36वीं वर्षगांठः दिग्गज कारोबारी
भीखाभाई वीरानी, 69 वर्ष, चंदूभाई वीरानी, 65 वर्ष, कांजीभाई वीरानी, 60 वर्ष
राजकोट, गुजरात
कंपनीः बालाजी वेफर्स प्रा.लि.
कुल संपत्तिः 9,200 करोड़ रु.
कहां करते हैं निवेश
बचत का 80 फीसद म्युचुअल फंड में रखते हैं. अपने डिस्ट्रीब्यूटर्स को छोटे कर्ज और एडवांस देते हैं. परिवार ने कुछ छोटे निवेश सौर ऊर्जा के उपक्रमों में भी किए हैं
सत्तर के दशक में नर्मदा के पानी के सौराष्ट्र की सूखी भूमि तक पहुंचने से पहले किसान लगातार सूखी जमीनें छोड़कर काम की तलाश में शहरों की ओर जा रहे थे. 1972 में पोपट रामजीभाई वीरानी ने भी राजकोट शहर से 78 किमी दूर, जामनगर जिले के धुंडोराजी गांव में खेती की जमीन बेचकर तीन बेटों—भीखू, चंदू और कानू- को 20,000 रुपए दिए. उससे तीनों ने कृषि उपकरण बेचने का धंधा शुरू किया पर वह नाकाम रहा.
उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और राजकोट चले गए. मझले भाई चंदू ने वहां के एस्ट्रॉन सिनेमा हाउस में छोटी-मोटी नौकरी कर ली. मेहनती लड़के ने मालिकों का दिल जीत लिया और साल भर बाद तीनों भाइयों को सिनेमा घर की कैंटीन चलाने का ठेका मिल गया. वे कई तरह का नाश्ता बेचते पर उनके आलू के चिप्स (वेफर्स) सबसे ज्यादा पसंद किए जाते.
वे लोग वेफर्स एक सप्लायर से खरीदते थे पर देर से डिलिवरी के चलते वे अक्सर प्राइम टाइम शो के दौरान उपलब्ध न हो पाते, जिससे नुक्सान होता. बालाजी वेफर्स प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक और निदेशक चंदूभाई विरानी कहते हैं, ''मैंने सोचा कि क्यों न हम वेफर्स खुद बनाएं.’’
10,000 रुपए के निवेश के साथ चंदू ने किराए के छोटे-से घर में वेफर बनाने की पहली वर्कशॉप लगाई. ''मसाला मेरे अनुमान से जोड़ा गया था और यह बड़ा हिट रहा. काम वाले बंदे नहीं आते तो मैं खुद रात भर उन्हें तला करता. हम सब कुछ खुद से कर रहे थे और हमारा घर बमुश्किल ही चल पाता था.’’
जल्द ही उन्हें शहर में कई और कैंटीनों का ठेका मिल गया और उन्होंने धीरे-धीरे शहर की स्थानीय दुकानों के बीच नेटवर्क खड़ा किया. बालाजी भगवान पर उनकी अगाध श्रद्धा थी और इसीलिए 1984 में उन्होंने बालाजी वेफर्स नाम से ब्रांड की शुरुआत की. अगले 20 साल बहुत मुश्किल थे पर वे डटे रहे. चार दशक बाद आज राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र की हर छोटी-बड़ी दुकान में बालाजी वेफर्स मिल जाते हैं.
सर्वोत्कृष्ट भारतीय मसालों से युक्त चटपटे वेफर्स ग्राहकों को भा चुके हैं. पर इस ब्रांड के डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क की उद्योग के अंदरूनी लोग विशेष रूप से सराहना करते हैं. चंदूभाई बताते हैं, ''वितरकों के साथ जो मॉडल हमने तैयार किया है वह सहकारी मॉडल जैसा है. हम उन्हें बिक्री का कोई टारगेट नहीं देते. हम केवल वेफर्स की गुणवत्ता और पैकेजिंग पर ध्यान रखते हैं. हम छोटे वितरकों और डीलरों पर ज्यादा ध्यान देते हैं. वे मुझसे सीधे बात करते हैं. उनकी सफलता में हमारी सफलता छिपी है, वे हमारे साझेदार हैं.’’
पेप्सिको ने 2013 में बालाजी को 4,000 करोड़ रु. का एक आकर्षक अधिग्रहण प्रस्ताव दिया था जिसे उन्होंने ठुकरा दिया. तब उनकी पूंजी 1,000 करोड़ रु. थी. इसके बाद इस छोटे शहर के और कम चर्चित स्नैक निर्माता पर उद्योग का ध्यान गया. एक दशक बाद कंपनी की कीमत 9,200 करोड़ रुपए है. आज बालाजी वेफर्स देश के 40 फीसद हिस्से में उपलब्ध हैं. भविष्य में देश के बाकी हिस्सों में भी इसे उपलब्ध कराने की योजना है. 2021-22 में कंपनी का राजस्व 4,000 करोड़ रु. था.
गहन दार्शनिक स्वभाव वाले अरबपति व्यवसायी चंदूभाई का आज राजकोट शहर के बीच में महलनुमा पारिवारिक घर है. वे कहते हैं, ''आज हमारे पास 7,000 कर्मचारी, 3000 सप्लायर और 50-50 हेक्टेयर में फैले तीन कारखाने हैं. मैंने करोड़पति बनने की सोच के साथ यह काम शुरू नहीं किया था.
बस भगवान के आशीर्वाद से हो गया.’’ राजकोट में उनकी कंपनी के परिसर में 150-200 गायों के लिए गोशाला और लगभग 300 गौरैयों के घोंसले बने हैं. उन्होंने अपनी पहली होंडा मोटरसाइकिल 1988 में खरीदी थी. तभी उन्हें सच्चा सुकून मिला था. उन्हीं के शब्दों में, ''अब परिवार में महंगी कारों का पूरा बेड़ा है पर उस होंडा जैसा सुकून किसी ने न दिया.’’ अपनी गायों के साथ समय बिताना उन्हें सबसे सुकून देता है. परिवार की इन गायों का इस्तेमाल दूध निकालने के लिए नहीं किया जाता.
-जुमाना शाह