुछ हरकत दिखी है, खासकर कॉलेज प्रवेश के लिए सामान्य विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) की शुरुआत, अकादमिक क्रेडिट प्रणाली, जिसके तहत स्नातकोत्तर डिग्रीधारी केंद्रीय विश्वविद्यालय में पढ़ाने की अनिवार्यता के बिना भी डॉक्टरेट की पढ़ाई कर सकते हैं. स्वायत्त कॉलेजों को अब ऑनलाइन डिग्री प्रदान करने की अनुमति दे दी गई है और भारत में कैंपस स्थापित करना चाह रहे विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं.
इनमें अधिकांश कदम एनईपी के अनुरूप हैं, लेकिन इस क्षेत्र में भी संकट वही है: केंद्रीय विश्वविद्यालयों में 6,000 से अधिक शिक्षकों के पद खाली पड़े हैं. दूसरे मामले भी कार्रवाई का इंतजार कर रहे हैं. मसलन, राष्ट्रीय मूल्यांकन और एक्रेडिटेशन काउंसिल को भ्रष्टाचार के आरोपों से मुक्त करने की कार्रवाई की दरकार है.

