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लोकतंत्र की ताकत

वे मोड़ जब जनभावना—और कभी-कभी एक व्यक्ति के उत्साह—की शक्ति ने राष्ट्र की प्रगति के पथ को बदल दिया

कांशीराम तथा अन्य लोगों की ओर से अपनाई गई सामाजिक न्याय की मांग
कांशीराम तथा अन्य लोगों की ओर से अपनाई गई सामाजिक न्याय की मांग
अपडेटेड 1 जनवरी , 2023

विशेषांक : भारत की शान

राजनैतिक आंदोलन

राजमोहन गांधी, लेखक, राजनीतिशास्त्री और बिजनेस और इतिहासकार

भाषाई संघर्ष

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1917 में ही भाषाई आधार पर राज्यों के गठन का वादा कर दिया था, लेकिन वह वादा दिसंबर 1952 में अनशन कर रहे पोट्टी श्रीरामुलु की मृत्यु के बाद पूरा हो सका. नेल्लोर में एक वैश्य-जाति के परिवार में जन्मे पोट्टी श्रीरामुलु एक सत्याग्रही के तौर पर 1930 और 1940 के दशकों में जेल गए थे और उन्होंने दलित समुदाय के अधिकारों के लिए भी अभियान चलाया था. अपने लोगों के बीच  बेहद लोकप्रिय इस हस्ती के 58 दिनों के अनशन और मृत्यु के बाद तेलुगु बोलने वालों के लिए एक अलग राज्य का निर्माण, जो अभी भी ब्रिटिश-युग का मद्रास प्रेसिडेंसी था, को रोक पाना असंभव था. आंध्र 1953 में उभरा, और अन्य आंतरिक सीमाओं को भी सफलतापूर्वक फिर से खींचा गया गया. दक्षिण में कर्नाटक और केरल, पश्चिम में महाराष्ट्र और गुजरात, उत्तर में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल. देश के नागरिक अब अपनी-अपनी भाषा में अधिकारियों के साथ बात कर सकते थे!

पूर्वोत्तर का राष्ट्रवाद

भारत की आजादी के साथ-साथ शुरू हुई पूर्वोत्तर की स्वायत्तता की अनवरत हलचल कभी भी संघर्ष से मुक्त नहीं रही, फिर भी इस इलाके के विभिन्न समुदायों की ओर से उनके गौरव की वापसी प्रेरणादायक रही है. उनके संघर्ष की वजह से असमिया, बोडो, गारो, खासी, मिजो, मैतेई, नगा और त्रिपुरियों (ये बस कुछेक नाम हैं, बाकी और भी हैं) ने भारत और दुनिया के अनगिनत लोगों की चेतना पर अपनी बौद्धिक प्रतिभा की छाप छोड़ी है.

उदारीकरण

चेन्नै के सी. राजगोपालचारी, मुंबई के मीनू मसानी, आंध्र के एन.जी. रंगा और सहयोगियों की ओर से 1959 में लॉन्च की गई स्वतंत्र पार्टी ने 'लाइसेंस-परमिट राज' के खिलाफ बहुत ही जरूरी आवाज उठाई. यह आजाद भारत की गरीबी-विरोधी और समतावादी नीतियों के नतीजतन उपजा अनचाहा उत्पाद था. स्वतंत्र पार्टी के गठन के तीन दशकों के बाद, 1991 में प्रधानमंत्री नरसिंह राव के समर्थन के साथ वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने उद्योगों-प्रतिष्ठानों को स्थापित करने और संचालित करने से जुड़ी सरकारी बाधाओं को दूर करना शुरू किया और भारतीय अर्थव्यवस्था ने उड़ान भरी. लाइसेंस-परमिट राज के पूर्ववर्ती आलोचकों ने कड़ी मेहनत और संघर्ष से उस उड़ान के लिए मैदान तैयार किया था.   

दलित अधिकार

जब साल 1956 में डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर और उनके लाखों दलित अनुयायी अपने ऊपर सदियों से थोपी गई हीन स्थिति को अस्वीकार करते हुए बौद्ध बन गए, तो असल में अप्रत्यक्ष रूप से अहिंसक प्रतिरोध का अनुमोदन करते हुए उन्होंने महान अवज्ञा का कदम उठाया. इसने कुछ लोगों को एहसास कराया कि हमारे संविधान में निहित स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व भारतीय समाज के वास्तविक लक्ष्य बन सकते हैं. 1980 के दशक में सामाजिक न्याय की छड़ी को उठाते हुए, कांशीराम ने सामाजिक और आर्थिक उत्पीड़न को खत्म करने के लिए दलितों, हाशिये पर मौजूद गैर-दलितों और मुसलमानों का एक 'सशक्त' गठबंधन बनाने की कोशिश की. हालांकि वह काल्पनिक गठजोड़ मायावी साबित हुआ, फिर भी डॉ. आंबेडकर ने स्पष्ट की और कांशीराम तथा अन्य लोगों की ओर से अपनाई गई सामाजिक न्याय की मांग अभी भी एक सशक्त विजन है.

भूदान आंदोलन

वर्तमान तेलंगाना राज्य के नलगोंडा जिले के एक गांव में भूमिहीन दलितों की जरूरतों को देखते हुए अप्रैल 1951 में विनोबा भावे का भूदान अभियान शुरू हुआ था. माना जाता है कि इसके तहत साल 1957 तक तकरीबन 45 लाख एकड़ जमीन दान में दी गई. दान में हासिल की गई इस जमीन का अधिकतर हिस्सा उत्तर प्रदेश और बिहार में था. हालांकि कुछ दान फर्जी भी थे, और कुछ मामलों में दान पाने वालों को भूमि को पंजीकृत करने में मुश्किल का सामना करना पड़ा, लेकिन अनूठे भूदान आंदोलन ने सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक असर डाला. लोगों के मन में यह बात आई कि भारत की जमीन सभी की जरूरतों के लिए है.

संपूर्ण क्रांति

लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए जयप्रकाश नारायण ने 1974-77 में जिस राष्ट्रीय अभियान का नेतृत्व किया, वह 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उनकी शानदार भूमिका और 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के बाद जाहिर की गई उनकी बेचैनी का स्वाभाविक परिणाम था. हालांकि इंदिरा गांधी की ओर से घबराहट में लगाया गया आपातकाल 1970 के दशक की उस कहानी के केंद्र में था, लेकिन जेपी की 'संपूर्ण क्रांति' का लक्ष्य सियासी दुश्मन को हराने से कहीं आगे निकल गया.

जेपी आंदोलन से यह नजरिया हासिल हुआ कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सभी भारतीयों के लिए समान अधिकार आधुनिक आजाद भारत का लक्ष्य होना चाहिए. लोकतांत्रिक अधिकारों के संघर्ष में हर तबके के भारतीयों को शामिल करने वाला वह आंदोलन 2022 में भी एक उम्मीद जगाने वाली घटना है.

मंडल आंदोलन

अगर अतीत ने भारत की उच्च जातियों को शक्ति प्रदान की, और संवैधानिक रूप से अनिवार्य आरक्षण ने एससी/एसटी समुदाय के लोगों को थोड़ी राहत दी, तब भी आधी आबादी उपेक्षित रह गई थी. यह डॉ. राम मनोहर लोहिया थे जिन्होंने 1950 के दशक में राष्ट्र की उपेक्षित मध्य जातियों—ओबीसी—के अधिकारों के लिए आंदोलन शुरू किया था. और, वे वी.पी. सिंह थे जिन्होंने 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके ओबीसी की महत्ता पर प्रकाश डाला. हिंदू दक्षिणपंथियों ने पहले ओबोसी कोटा का जमकर विरोध किया, लेकिन फिर मुस्लिम-विरोधी विभाजनकारी मुहिम में ओबीसी को शामिल करने के लिए इसका समर्थन किया.

आरटीआइ आंदोलन

साल 1994 में हजारों राजस्थानी ग्रामीणों (जो उन मुट्ठी भर कार्यकर्ताओं की ओर से प्रेरित थे जो अपने-अपने रसूखदार करियर को छोड़कर राजसमंद जिले के देवडूंगरी नाम के एक बेहद पिछड़े और गरीब गांव में रहने आए थे) ने अपने इलाके में सार्वजनिक कार्यों के बारे में सूचना (रसीद और दस्तावेज) की मांग की. इनमें श्रमिकों की उपस्थिति की सूची वाला मस्टर रोल, बकाया मजदूरी, भुगतान की गई मजदूरी, आदेशित सामग्री और परिवहन की गई सामग्री की सूचनाएं शामिल थीं. उम्मीद के मुताबिक, पारदर्शी हिसाब की इस मांग का भारी विरोध किया गया, लेकिन ग्रामीणों की दृढ़ता और अरुणा रॉय सरीखे उनके कार्यकर्ता मित्रों के समर्पण ने 2002 में सूचना की स्वतंत्रता अधिनियम और 2005 में सूचना का अधिकार अधिनियम की राह तैयार की. यह अखिल भारतीय कवायद राजस्थान के एक छोटे से धूल भरी जगह से शुरू हुई और फिर पूरे देश में फैल गई थी.

किसान आंदोलन

भारत के किसानों ने चुनौती भरे कोविड के दिनों, कड़ाके की सर्दी, तेज गर्मी और बदनाम करने वाले प्रोपगेंडा को सहन करते हुए, मोदी सरकार के कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर 2020-21 में 378 दिनों का सफल विरोध-प्रदर्शन किया. इसे उन मुश्किल महीनों में उनके परिवार के सदस्यों और दोस्तों से मिले सहयोग के लिए भी याद किया जाएगा—और सरकार के घुटने टेकने के लिए भी. पंजाब और हरियाणा के किसानों ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया, लेकिन देशभर के उन किसानों ने इसका समर्थन किया जिनका मानना था कि नए कानूनों ने उन्हें बड़े खरीदारों के सामने कमजोर कर दिया है. 19 नवंबर, 2021 को मोदी ने ऐलान किया कि उन कानूनों को रद्द कर दिया जाएगा, और आठ दिन बाद वे रद्द हो गए.

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