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सुरक्षा के बिजनेस से बढ़ी शान

एसआइएस ने कैश लॉजिस्टिक के काम में भी पहचान बनाई है. स्पेन की कंपनी प्रोसिगर के साथ साझा उपक्रम बनाकर काम कर रही एसआइएस कैश सर्विसेज आज कैश लॉजिस्टिक में भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है.

रवींद्र किशोर सिन्हा
रवींद्र किशोर सिन्हा
अपडेटेड 22 नवंबर , 2022

36वीं वर्षगांठः दिग्गज कारोबारी

रवींद्र किशोर सिन्हा, 71 वर्ष,

पटना, बिहार
कंपनीः एसआइएस

सिन्हा परिवार की संपत्ति : 5,700 करोड़ रुपए

कहां करते हैं निवेश
सिन्हा अपने निजी डिविडेंड को सामाजिक कार्यों पर खर्च करते हैं और कंपनी से होने वाली आय को कंपनी के ही विस्तार में लगाते हैं

बात 1974 की है. पटना में सर्चलाइट और प्रदीप अखबार के विशेष संवाददाता के तौर पर काम कर रहे 23 साल के रवींद्र किशोर सिन्हा की एक दिन नौकरी चली गई. उसी शाम वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण से मिले. जेपी को उनकी नौकरी जाने का पता चल गया था.

जेपी ने सिन्हा से कहा कि हर साल बड़ी संख्या में सेना के जवान कम उम्र में ही रिटायर हो जाते हैं. उन्हें सेना में अपनी अच्छी पहचान और कारोबारियों से भी संबंध का लाभ उठाना चाहिए. रिटायर जवानों को रोजगार चाहिए और कारोबारियों को सुरक्षाकर्मी. सिन्हा बांग्लादेश युद्ध को कवर कर चुके थे.

जेपी का यह भी तर्क था कि सैनिक रिटायर होने के बाद लंबे समय तक खाली बैठे तो दूसरी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं. जेपी ने सिन्हा को सुझाया कि आप यह काम शुरू करें और रिटायर जवानों को कारोबारी घरानों में नौकरी पर लगाएं.

सिन्हा स्पष्ट करते हैं, ''मैंने इसे कारोबार के तौर पर शुरू नहीं किया था. मेरी भूमिका रिटायर जवानों को काम पर रखवाने तक की थी. सामाजिक कार्य मानकर मैं यह कर रहा था. रोजी-रोटी के लिए मैं स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर काम कर रहा था और धर्मयुग जैसी पत्रिका के लिए नियमित लिखता था.’’

1979 में सिन्हा के एक कारोबारी मित्र को कुछ सुरक्षाकर्मी चाहिए थे. मित्र ने उन्हें रांची बुलाया और कंपनी की रूपरेखा बनाई. उनसे सलाह करके ही कंपनी का नाम सिक्योरिटी ऐंड इंटेलिजेंस सर्विसेज (एसआइएस) रखा गया. मित्र ने कुछ महीने का एडवांस दिया. इससे सिन्हा ने जवानों के लिए वर्दी बनवाई. 27 दिसंबर, 1979 को एसआइएस की वर्दी पहनकर पहली बार उनके गार्ड कंपनी में लगे.

आज एसआइएस के पास ढाई लाख सुरक्षाकर्मी हैं और उसका टर्नओवर 12,000 करोड़ रुपए से अधिक है. अविभाजित बिहार की निजी कंपनियों को सुरक्षा गार्ड मुहैया कराने से शुरू करने वाली एसआइएस ने असली उड़ान भरी 1986 में. मध्य प्रदेश के कूटेश्वर लाइमस्टोन माइन्स की सुरक्षा में लगे सीआइएसएफ के जवानों को हटाकर यह काम एसआइएस को दे दिया गया.

यहां से मैसेज गया कि सार्वजनिक उपक्रमों की संपत्तियों की सुरक्षा का जिम्मा निजी एजेंसियों को दिया जा सकता है. 1993 में मुंबई बम ब्लास्ट के बाद इंडिया टूरिज्म ऐंड डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (आइटीडीसी) ने देश भर के अपने होटलों की सुरक्षा की जिम्मा एसआइएस को सौंप दिया. 1998 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने भी देश भर की अपनी साइट्स की सुरक्षा एसआइएस के हाथों में दे दी.

एसआइएस ने कैश लॉजिस्टिक के काम में भी पहचान बनाई है. स्पेन की कंपनी प्रोसिगर के साथ साझा उपक्रम बनाकर काम कर रही एसआइएस कैश सर्विसेज आज कैश लॉजिस्टिक में भारत की दूसरी सबसे बड़ी कंपनी है. फैसिलिटी मैनेजमेंट में भी कंपनी अपना कारोबार बढ़ा रही है.

देश में पहचान बनाने के बाद आरके के नाम से चर्चित सिन्हा ने कंपनी का कारोबार ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, सिंगापुर और अमेरिका में भी बढ़ाया है. 2007 में एसआइएस ने ऑस्ट्रेलिया की एक कंपनी खरीदी थी और फिर अमेरिका में साफ-सफाई का काम करने वाली एक कंपनी का अधिग्रहण किया था.

ऑस्ट्रेलिया के सारे प्रमुख हवाई अड्डों की सुरक्षा का काम एसआइएस समूह की कंपनी मेट्रोपॉलिटन सिक्यूरिटी सर्विसेज के पास ही है. कंपनी का रोजमर्रा का काम अब सिन्हा के बेटे ऋतुराज सिन्हा देखते हैं और वे कारोबार के विस्तार के लिए काम कर रहे हैं.

कारोबार में अपना लोहा मनवाने वाले सिन्हा भाजपा की तरफ से राज्यसभा सांसद भी रहे. अपने गृह राज्य बिहार और इसके बाहर कई तरह के सामाजिक कार्यों में भी वे सक्रिय रहते हैं. वे हर साल आइआइटी की तैयारी करने वाले 50 मेधावी बच्चों का चयन करके उन्हें पटना के एक हॉस्टल में रखते हैं और उनके खान-पान से लेकर पढ़ाई तक का खर्च खुद उठाते हैं.

गोपालदास नीरज साहित्यिक अभिरुचि वाले सिन्हा के प्रिय कवि रहे हैं. उन्होंने उन्हीं की याद में नीरज स्मृति न्यास की स्थापना की है. इसके जरिए वे साहित्यिक गतिविधियां आयोजित कराते हैं. खुद कई किताबें लिख चुके सिन्हा अब भी खुद को एक पत्रकार ही मानते हैं और कहते हैं कि ''मेरे दिन की शुरुआत नियमित तौर पर रोज एक लेख लिखने के साथ होती है.’’

1974 में सिन्हा की नौकरी छूटते समय कंपनी ने उनका हिसाब करके उन्हें 230 रुपए दिए थे. और इस साल 31 मार्च को सिन्हा का अपना नेटवर्थ 3,011 करोड़ रुपए था.

एसआइएस के बाद सिन्हा परिवार अब भविष्य में विस्तार की अपनी योजनाओं में मसरूफ है. सुरक्षा कारोबार में खासी कामयाबी के बाद वह अब ऑर्गेनिक फूड के कारोबार में तेजी से विस्तार कर रहा है. आद्या फूड्स नाम की उनकी कंपनी खाने—पीने की चीजों के अलावा साबुन, तेल, अगरबत्ती जैसे कई ऑर्गेनिक उत्पाद बना रही है और यह कारोबार तेजी से बढ़ रहा है.खाने और खिलाने के शौकीन सिन्हा मेहमानों के लिए खुद खाना पकाते हैं. आरा (बिहार) जिले के अपने पैतृक गांव बिछियांव में वे अब भी खेती कराते हैं. हर साल अपने कुल देवता नृसिंह भगवान को धान की बालियां चढ़ाकर फसल की कटाई शुरू कराते हैं.

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