ऊंचे और असरदार, 10 नेता
अधिकतर नेता हमें यही यकीन दिलाएंगे कि राजनीति लोगों की व्यापक भलाई का साधन है. लेकिन अमूमन यह सत्ता की तीन-तिकड़मों का खेल होता है जो बिना किसी पर्देदारी के जारी रहता है. बीते दशक में तो बेशक ऐसा ही रहा. उस दौरान भारत के सियासी लैंडस्केप पर भाजपा और उसके वैचारिक स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की सख्त पकड़ को लगभग कोई चुनौती नहीं मिली. एक के बाद एक दो लोकसभा चुनावों में जबरदस्त जीत उसके दबदबे का महज एक संकेत है. फिर आश्चर्य क्या कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उनके भरोसेमंद सिपहसालार तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और आरएसएस के दिग्गज—मोहन भागवत और दत्तात्रेय होसबाले—इंडिया टुडे की राजनैतिक रसूखदारों की फेहरिस्त में शीर्ष तीन पायदानों पर काबिज हैं.
उनके बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, जिनके हाथ में लोकसभा की सबसे ज्यादा सीटों (80) वाले राज्य में भाजपा की चुनावी तकदीर की चाबी है. शीर्ष 10 में भाजपा के दो और नेता हैं—राजमार्गों का जाल बिछाने में शानदार काम कर रहे केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा, जिन्होंने पार्टी संगठन और चुनाव प्रबंधन कौशल को नए स्तर पर पहुंचा दिया है. कामयाब भारत जोड़ो यात्रा और कर्नाटक में पार्टी की जीत के साथ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुद को मोदी के सबसे बड़े चैलेंजर के तौर पर स्थापित कर लिया है. रसूखदारों की फेहरिस्त में उनका साथ दो मुख्यमंत्री दे रहे हैं—पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी और दिल्ली के अरविंद केजरीवाल. दोनों की महत्वाकांक्षा प्रधानमंत्री बनने की है और दोनों मुख्यमंत्री राष्ट्रीय स्वीकृति के लिए अपने रसूख वाले राज्यों से बाहर अपनी पार्टी की पैठ बढ़ाने का जतन कर रहे हैं.
1. नरेंद्र मोदी, 72 वर्ष, प्रधानमंत्री
कप्तान अजेय
क्योंकि उनके लिए सही दृश्य रूपक सिंह स्तंभ ही है, जिसके सिंह अब और आक्रामक दिखाई देते हैं. सरकार और अब 2024 की बड़ी लड़ाई के लिए किलेबंदी में जुटी भाजपा के लिए वे सशक्त फील्ड मार्शल की तरह हैं. देश में प्रचंड योद्धा, विदेश में फुर्तीले कदमों से धरती नापता एक दूरदर्शी. यूक्रेन के मामले में भारत को असाधारण स्थिति से निकालने में उन्होंने अपनी इसी युक्ति का मुजाहिरा किया और उस पर वैश्विक मोहर लगवाई
क्योंकि वास्तविकता से कहीं बड़ी उनकी शख्सियत हर जगह साफ झलकती है. वे भाजपा के चुनाव अभियान का आदि और अंत, उसका सबसे बुनियादी और अहम हिस्सा हैं, और नेहरू के बाद एकमात्र प्रधानमंत्री के रूप में लगातार तीसरा जनादेश जीतने की संभावना के साथ अगले चुनाव में उतरने जा रहे हैं. इस भव्य प्रतिष्ठा के पीछे असाधारण श्रम और सक्रियता से सराबोर एक सर्जक है, जो अफसरशाहों के साथ चिंतन शिविरों, सामाजिक समूहों के साथ वर्चुअल सत्रों और पार्टी बैठकों के विशेष संबोधनों में हमेशा अगले बड़े विचार के नमूनों पर काम करता रहता है
कर्मयोगी दिसंबर के आखिरी हफ्ते में, मां हीराबेन के अंतिम संस्कार के कुछेक घंटे बाद ही, प्रधानमंत्री मोदी काम पर लौट आए, पश्चिम बंगाल में परियोजनाओं के वर्चुअल उद्घाटन में जुट गए
क्योंकि महामारी के बाद के हालात में उन्होंने जिस तरह से नीतियों को आगे बढ़ाया, उसने दिखा दिया कि वे दबाव में भी विरले ही कभी झुकते हैं. उससे बढ़कर यह कि वे संकट को मौके में कैसे तब्दील करते हैं: तुरत-फुरत संतुष्टि न देकर लंबे वक्त के रणनीतिक उद्देश्यों पर ध्यान टिकाते हैं, फिर उसकी राजनैतिक कीमत चाहे जो हो. कोविड के दौरान पीड़ितों को सीधे पैसे बांटकर काहिल बनाने, अग्निवीर योजना वापस लेने, या पुरानी पेंशन योजना पर लौटने...इन सबसे इनकार करके उन्होंने अपने फौलादी इरादों का परिचय दिया है

