खुशी की खोज/गुरु वाणी
श्री श्री रविशंकर
आप नहीं जानते तो खुशी आपके लिए विचार भर है. जानते हैं तो आप ही खुशी हैं. यह इनसान की सबसे कुदरती अवस्था है और तब जाहिर होती है जब आप इसे अंदर से महसूस करते हैं. जब हम अपने आत्म से, अपने स्वभाव से दूर जाते हैं, हम नाखुश होते हैं. विडंबना यह है कि खुद खुशी का स्रोत होते हुए भी हम इसे दूसरी जगहों पर खोजते रहते हैं. उस मछली की तरह जो समुद्र में पानी खोजती है.
हमें उन कारकों को जानना ही चाहिए जो हमारी खुशी को प्रभावित करते हैं. पहला है स्वास्थ्य, दूसरा पर्यावरण और तीसरा रुपए-पैसे. चौथा है महत्वाकांक्षा. मान लीजिए हमारे पास पहली तीन चीजें हैं लेकिन हम अत्यधिक महत्वाकांक्षी हैं. यह हमारे अस्तित्व में खलबली मचा देगी. इच्छा का मतलब है भविष्य में इच्छाएं पूरी करने के जरिए खुशी पाने का जतन करना. अगर आप कहें कि जब इन सारी इच्छाओं से निजात मिल जाएगी तब मैं खुश होऊंगा, तो यह तो होने वाला नहीं!
चुनौती यह है कि अपनी तलाश को तिलांजलि दिए बिना खुश रहना. यह हुनर है जो सीखा जाता है. इस मामले में नन्हे बच्चों से बेहतर शिक्षक कोई नहीं. उनकी अभिलाषाएं होती हैं, तब भी वे उस पल खुश रहते हैं. वे वह सब करते हैं जो उन इच्छाओं को पूरा करने के लिए करना होता है, पर उन्हीं में अटके नहीं रहते.
उनके मन को एक से दूसरी चीज की तरफ आसानी से मोड़ा जा सकता है. खिलौनों से टॉफी और टॉफी से कुछ और. हमें मन-मस्तिष्क को इच्छानुसार दूसरी दिशा में मोड़ने और किसी भी चीज में अटके नहीं रहने की क्षमता विकसित करने की जरूरत है.
खुशी नजरिया है जिसे विकसित करना होता है, नियम है जिसका पालन करना होता है. महर्षि पतंजलि ने संतोष या खुशी को नियम, निजी आचार प्रतिपादित किया. आपको खुशी से तादात्म्य बिठाना होता है. यह कोई शारीरिक या मनोवैज्ञानिक परिघटना भर नहीं. जीवन में उतार-चढ़ाव आते हैं. तमाम परिस्थितियों में जतनपूर्वक अपने स्वभाव में, खुशी के स्वभाव में, टिके रहना होता है. ठान लें कि दुनिया की किसी भी चीज को अपनी खुशी में खलल नहीं डालने देंगे. बुद्धिमान होने का यही उद्देश्य है.
वेदांत का मुक्चय विषय यही है. कई संन्यासियों का नाम 'आनंद’ से खत्म होता है. यह नाम ही उन्हें याद दिलाता है कि वे परमानंद हैं, वे अपने लिए कुछ नहीं चाहते और चारों ओर खुशी फैलाने के लिए यहां हैं.
कोई भी मनुष्य अपने आप में पूर्ण द्वीप नहीं. परिवार में एक व्यक्ति नाखुश है, तो असर दूसरे सदस्यों पर भी पड़ता है. हम सब परस्पर अंतर्निर्भर और अंतर्सबंधित हैं. खुशी हालांकि व्यक्तिगत नजरिया है, पर यह हमारे पर्यावरण से भी जुड़ी है. बगल की सड़क पर दंगा हो तो कोई खुश होने का दावा नहीं कर सकता.
यही वजह है कि हमें हिकमत से काम लेने और दूसरों की खुशी की परवाह करने की जरूरत है. जिस तरह हमें दांत साफ करना सिखाया जाता है, वैसे ही हमें चित्त की सफाई का ख्याल रखना चाहिए. लोगों को सिखाया जाना चाहिए कि वे नकारात्मक विचारों और परिस्थितियों को कैसे संभालें और सकारात्मक मानसिकता के साथ कैसे आगे बढ़ें.
सरकार, एनजीओ और धार्मिक संस्थाओं का प्राथमिक लक्ष्य खुश और स्वस्थ समाज का निर्माण करना है. यह केवल रोटी, कपड़ा और मकान देकर नहीं हो सकता. मानसिकता बदलनी होती है और इसके लिए एक पारिस्थितिकीय तंत्र निर्माण करने की जरूरत है. अपने सच्चे स्वभाव का पालन करना टिकाऊ खुशी का अकेला रास्ता है.
श्री श्री रविशंकर आर्ट ऑफ लिविंग फाउंडेशन के संस्थापक हैं. फाउंडेशन कई कार्यक्रमों के साथ हैपीनेस प्रोग्राम भी चलाता है.
खुशी का मंत्र
''खुशी के साथ खुद आपको तादात्क्वय स्थापित करना होता है. यह कोई शारीरिक या मनोवैज्ञानिक क्रिया नहीं है’’.

