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विशेषांकः उन सम कौन

कम ही हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायक सभागारों को श्रोताओं से उस तरह भर पाते थे जैसा कि पंडित भीमसेन जोशी. उनकी खयाल गायिकी हमें हर्षातिरेक में डुबो देती थी. इस भारतरत्न विजेता ने मिले सुर मेरा तुम्हारा से देश को एक सूत्र में पिरोया.

पंडित भीमसेन जोशी
पंडित भीमसेन जोशी
अपडेटेड 4 सितंबर , 2021

स्वतंत्रता दिवस-पथप्रवर्तक / कला, संगीत और नृत्य

पंडित भीमसेन जोशी (1922—2011)

शुभा मुद्गल

पंडित भीमसेन जोशी की अनूठी शैली, आवाज और भंगिमाओं की देश भर के बीसियों गायक नकल करते रहते हैं. उनकी ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग सोशल मीडिया के दबदबे वाली इस दुनिया में भी लाखों व्यूज आकर्षित करती हैं.

उनकी प्रतिभा की चमक और वैयक्तिकता के सम्मान में कई अवार्ड, महोत्सव, शैक्षणिक संस्थानों में पीठ स्थापित की गई हैं. अपने जीवनकाल में उनके अनुयायियों और मुरीदों की कोई बराबरी नहीं थी.

जब वे अपने आखिरी सालों में एक बार पुणे के सवाई गंधर्व महोत्सव में महज हाजिरी लगाने के लिए अपनी कार से आए तो प्रशंसकों की भारी भीड़ अनायास उनके पैरों की तरफ बढ़ी और जयजयकार से आसमान गुंजा दिया.

फिर भी इस भारतरत्न की विरासत उसी अनिश्चित भविष्य से घिरी है जिससे कई दूसरे महारथियों की विरासतें घिरी हैं. उनकी शैली का अनुसरण करने वाले अक्सर दरिद्र या ज्यादा से ज्यादा उस वैयक्तिकता के समर्थ नकलची ही बने रहते हैं जिसकी संभवत: नकल नहीं की जा सकती.

उनके उपासक अक्सर बिना किसी संदेह के उनके वक्त की यादों के आगे घुटने टेककर इन नकल या प्रतिकृतियों को स्वीकार कर लेते हैं. ऐसा करके वे न तो वह माहौल दे पाते हैं और न भरोसा, जिसमें उस्ताद जैसी शख्सियत फल-फूल सके.

उन्हीं उस्ताद जैसी, जिन्होंने संदेह से परे साबित किया था कि घराना परंपराओं के प्रति वफादार रहते हुए भी अपनी आवाज खोजना मुमकिन है. उनकी विरासत असल में, इसी अक्सर अनदेखी कर दी गई सचाई की याद दिलाती है.

शुभा मुद्गोल हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायिका और पद्मश्री हैं.

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