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विशेषांकः मंच पर स्वाभाविक

अब तक 100 नाटकों के 500 से ज्यादा शो कर चुकी इस रंगकर्मी में एक एक्टिविस्ट भी समाया हुआ है. स्माइल, क्राइ और आइसा सरीखे सामाजिक संगठनों के लिए भी काम किया है.

प्रियंका शर्मा
प्रियंका शर्मा
अपडेटेड 10 जनवरी , 2022

नई नस्ल100 नुमाइंदे/सिनेमा

प्रियंका शर्मा, रंगकर्मी

पुरानी दिल्ली के एक कारोबारी परिवार में जन्मी और पली-बढ़ीं प्रियंका शर्मा ने अभिनेत्री और निर्देशिका के रूप में भारतीय रंगमंच पर अपनी खास पहचान बनाई है. राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से स्नातक न होने के बावजूद वहां की डिप्लोमा प्रस्तुतियों में रोल के लिए उन्हें बुलाया जाता रहा है.

पर अपने आदर्श अभिनेता महेंद्र मेवाती के बरअक्स औरंगजेब (2013) नाटक में रौशन आरा की भूमिका के साथ रंगप्रेमियों के दिलोदिमाग में उन्होंने अपनी छाप छोड़नी शुरू की. सहजता से किरदारों में ढल जाने की उनकी प्रतिभा ही थी जिसकी वजह से 4-5 साल पहले चर्चित रंग निर्देशक सत्यव्रत राउत के बहुप्रशंसित नाटक तुम्हारा विन्सेंट की नायिका का रोल उन्होंने 15 दिन में ही आत्मसात कर लिया.

प्रियंका ने ध्रुव स्वामिनी (जयशंकर प्रसाद) जैसे क्लासिक नाटकों का निर्देशन भी किया है. उनके सहज और स्वाभाविक अभिनय से खासे प्रभावित राउत जॉर्ज ऑरवेल के उपन्यास 1984 पर आधारित अपने अगले बड़े प्रोजेक्ट द लास्ट मैन में प्रियंका को शीर्ष भूमिका में लेकर जल्द रिहर्सल शुरू करने जा रहे हैं.

अब तक 100 नाटकों के 500 से ज्यादा शो कर चुकी इस रंगकर्मी में एक एक्टिविस्ट भी समाया हुआ है. स्माइल, क्राइ और आइसा सरीखे सामाजिक संगठनों के लिए भी काम किया है. दिल्ली के सिविल लाइंस में अपने ग्रुप सिली सोल्स फाउंडेशन के तहत एक पुरानी हवेलीनुमा जगह लेकर वे वहां नाट्य गतिविधियां कर रही हैं. वे कहती हैं, ''मंडी हाउस से इतर दूसरे इलाकों में भी ऐसी सांस्कृतिक जगहें बनानी ही होंगी, जहां लोग रचनात्मक ढंग से दिल बहला सकें.’’ 

जा, जी ले चार दिन 2007 में एनएसडी में दाखिले के आखिरी मुकाम चार दिन की वर्कशॉप में प्रियंका चार रात सोईं नहीं. घर से यूं बाहर रहने की कभी इजाजत ही नहीं मिली थी. प्रवेश, जो कि नहीं हुआ, से ज्यादा उनकी दिलचस्पी इस बात में थी कि इन लम्हों को जी भर जी लें

''प्रियंका सहज-स्वाभाविक अभिनेत्री हैं. वे प्रयास नहीं करतीं बल्कि प्रक्रिया में विश्वास करती हैं. वे पढ़ती भी बहुत हैं. आज के रंगर्मियों में यह आदत कम दिखती है’’
—सत्यव्रत राउत, थिएटर डायरेक्टर

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