भारतीय टेलीकॉम क्षेत्र की कहानी का कोलकाता से गहरा नाता है. इस रिश्ते की शुरुआत 1850 में ब्रिटिश राज में उस वक्त हुई जब शहर से डायमंड हार्बर के बीच पहली बार प्रायोगिक तौर पर टेलीग्राफ सेवा आरंभ हुई. करीब डेढ़ सौ साल बाद 31 जुलाई, 1995 को पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने केंद्रीय संचार मंत्री सुखराम को नोकिया के फोन से पहली मोबाइल कॉल की थी.
जब भारत को 1947 में आजादी मिली तब देश में 1,50,000 फोन एक्सचेंज लाइनें थीं और पोस्ट ऐंड टेलीग्राफ विभाग सेक्टर की देखरेख करता था. लंबे समय तक फोन उपयोगिता की चीज के बजाए हैसियत का प्रतीक बना रहा. कनेक्शनों की संख्या 1948 में मात्र 80,0000 से बढ़कर 1971 में 9,80,000, 1981 में 21.5 लाख और 1991 में 50.7 लाख हो गई.
वर्ष 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सालाना 50 लाख लाइनें बनाने की खातिर भारतीय कंपनी आइटीआइ के फ्रांस की कंपनी अल्काटेल सीआइटी में विलय के लिए अनुबंध पर हस्ताक्षर किए, लेकिन यह कामयाब नहीं हुआ. काम हुआ राजीव गांधी के जमाने में जब उनके कहने पर 1984 में टेक्नोक्रेट सैम पित्रोदा ने अनुसंधान और विकास निकाय सी-डॉट (सेंटर फॉर डेवलपमेंट ऑफ टेलीमेटिक्स) की स्थापना की. इसके अगले साल टेलीकॉम को पोस्ट और टेलीग्राफ विभाग से अलग कर दिया गया.
एक बरस बाद मुंबई और दिल्ली में टेलीकॉम सेवाओं के लिए महानगर टेलीफोन निगम (एमटीएनएल) बनाया गया और विदेशी सेवाओं के लिए विदेश संचार निगम (वीएसएनएल) की स्थापना हुई. वर्ष 1994 में राष्ट्रीय दूरसंचार नीति बनी और एक साल बाद मोबाइल फोन आने से टेलीकॉम सेक्टर का नक्शा बदल गया.
इस सेक्टर को 1997 में ट्राइ या टीआरएआइ (टेलीकॉम रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया) नामक एक नियामक मिला. 2002 के बाद से चुनिंदा प्राइवेट कंपनियों को बेसिक और मोबाइल फोन सेवा देने की अनुमति मिली है. आज चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा टेलीकॉम मार्केट है. देश अब 5जी सेवाएं शुरू करने जा रहा है.

