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जीवट और जज्बा

लगातार एक के बाद एक संकटों के दौर से गुजरते हुए नरेंद्र मोदी ने धारा के विपरीत जाकर साहसिक सुधारों को अंजाम दिया. लेकिन चुनौतियां हैं कि कटने का नाम नहीं लेतीं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
अपडेटेड 9 जून , 2023

4 साल मोदी सरकार 2.0

अनुप्रास या एक ही अक्षर से शुरू होने वाले शब्दों के प्रति नरेंद्र मोदी का लगाव जाना-माना है. उनके प्रिय अनुप्रासों में अंग्रेजी के 2एस: स्पीड और स्केल हैं. उन्हें यह कहना बहुत पसंद है कि अगर पिछली सरकारों को लगता था कि स्पीड यानी रफ्तार विलासिता है और स्केल यानी पैमाना जोखिम, तो प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने ''रफ्तार को देश की महत्वाकांक्षा और पैमाने को ताकत बना दिया है.’’ मोदी ने दिखा दिया कि इस पद पर अपने नौ साल में और दूसरे कार्यकाल के चार साल में उन्होंने जो कुछ हासिल किया, उसमें तकरीबन हर चीज में ये गुण कूट-कूटकर भरे थे.

एकदम ताजा उदाहरण इसी 28 मई को उद्घाटित शानदार, अत्याधुनिक, षटकोणीय नया संसद भवन है. यह परिसर गजब की रफ्तार से बनकर तैयार हुआ. बिल्कुल शुरुआत में ही कोविड की पाबंदियां लागू हो जाने के बावजूद इसे पूरा होने में महज ढाई साल लगे. फिर पैमाना देखिए. नई इमारत में दोनों सदनों के लिए 1,272 सदस्यों के बैठने की क्षमता है. यह 790 सीटों के मूल
ढांचे के मुकाबले 60 फीसद से ज्यादा है.

सीटें इतनी पर्याप्त हैं कि अगली शताब्दी तक सांसदों की संख्या कितनी भी बढ़ जाए, इसमें समा सकती है. भव्यता के लिहाज से नई संसद में परंपरा और आधुनिकता का मेल है—बलुआ पत्थरों से बना रौबदार अगला हिस्सा, ऊंची छत पर मोर के रूपांकन, फर्श पर हथकरघे के कालीन और बारीक नक्काशीदार लकड़ी की सजावट, जो हर सीट पर मौजूद कंप्यूटर टैबलेट की शोभा और बढ़ा देती है. उद्घाटन समारोह के दौरान अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा, ''यह नया भारत है जो नए लक्ष्य तय कर रहा है, नई राहें गढ़ रहा है. नया उत्साह है, नई सोच है, नई दृष्टि है और नया संकल्प है.’’

प्रधानमंत्री को एक तीसरा एस भी बहुत पसंद है—सिंबलिज्म यानी प्रतीकवाद. प्रधानमंत्री जो कुछ करते हैं, उसमें समय का अचूक बोध होता है. संसद का उद्घाटन उस दिन हुआ, जिस दिन मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने दूसरे कार्यकाल के चार साल और इस पद पर नौ साल पूरे किए. 28 मई विनायक दामोदर सावरकर की 140वीं जयंती भी थी, जो मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और उसके वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा के आधार-स्तंभ हैं.

उससे पिछले दिन देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की 59वीं पुण्यतिथि थी. उनके समर्थकों ने इसे भाजपा के हाथों नेहरू युग के पटाक्षेप और हिंदुत्व के उस युग के आगमन की शुरुआत के संकेत के तौर पर देखा, जिसका प्रतिपादन सावरकर ने किया था और मोदी जिसके वाहक हैं.

हालांकि संसद में उनके भावपूर्ण भाषण में 14-15 अगस्त 1947 की दरम्यानी रात नेहरू के 'नियति से साक्षात्कार’ वाले अमर भाषण की गूंज सुनाई दी. उन्होंने कहा, ''हर राष्ट्र की विकास यात्रा में कुछ ऐसे क्षण आते हैं जो हमेशा के लिए अमर हो जाते हैं. कुछ तारीखें समय के माथे पर इतिहास का अमिट हस्ताक्षर बन जाती हैं.’’

कई मायनों में मोदी ने भी दूसरी चीजों के अलावा आधुनिक भारत का शानदार मंदिर बनाकर भावी पीढ़ियों के लिए इतिहास पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है. अपने दूसरे कार्यकाल के चौथे साल के अंत में उन्होंने वाकई ऐसी विरासत का निर्माण किया, जो अतीत की बेड़ियां तोड़कर आजाद है. इस प्रक्रिया में उन्होंने नेतृत्व की ऐसी शैली का प्रदर्शन किया, जो अनूठी और बेमिसाल है.

भविष्य पर नजर

मिसालों की भरमार है. अफसर से सियासतदां बने अश्विनी वैष्णव ने दो दूसरे मंत्रालयों के साथ पिछले साल जुलाई में जब केंद्रीय रेल मंत्री की कमान संभाली, तो पहला काम उन्होंने यह किया कि देश भर के 50 रेलवे स्टेशनों को उन्नत बनाने के बारे में प्रधानमंत्री को दो घंटे का प्रेजेंटेशन दिया. मोदी पूरे वक्त बातों से संतुष्ट हो जाने वाले दूसरे नेताओं के विपरीत मोदी बारीक ब्योरों में जाना पसंद करते हैं. लिहाजा, वैष्णव से उन्होंने तीखे सवाल पूछे. मसलन, उनके प्रस्तावित बदलावों से एक आम नागरिक के जीवन में किस तरह का फर्क आएगा?

और क्या इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में ढांचागत बदलाव आएगा? और ये महज दिखावटी नहीं होंगे? लंबी-चौड़ी प्रस्तुति के बाद वैष्णव हैरान और मायूस थे कि प्रधानमंत्री ने इसे मंजूर नहीं किया. उस रात 11 बजे मोदी ने वैष्णव को फोन किया और बताया कि मंजूरी क्यों नहीं दी: ''आपने जो डिजाइन पेश किए वे आज के लिए अच्छे हैं, पर आपको ऐसी योजना लेकर आनी चाहिए जो 50 साल आगे की सोचे. यह वह विचार प्रक्रिया है जो मैं आपके साथ साझा करना चाहता था.’’ जब वैष्णव ने योजना पर नए सिरे से काम किया, और उसे ज्यादा भविष्योन्मुख बनाया, तो उन्हें वह मंजूरी मिल गई जो वे प्रधानमंत्री से चाहते थे.

दूसरे मंत्रालयों के साथ भी यही होता है. अपनी सरकार की घोषित योजना या परियोजना में मोदी हमेशा दूरदृष्टि की तलाश में रहते हैं. नेशनल सेंटर फॉर गुड गवर्नेंस के मृदुभाषी डायरेक्टर जनरल तथा मोदी के साथ उनके गुजरात के मुख्यमंत्री के दिनों से काम कर चुके भरत लाल कहते हैं कि वे कुछ भी तदर्थ ढंग से नहीं करते. प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने बुनियादी ढांचा खड़ा करने पर ध्यान दिया.

निर्माण से पहले उसकी तैयारी में भले ज्यादा वक्त लगा हो, पर उसे उन्होंने पर्याप्त वित्त और कर्मचारी मुहैया करके और निगरानी तथा अमल की रफ्तार बढ़ाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करके फास्ट ट्रैक पर डाल दिया. लाल मिसाल के तौर पर जल जीवन मिशन का हवाला देते हैं, जिसका ऐलान मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के तुरंत बाद 15 अगस्त, 2019 को किया था. इसका मकसद हरेक ग्रामीण घर को घरेलू नल के जरिए प्रतिदिन 55 लीटर पानी (डब्ल्यूएचओ का मानक) की आपूर्ति पक्का करना था. यह बहुत मुश्किल काम था क्योंकि 2019 में 19 करोड़ ग्रामीण परिवारों में से बमुश्किल 3.2 करोड़ या 16 फीसद को नल से जल मिलता था. मोदी ने इस योजना के वास्ते पांच साल के लिए 3.6 लाख करोड़ रुपए अलग रख दिए.

लाल इस योजना के पहले मिशन डायरेक्टर थे. उन्होंने हर घर तक इसके अमल की निगरानी के लिए सैटेलाइट फीड सहित टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया और प्रगति पर नजर रखने के लिए पारदर्शी डेटाबेस और डैशबोर्ड बनाया. बीते चार साल में 8.9 करोड़ ग्रामीण घरों को नल का पानी पहुंचाया गया था—31 मई 2023 तक करीब 12.1 करोड़ या 62 फीसद परिवार इसके दायरे में आ चुके हैं. यह हैरतअंगेज उपलब्धि है, जो स्वच्छ भारत अभियान के तहत निजी घरों में 11 करोड़ शौचालयों के वित्तपोषण और निर्माण से मेल खाती है, जिससे खुले में शौच की सर्वव्यापी प्रथा में तेजी से कमी आई, खासकर ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को बहुत मदद मिली.

दमदार डिजिटल प्रयास

अगर राजीव गांधी 1980 के दशक में प्रधानमंत्री के अपने कार्यकाल के दौरान देश में कंप्यूटर लाए, तो मोदी डिजिटलीकरण को पूरी तरह अलग और ऊंचे मुकाम पर ले गए. उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों अटल बिहारी वाजपेयी और डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में बनाए गए विशाल भौतिक डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को उन्नत बनाया और इसे राजकाज की ताकत कई गुना बढ़ाने वाले औजार में बदल दिया.

नीति आयोग के तेजतर्रार और वाक्पटु पूर्व सीईओ और फिलहाल दिल्ली में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के लिए देश के शेरपा अमिताभ कांत का कहना है कि मोदी ने जिस डिजिटल क्रांति का सूत्रपात किया, वह देश के विकास में पासा पलटने वाली साबित हुई है. अपने पहले कार्यकाल में मोदी ने डिजिटल पहचान को सर्वव्यापक बनाने का इंतजाम किया और बैंकों की सुविधा से वंचित देश के गरीबों के 40 करोड़ जन धन बैंक खाते खोलने पर जोर दिया.

योजना की शुरुआत के वक्त महज 17 फीसद महिलाओं के पास बैंक खाते थे. यह आंकड़ा आज 80 फीसद से ऊपर है, जो सच्चे सशक्तीकरण का संकेत है. फिर जन धन खातों को पहचान के सबूत के तौर पर पर आधार कार्ड से जोड़कर और जिसे उन्होंने जेएएम (जनधन, आधार, मोबाइल) त्रयी नाम दिया, उसके माध्यम से मोबाइल कनेक्टिविटी देकर मोदी प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) योजना के तहत कल्याण कार्यक्रमों के धन का तेजी से डिजिटल हस्तांतरण आसान बना पाए.

इससे ग्रामीण धनराशियों के भारी रिसाव पर फौरन रोक लगी और भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा. राजीव गांधी ने एक वक्त कहा था कि गरीबों के कल्याण के लिए सरकार की तरफ से भेजे गए हरेक रुपए में से केवल 15 पैसे लाभार्थी तक पहुंचते हैं. डीबीटी ने इसे एकदम बदल दिया. कांत कहते हैं, ''2016 में जब डिजिटल इंडिया आंदोलन शुरू हुआ, डेटा की खपत के मामले में हम दुनिया में 123वें पायदान पर थे. आज हम नंबर एक हैं. अमेरिका और यूरोप मिलकर जितने डिजिटल लेनदेन करते हैं, हम उससे 11 गुना ज्यादा और चीन से चार गुना ज्यादा कर रहे हैं. डिजिटल मोर्चे पर प्रधानमंत्री मोदी यही क्रांति ले आए. न्यूनतम सरकार, अधिकतम राजकाज से उनका यही मतलब है.’’

मोदी के पहले कार्यकाल में बुनियादी ढांचे और खासकर सड़क निर्माण पर बहुत जोर दिया गया. पक्के इरादे वाले उनके सड़क मंत्री नितिन गडकरी के मातहत पहले पांच साल में ही 55,000 किमी राजमार्ग बने, जबकि मनमोहन सिंह के दशक भर लंबे प्रधानमंत्री काल में 25,781 किमी राजमार्ग ही बने थे.

गरीबों का मसीहा

मोदी के नौ साल के राज को निरंतरता में देखना शायद सही लगे क्योंकि पहले कार्यकाल में शुरू किए गए उनके कई बड़े कार्यक्रमों के नतीजे दूसरे कार्यकाल में सामने आए. मगर उनके दोनों कार्यकालों को अलग करके अलग-अलग मूल्यांकन करना जरूरी है. पहले कार्यकाल में मोदी की नेतृत्व शैली इंदिरा गांधी की नेतृत्व शैली से मिलती-जुलती थी.

इसमें ऐसे निर्णायक और दूरगामी आर्थिक तथा राजनैतिक फैसले लेना भी शामिल था जिन्होंने देश के गरीबों की दुर्दशा को दूर करने पर ध्यान बनाए रखते हुए यथास्थिति को तोड़ा. इंदिरा गांधी ने गरीबी उन्मूलन के लिए बैंकों के राष्ट्रीयकरण का सहारा लेने जैसे कठोर कदम उठाए, तो नरेंद्र मोदी ने राजस्व संग्रह को तर्कसंगत बनाने, बढ़ाने और आर्थिक वृद्धि में जान फूंकने के लिए करों के केंद्रीयकरण पर जोर दिया और माल व सेवा कर (जीएसटी) व्यवस्था की शुरुआत की.

फिर जिस तरह इंदिरा गांधी ने यह दावा करते हुए कि विपक्ष गरीबों की विकास योजनाओं में अड़ंगे डाल रहा है और जाहिर तौर पर उसे कुचलने के लिए 1975 में राष्ट्रीय इमरजेंसी का ऐलान किया, उसी तरह मोदी ने नवंबर 2016 में रातोरात बड़े मूल्य के नोटों की नोटबंदी लागू करके वित्तीय इमरजेंसी का सूत्रपात किया. उन्होंने दावा किया कि देश को काले धन से निजात दिलाने और भ्रष्ट राजनैतिक व्यवस्था की सफाई के लिए यह कठोर कदम जरूरी था.

यहां तक कि जब उन्होंने अपने कदम से गरीबों को हुई परेशानियों और खासकर नोट बदलवाने के लिए बैंकों में अंतहीन कतारों में उन्हें खड़ा रखने के लिए माफी मांगी, तो उसे देशभक्ति की शब्दावली में लपेटकर पेश करते हुए कहा कि देश के लोग व्यापक भलाई की खातिर मुश्किलें झेलने से भी नहीं हिचकिचाते. उन्होंने यह भी कहा कि उनके इरादे तो नेक थे, कमी थी तो बस अमल में. अलबत्ता इंदिरा गांधी के विपरीत, जो 1977 का चुनाव हार गईं, मोदी की चुनावी किस्मत उन पर मेहरबान रही.

अपने गरीबी हटाओ नारे के साथ इंदिरा गांधी ने और साधारण मानव पर अपने एकाग्र ध्यान के साथ मोदी ने भारी-भरकम कल्याणकारी योजनाओं के जरिए खुद को गरीबों के मसीहा के तौर पर गढ़ा. राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर साहसी फैसलों के लिए उनकी पीठ भी थपथपाई गई—1971 के बांग्लादेश युद्ध में जीत की कारीगरी के लिए इंदिरा गांधी की, और 2017 में उड़ी हमले के बाद सर्जिकल स्ट्राइक करने और 2019 में पुलवामा के हमले के बाद पाकिस्तान के भीतर घुसकर हवाई हमला करने के लिए मोदी की.

आखिरी फैसला एक बार फिर 2019 के आम चुनाव का रुख मोदी के पक्ष में मोड़ने के लिए किया गया, जो उनकी पार्टी ने पूर्ण बहुमत से जीता. इमरजेंसी के नतीजतन बेदखल कर दिए जाने के बाद फिर सत्ता में लौटने से पहले इंदिरा गांधी को तीन साल इंतजार करना पड़ा.

कई मोर्चों पर एक साथ मुकाबला

अपने दूसरे कार्यकाल में मोदी को एक साथ इतने सारे और इतने भारी-भरकम संकटों का सामना करना पड़ा कि ऐसा शायद पहले प्रधानमंत्री के रूप में कमान संभालने के बाद केवल नेहरू को ही करना पड़ा था. वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही में जबरदस्त उथल-पुथल के बाद बंटवारे ने देश को भीषण आर्थिक संकट में झोंक दिया. फिर उन्हें उन युद्धरत राज्यों को एकजुट करना पड़ा जो उस वक्त प्रशासनिक प्रांतों और रियासतों के ढीले-ढाले समूह से ज्यादा कुछ नहीं थे. इस बीच उन्हें कश्मीर पर कब्जे के लिए पाकिस्तान की शह वाले कबाइली हमले को नाकाम करना पड़ा और दुनिया की दो महाशक्तियों—अमेरिका और सोवियत संघ—से भारत को बराबर दूरी पर रखने के लिए गुटनिरपेक्ष विदेश नीति का तानाबाना बुनना पड़ा.

मोदी की परेशानियां उनके दूसरे कार्यकाल के एक साल बाद आईं: पहले सदी में एक बार आने वाली उस महामारी की शक्ल में, जिसने लाखों जिंदगियां लील लीं और दुनिया भर में अप्रत्याशित अफरा-तफरा मचा दी. फिर जब देश और दुनिया कोविड-19 से जूझ ही रही थी कि चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा के पार बड़ी घुसपैठ को अंजाम देने का फैसला किया. इसके नतीजतन हुई झड़प में 1999 के करगिल युद्ध के बाद पहली बार सरहदी टकराव में सैनिक मारे गए.

जिस तरह 1962 में चीन के इरादों को लेकर नादानी बरतने के लिए नेहरू को दोषी ठहराया गया था, ठीक उसी तरह एलएसी पर चीनी घुसपैठ को समय रहते ताड़ने में भारतीय सेना की नाकामी के लिए मोदी को आलोचना का सामना करना पड़ा. आखिर में, ठीक उस वक्त जब मोदी अर्थव्यवस्था में थोड़ी स्थिरता और वृद्धि लाने की कोशिश कर रहे थे, फरवरी 2022 में यूक्रेन पर रूस के हमले ने भारत और दुनिया को दहला दिया, जिससे दुनिया भर में खाद्यान्न और तेल की तंगी पैदा हो गई और महंगाई में आग लग गई.

जो बात मोदी 2.0 को 1.0 से अलग करती है, वह यह ब्लैक स्वान इवेंट यानी गंभीर नतीजे पैदा करने वाली अप्रत्याशित घटनाओं से निबटने और उनके कारण पैदा होने वाले बहुत सारे संकटों से देश को बाहर निकालने की उनकी क्षमता थी. मोदी ऐसा कर पाए तो इसलिए कि उनमें हरेक अवसर में कठिनाई देखने के बजाय हर कठिनाई में अवसर देखने का गुण है.

प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव डॉ. प्रमोद कुमार मिश्र याद करते हैं, ''महामारी जिंदगी में एक बार घटने वाली घटना थी और किसी भी देश को साफ-साफ नहीं पता था कि इसका सबसे अच्छा जवाब क्या होगा. कई सारी अनिश्चितताएं और अनजान चीजें थीं. इसके अलावा, यूक्रेन का युद्ध था और सरहद पर चीन का खतरा. हम आमफहम रास्तों से हटकर चलने और अपना अनूठा रास्ता तैयार करने के लिए मजबूर हो गए. इसमें भारी जोखिम शामिल था, क्योंकि गलत फैसला बड़ी मुसीबत की तरफ ले जा सकता था.’’

मोदी के गुजरात का मुख्यमंत्री रहते उनके साथ काम कर चुके मितभाषी मिश्र का कहना है कि प्रधानमंत्री ने बड़े तूफानों के बीच चट्टान जैसी शांति का प्रदर्शन करते हुए संकट को व्यवस्थित तरीके से संभाला. वे कहते हैं, ''हमने पूरी स्थिति का अच्छी तरह विश्लेषण किया और यह पन्न्का किया कि प्रधानमंत्री के दिलो-दिमाग में काफी हद तक स्पष्टता हो कि भारत को क्या करना चाहिए. उतना ही अहम यह था कि प्रधानमंत्री के पास एक साथ इतने सारे संकटों के बीच साहसी लेकिन कठोर फैसले लेने, बड़े सुधारों की राह पर आगे बढ़ने और भारत को वृद्धि की राह पर वापस लाने की खातिर इस अवसर का इस्तेमाल करने की राजनैतिक इच्छाशक्ति हो.’’

हवा का रुख मोड़ दिया

कोविड-19 महामारी से निबटने के लिए मोदी ने टोटल लॉकडाउन लगाने और संकट से उबरने में हरेक की मदद के लिए दूसरे देशों के नेताओं की तरह भारी नकद राहत बांटने से परहेज करने का साहसिक फैसला किया. तकलीफ झेल रहे अपने देशवासियों को पर्याप्त नकद राहत नहीं देने के लिए कई हलकों से की जा रही आलोचना से लड़ते हुए मोदी ने इसके बजाय हकदार लोगों को लक्ष्यबद्ध सहायता देने के साथ-साथ अर्थव्यवस्था को झटके से गति देने के लिए बड़े सुधारों पर जोर देने का विकल्प चुना. पीछे मुड़कर देखने पर यह फैसला सही मालूम देता है क्योंकि दूसरी अर्थव्यवस्थाओं में अत्यधिक नकदी प्रवाह की वजह से महंगाई आसमान छूने लगी, जबकि भारत इसे संभाले जा सकने वाले स्तर के भीतर बनाए रख सका.

कोविड का मुकाबला करने और जानें बचाने के लिए मोदी ने टीकों के विकास और वितरण दोनों पर ध्यान दिया. न केवल भारत के 95 करोड़ से ज्यादा लोगों को इस वायरस के खिलाफ टीका लगाया गया, बल्कि दूसरे जरूरतमंद देशों को टीकों की आपूर्ति करके उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वाहवाही भी कमाई. मोदी ने आयुष्मान भारत योजना भी लॉन्च की, जिसमें गरीबी की रेखा के नीचे रहने वाले परिवारों को 5 लाख रुपए तक का स्वास्थ्य बीमा दिया जाता है.

उन्होंने ग्रामीण और शहरी गरीबों को 3 करोड़ से ज्यादा मकान देने के लिए पीएम आवास योजना की रफ्तार तेज की. वैष्णव कहते हैं, ''प्रधानमंत्री मोदी गरीब लोगों की जिंदगियों में बुनियादी फर्क ले आए. गांवों में आप जहां भी जाएं, स्थायी बदलाव साफ दिखाई देता है, चाहे वह आवास हो, शौचालय, गैस कनेक्शन, बिजली और पानी, जो उनके जीवन को ज्यादा आरामदायक बनाने के लिए बुनियादी जरूरतें हैं.’’ 

मोदी ने अपनी सरकार के पूंजीगत खर्च में बढ़ोतरी पर भी ध्यान दिया. वे इसे 2019-20 में 3.35 लाख करोड़ रुपए से बढ़ाकर मौजूदा बजट में 10 लाख करोड़ रुपये तक, या महामारी से पहले जीडीपी के 1.7 फीसद से बढ़ाकर उसके बाद 3.3 फीसद तक ले गए. बुनियादी ढांचे पर ध्यान गति और पैमाने दोनों लिहाज से दिया गया, चाहे राजमार्गों, ग्रामीण सड़कों, रेलवे लाइनों का निर्माण हो या अक्षय ऊर्जा की परियोजनाएं हों. दक्षता में सुधार लाने, बेहतर राजकाज देने और परियोजनाओं में दोहराव से बचने के लिए मोदी ने अक्तूबर 2021 में पीएम गतिशक्ति लॉन्च की.

यह मल्टी-मोडल कनेक्टिविटी के लिए नेशनल मास्टर प्लान है, जिसमें रेलवे और राजमार्ग सहित 16 मंत्रालयों को एक डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाया गया है. मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने, विदेशी निवेश आकर्षित करने और नौकरियां देने के लिए प्रधानमंत्री ने 14 क्षेत्रों में उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना शुरू की. विदेशी प्रत्यक्ष निवेश नीति को ज्यादा उदार बनाया गया, जिसमें ज्यादातर क्षेत्रों को स्वचालित मार्ग के तहत 100 फीसद एफडीआइ के लिए खोल दिया गया.

उस वक्त नीति आयोग के सीईओ रहे अमिताभ कांत कहते हैं, ''प्रधानमंत्री का नजरिया हमेशा भविष्योन्मुख और टेक्नोलॉजी पर केंद्रित है. वे कठिन टास्कमास्टर हैं. वे हमारे प्रेजेंटेशन में मूल्यवान बातें जोड़ते हैं. वे चाहते हैं कि देश डिलिवरी के मामले में हमेशा दुनिया में सर्वश्रेष्ठ हो, कभी दोयम दर्जे का नहीं.’’ मोदी ने महामारी से पहले ही मौजूदा कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट टैक्स 30 फीसद से घटाकर 22 फीसद कर दिया था. इस कदम ने कोविड के बाद अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद की.

दूसरे आर्थिक सुधारों में अंतरिक्ष, परमाणु ऊर्जा और रक्षा सरीखे क्षेत्रों को निजी क्षेत्र की ज्यादा भागीदारी के लिए खोलना और कृषि को दमघोंटू सरकारी नियंत्रणों से मुक्त करने के लिए दूरगामी सुधार शुरू करना शामिल था. मोदी ने उन्हें मई 2020 में कोविड के पहले चरण की तीव्रता के ऐन बीच देश को आत्मनिर्भर बनाने की खातिर आत्मनिर्भर भारत अभियान के हिस्से के तौर पर पेश किया, और उनके वास्ते पांच साल के लिए 27.1 लाख करोड़ रुपए अलग रखे. मिश्र कहते हैं, ''कोविड के दौरान शुरू किए गए सुधारों और साथ ही सरकार की तरफ से पूंजी निवेश में जबरदस्त बढ़ोतरी की बदौलत 2022-23 में देश की जीडीपी में 7.2 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई, जिसने उसे चीन से भी आगे दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना दिया.’’

हालांकि कृषि क्षेत्र सुधारों के विचार के प्रति बंद दिखाई दिया. अनाज उगाने वाले प्रमुख राज्य पंजाब और हरियाणा में किसान विरोध प्रदर्शन करने लगे, जिससे मोदी सरकार को अपने विवादास्पद कृषि कानून वापस लेने पड़े और उससे पैदा असुविधा के लिए माफी मांगनी पड़ी. उनके सहयोगी बताते हैं कि प्रधानमंत्री ने इन झटकों से बेशकीमती सबक हासिल किए और अब आगे बढ़ने से पहले बड़े फैसलों के निहितार्थों और नकारात्मक पहलुओं की समूची गहराई में और ज्यादा जाते हैं.

लिहाजा, जब शिक्षा की बात आई, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुत बहस-मुबाहिसे के बाद घोषित की गई और इससे पाठ्यक्रमों में दूरगामी बदलाव लाए जाने की उम्मीद है. छात्रों को ज्यादा समान अवसर मुहैया करने की खातिर पिछले साल सामान्य विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा (सीयूईटी) की शुरुआत के साथ कॉलेजों में दाखिले के मामले में भी आमूलचूल बदलाव आना तय है. अड़चनें दूर करने के लिए जीएसटी में भी बदलाव किए गए, जिससे अनुपालन और संग्रह में खासा उछाल आया और लक्ष्य के पार निकल गए.

विदेशी नीति के मामले में मोदी निडर और निर्भीक दोनों रहे हैं. उन्होंने बहुपक्षीय साझेदारियों को मजबूत करने वाले बहुत-से समानांतर रिश्तों की विदेश नीति तैयार की, जिसकी बदौलत भारत यूक्रेन पर हमले के बाद भी रूस के साथ उसी तरह कारोबार कर सका जिस तरह वह चीनी आक्रामकता से निबटने के लिए अमेरिका के साथ मिलकर काम कर रहा है. चीन की सरहदी घुसपैठ के मामले में मोदी ने मजबूती से चीनी घुसपैठ का मान-मर्दन करने के लिए सैन्य पैंतरों के बल पर यथास्थिति बहाल करने के लिए जोर डाला. फिर, देश को चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद या क्वाड में नई ताकत फूंककर चीन की नकेल कसने के मिशन में अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया सहित सहयोगी देशों के साथ जोड़ा.

अड़चनें दूर कर लेने के बाद, मोदी सरकार के निर्यात भी बेहतर दिखाई दे रहे हैं. वित्त वर्ष 2021-22 में वाणिज्यिक निर्यात 400 अरब डॉलर के पार चला गया और सेवा निर्यात में भी उछाल देखा जा रहा है. ऑस्ट्रेलिया और यूएई के साथ दो बड़े व्यापार समझौतों पर दस्तखत किए गए हैं. सरकार 'इस हाथ दो उस हाथ लो’ के रास्ते पर चलती मालूम देती है. ऑस्ट्रेलियाई वाइन पर आयात शुल्क काफी कम कर दिए गए हैं.

इस बीच मोदी भारत का अंतरराष्ट्रीय दर्जा बढ़ाने के लिए इस साल जी20 और शंघाई सहयोग संगठन की अध्यक्षता का पूरा फायदा उठा रहे हैं. इधर देश के भीतर उनकी सरकार ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांटने का बेखौफ कदम उठाकर चीन और पाकिस्तान के इस दावे को ताक पर रख दिया है कि कश्मीर विवादास्पद भूभाग है.

मील का आखिरी पत्थर

मिश्र कहते हैं कि प्रधानमंत्री अपने दूसरे कार्यकाल के आखिरी महीनों में क्रियान्वयन और डिलिवरी की रफ्तार बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं. वे और मिश्र निजी तौर पर सरकार के सभी बड़े कार्यक्रमों की निगरानी और रुकावटों की पहचान कर रहे हैं. साथ ही नतीजों पर खासा जोर दे रहे हैं. मोदी ने विभिन्न मंत्रालयों के संयुक्त सचिवों को राज्यों की यात्रा पर भेजने और जमीनी फीडबैक देने और उस हिसाब से कार्यक्रमों को चुस्त-दुरुस्त बनाने का असामान्य तौर-तरीका अपना लिया है.

अलबत्ता कई क्षेत्रों में प्रगति सुस्त है. निजीकरण और विनिवेश की बड़ी योजनाओं के ऐलान के बावजूद एयर इंडिया और कुछ हद तक एलआइसी को छोड़कर सरकार ने पिछले साल अपने विनिवेश लक्ष्य का बमुश्किल 30 फीसद ही पूरा किया और अब भी बहुत सारे क्षेत्रों से उसे पीछे हटना बाकी है. कपड़ा, पर्यटन और कौशल विकास सरीखे रोजगार पैदा करने वाले क्षेत्रों का प्रदर्शन न जाने क्यों पिछड़ रहा है. वृद्धि के बड़े इंजनों में से एक निर्यात में ठहराव के संकेत दिखाई दे रहे हैं.

चिंता की बात यह है कि एफडीआइ भी 2022-23 में 22 फीसद या पांचवा हिस्सा सिकुड़ गया. विपक्ष अहंकारी और अधिनायकवादी होने के लिए मोदी की आलोचना करता है. वह विरोधियों को बेअसर करने के लिए मनगढ़ंत या झूठे आरोपों के साथ प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय जांच ब्यूरो सरीखी केंद्रीय एजेंसियों को उनके पीछे छोड़ देने का आरोप लगाता है. अगर उनकी पार्टी को 2024 के आम चुनाव में पूर्ण बहुमत हासिल करना है और उन्हें लगातार तीसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री बनना है—ऐसी उपलब्धि जो अब तक केवल नेहरू हासिल कर सके—तो मोदी को सुधारों की राह पर लगातार आगे बढ़ते रहना होगा.

इस बीच मोदी की नेतृत्व शैली प्रबंधन के हलकों में अध्ययन का विषय बन गई है. भारतीय प्रबंधन संस्थान, बेंगलूरू में संगठनात्मक व्यवहार और एचआर मैनेजमेंट के प्रोफेसर और नेतृत्व के विशेषज्ञ एक्तिकरला एस. श्रीनिवास बताते हैं कि मोदी की कामयाबी का राज समाज के विभिन्न तबकों के लोगों के साथ सीधा जुड़ाव स्थापित करने, उनकी भाषा में बोलने और उनके मुद्दे उठाने की उनकी असाधारण योग्यता में है.

मसलन, जब वे अपने निर्वाचन क्षेत्र वाराणसी जाते हैं, वे गंगा मैया का आह्वान करने का खास ख्याल रखते हैं, यह कहते हुए कि वे उनके बुलावे पर यहां आए हैं, और जब वे उसके फौरन बाद आंध्र प्रदेश के मदनपल्ली में जाते हैं, तो वहां टमाटर किसानों के मुद्दे उठाते हैं. वोटरों के दिलों के तार छेड़ने के लिए उन्हें मीडिया या दूसरे मध्यस्थों की जरूरत नहीं है, प्रमुख माध्यम के रूप में वे 'मन की बात’ का इस्तेमाल करते हैं. श्रीनिवास कहते हैं, ''मोदी दुर्लभ, अद्वितीय और शक्तिशाली ढंग से उनकी पहचान को अपील करते हैं. अगर आप किसी की पहचान को छूते हैं और गर्व का आह्वान करते हैं, तो आप जज्बात को जगाते हैं. मोदी यही करते हैं.’’

परिवर्तनकारी

मोदी के साथ निकटता से काम कर चुके केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल उनकी कामयाबी का श्रेय ''आम आदमी के साथ उनकी असाधारण सहानुभूति’’ को देते हैं और ''इस बात को भी कि सफलता के शिखर पर पहुंचने के बावजूद वे अपने मामूली अतीत को कभी नहीं भूले.’’ हार्वर्ड बिजनेस स्कूल के पूर्व छात्र रहे मिलनसार गोयल कहते हैं कि मोदी के बारे में जो बात उन्हें प्रभावित करती है, वह है हाथ में लिए काम पर उनका पूरी एकाग्रता से ध्यान देना और छुट्टियां मनाने, मौज-मस्ती या हल्की-फुल्की बातचीत करने में उनकी रत्ती भर रुचि न होना. गोयल ने एक बार मोदी से पूछा कि उन्हें खाना खाने में आनंद आता है या नहीं?

उनका जवाब क्या था? ''मैं जीने के लिए खाता हूं, खाने के लिए नहीं जीता.’’ गोयल को मोदी में योगी सरीखा ऐसा गुण दिखाई देता है जिसमें वे मौजूदा क्षण में पूरी तरह रम जाते हैं, गहराई से तल्लीन हो जाते हैं और उन हजारों दूसरे कामों की तरफ मन को भटकने नहीं देते जो उनका इंतजार कर रहे हो सकते हैं. कई मौकों पर जो बात गोयल को हैरान करती रही है, वह प्रधानमंत्री की तकरीबन फोटोग्राफिक स्मृति है. बैठकों में आप उन्हें कभी कागज और कलम के साथ नहीं पाएंगे.

फिर भी ऐसे कई मौके आए जब गोयल ने 50 स्लाइड का प्रेजेंटेशन दिया और मोदी ने उन्हें उस स्लाइड विशेष पर वापस जाने के लिए कहा और पूछा कि यह उनकी समग्र थीम से बेमेल क्यों है? कैबिनेट बैठकों में मोदी खुद लंबी बात करने के बजाय सामूहिक समझ पर भरोसा करने और मंत्रियों को अपने मन की बात कहने के प्रोत्साहित करने के साथ-साथ यह पक्का करते हैं कि बातचीत समावेशी और सहभागी हो, ताकि वे सुविचारित फैसले पर पहुंच सकें. जब फॉलो-अप और जवाबदेही की बात आती है तो मोदी कामों की निगरानी करने, समय सीमा का पालन पक्का करने में सीईओ की तरह हैं.

श्रीनिवास मोदी को ऐसे परिवर्तनकारी नेताओं की बिरादरी में रखते हैं जो अपनी करिश्माई शख्सियत और असाधारण वाक्पटुता से पहचाने जाते हैं. नैरेटिव गढ़ने के उनके तरीके में व्यापक विजन के बारे में बात करना और शुचिता और साधारण शुरुआत के अपने निजी उदाहरण का इस्तेमाल करना शामिल है, जो जनसाधारण की वाहवाही हासिल करने में कभी नाकाम नहीं होता. श्रीनिवास कहते हैं, ''मोदी को लोगों के साथ तत्काल जुड़ाव स्थापित कर लेने वाली हीरो सरीखी करिश्माई छवि हासिल है.’’

यहां तक कि जब वे गलती भी करते हैं, तो लोगों को यह यकीन दिला पाते हैं कि उनके इरादे नेक हैं और वे जो कुछ करते हैं, व्यापक भलाई के लिए करते हैं, न कि निजी तौर पर अपने को आगे बढ़ाने के लिए. जिस बात से श्रीनिवास आगाह करना चाहेंगे, उसे वे ''करिश्मे का अंधेरा पहलू’’ कहते हैं, ''जो अच्छे से अच्छे नेता पर भी छा सकता है.’’ वे आगाह करते हैं कि सेलेब्रिटी दर्जे के साथ असुरक्षा सिर उठा सकती है. वे कहते हैं, ''अहं घुसपैठ करता है और असंदिग्ध वफादारी की मांग करता है, और साथ ही अहंकार भी, जिसका हश्र 'मैं सबसे बेहतर जानता हूं’ रवैये में होता है.

हर नेता को इसके बारे में पता होना चाहिए और इस जाल में नहीं फंसना चाहिए.’’ श्रीनिवास का मानना है कि मोदी इन खतरों के बारे में जानते हैं और देश का भरोसा बनाए रखने के लिए अपने कामों को लगातार चुस्त-दुरुस्त करते रहते हैं. तब तो और भी जब तीसरा कार्यकाल उन्हें बुला रहा है और वे इसे जीतने के लिए पोल पोजीशन में दिखाई दे रहे हैं. अगर वे तीसरा कार्यकाल जीत लेते हैं, तो यह उन्हें उसी आसन पर विराजमान होने का मौका देगा, जिस पर नेहरू विराजमान हैं, जो अपनी खामियों के बावजूद ऐसे राजनेता हैं जिनकी बराबरी में बैठने को हर राजनैतिक नेता लालायित रहता है.

''यह नया भारत है जो नए लक्ष्य तय कर रहा है, नई राहें गढ़ रहा है. नया उत्साह है, नई सोच है, नई दृष्टि है, और नया संकल्प है.’’
—प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, नए संसद भवन के उद्घाटन भाषण में

मोदी इस साल जी-20 और एससीओ की अध्यक्षता के जरिए यह आश्वस्त करना चाहते हैं कि भारत को ऊंचे वैश्विक मंच पर स्थायी जगह हासिल हो.

कोविड के दौरान नकदी में मदद करने के बजाय मोदी ने सरकार के पूंजीगत व्यय को इन्फ्रास्ट्रक्चर की ओर मोड़ा और बड़े सुधारों को आगे बढ़ाया, जिससे भारत कोविड के बाद के दौर में तेज रफ्तार से वृद्धि करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था के तौर पर उभरा.

मोदी के प्रधानमंत्री काल की बड़ी उपलब्धि रही है अपनी कई योजनाओं की रियल टाइम निगरानी और उन्हें समय से पूरा करने पर सारा जोर.

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