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जल विशेषांकः गुजरात का  जलतंत्र

दो दशकों के भीतर भारी जल संकट वाले राज्य से पर्याप्त पानी की उपलब्धता वाले सूबे में तब्दील होने के पीछे सिर्फ नर्मदा कैनाल नहीं है,  ऐसा वहां के दूरदर्शी नेतृत्व की वजह से मुमकिन हुआ.

पानी का उठान ढांकी स्थित पंपिंग स्टेशन से नर्मदा कैनाल के पानी को 10.81 मीटर ऊपर उठाकर ढलान वाले सिस्टम में डाला गया है
पानी का उठान ढांकी स्थित पंपिंग स्टेशन से नर्मदा कैनाल के पानी को 10.81 मीटर ऊपर उठाकर ढलान वाले सिस्टम में डाला गया है
अपडेटेड 25 मार्च , 2021

दक्षिण और मध्य गुजरात के इलाकों से 458 किलोमीटर लंबी नर्मदा नहर हरे-भरे हाइवे की तरह सरपट गुजरती है. राज्य की राजधानी गांधीनगर से ज्यादा दूर नहीं,  इस नहर की एक शाखा इस इलाके के धूल भरे मैदानों में स्थित विशाल पंपिंग स्टेशन ढांकी तक पानी ले जाती है. यहां से पानी को ऊंचाई पर ले जाने के अविश्वसनीय सिलसिले की पहली शुरुआत होती है,  जो नहर के पानी को सूखाग्रस्त सौराष्ट्र इलाके तक पहुंचाती है.

वही सौराष्ट्र जिसे पहले राज्य का केवल 17 फीसद पानी हासिल था. राज्य के प्रधान सचिव (जल) धनंजय द्विवेदी बताते हैं कि ऐसा इसलिए था क्योंकि ‘‘सौराष्ट्र उलटे कटोरे के आकार का है और नहर का पानी 69 मीटर या 23 मंजिला इमारत जितनी खड़ी चढ़ाई पर पंप करके ले जाना पड़ता था ताकि वह इलाके के हरेक हिस्से में पहुंच सके.’’ इसी तरह नहर की शाखाएं कच्छ के रेगिस्तान और उत्तर गुजरात के शुष्क इलाकों तक पानी ले जाती हैं. नर्मदा के पानी ने महज दो दशकों में राज्य के समूचे भूदृश्य और यहां के लोगों की जिंदगियों का कायापलट कर दिया है.

इस नहर का काम शुरू होने से पहले देश के सूखाग्रस्त भूभाग में बसा गुजरात हमेशा पीने और सिंचाई दोनों के पानी की कमी से त्रस्त रहता था. द्विवेदी याद करते हैं कि कई जिलों के डिप्टी कमिशनर के नाते उनका एक मुख्य काम पेयजल की जरूरतें पूरी करने के लिए पानी के टैंकरों और यहां तक कि पानी की रेलों का इंतजाम करना होता था.

पानी का भूगोल
पानी का भूगोल

इंडिया टुडे ने 2003 में ‘प्यासी धरती, प्यासे लोग’  शीर्षक से एक बड़ी स्टोरी की थी और तब उसकी आवरण तस्वीर में गुजरात के लिंबड़ी तालुका के एक गांव में सैकड़ों ग्रामीणों की भीड़ को एक बालटी पानी लेने के लिए एक कुएं को घेरे खड़े दिखाया गया था. गृहणी सोना वाघेला याद करती हैं कि किस तरह रोज उनके चार घंटे सूखे कुओं से पानी भरकर लाने में बीतते थे. वे कहती हैं , ‘‘ज्यादा से ज्यादा पानी लेने के लिए कहा-सुनी और कई बार तो मार-पीट तक होती थी.

पूरे परिवार को कुएं पर भीड़ लगानी पड़ती थी क्योंकि एक सदस्य दो बालटी से ज्यादा पानी नहीं ले सकता था.’’ 2021 में लिंबड़ी का नजारा पूरी तरह बदल चुका है. सूखी झील लबालब भरी होने से इलाका पानी से भरपूर है और वाघेला के घर सहित अनेक मकानों में नल लगे हैं. यह सब इसलिए हो सका क्योंकि 2008 8के आसपास नर्मदा नहर की एक ब्रांच इस इलाके में पानी की आपूर्ति करने लगी.

तो भी यह आसान कायाकल्प नहीं था और अगर यह कामयाब हुआ है तो नरेंद्र मोदी की दूरगामी दृष्टि की वजह से , जिन्होंने पहली बार 20में मुख्यमंत्री के तौर पर राज्य की कमान संभाली थी जब नर्मदा नहर का निर्माण हो रहा था. मोदी ने अफसरों से कहा कि केवल नर्मदा नहर पर ही निर्भर न रहें बल्कि मौजूदा नहर प्रणालियों को भी मजबूत करें. उन्होंने जोर देकर कहा कि पेयजल और सिंचाई के पानी का प्रबंधन भागीदारी से परिपूर्ण होना चाहिए.

इसका मतलब था परियोजनाओं पर अफसरशाही के शिंकजे को तोडऩा और बिल्कुल शुरुआत से ही इस काम में एनजीओ के साथ पानी के लाभार्थियों को भी शामिल करना. सबसे अहम बात यह कि मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी ने पानी आपूर्ति का बुनियादी ढांचा खड़ा करने के लिए धनराशि अलग रखी, क्योंकि वे जो सामाजिक-आर्थिक बदलाव लाना चाहते थे उसमें इसे सबसे अहम मानते थे. बीते दो दशकों में राज्य ने जल संसाधनों में कुल मिलाकर 1 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है.

आगा खान ग्रामीण सहायता कार्यक्रम के वाइस-प्रेसीडेंट, वाटर, इरिगेशन ऐंड पावर प्रोग्राम्स, अपूर्व अजय ओझा, जिन्होंने इस मिशन पर गुजरात सरकार के साथ नजदीक से मिलकर काम किया था. कहते हैं कि इस कामयाबी के पीछे तिहरे कारण थे. वे कहते हैं, ‘‘पहला, नरेंद्र मोदी ने पानी के मौजूदा स्रोतों को मजबूत करने की अहमियत को तुरंत पहचान लिया था, यहां तक कि तब भी जब नर्मदा नहर से राहत मिलने लगी थी.

दूसरे, उन्होंने जल संरक्षण और विशेष रूप से ड्रिप इरिगेशन को बढ़ावा देने पर जोर दिया. तीसरे, प्रबंधन के कामों के लिए इंजीनियरों पर निर्भर होने के बजाए उन्होंने एनजीओ को लोगों को शिक्षित करने के कामों में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित किया और संचालन संभालने के मकसद से पेयजल के लिए पानी समितियां या सिंचाई के पानी के वितरण के लिए वाटर यूजर एसोसिएशन का गठन कराया.’’

फिर मोदी ने जल संसाधनों की साज-संभाल के लिए अफसरशाही के संगठन का स्वरूप बदलते हुए उसे एक छत्र संगठन के बजाए कामकाजी महकमों में बांट दिया. गुजरात वाटर सप्लाइ और सीवरेज बोर्ड जल संसाधनों और नालियों के विकास और नियमन का प्रभारी बना रहा. जलापूर्ति सुविधाओं का संचालन और प्रबंधन करने के मकसद से ग्राम स्तरीय संस्थाओं को ताकतवर बनाने के लिए जल और स्वच्छता प्रबंधन संगठन (डब्ल्यूएएसएमओ या वास्मो) बनाया गया.

सरदार सरोवर निगम लिमिटेड को स्वायत्तशासी निकाय बना दिया गया जो सरदार सरोवर परियोजना को जमीन पर उतारने के लिए जिम्मेदार था. गुजरात वाटर इन्फ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड को नर्मदा का पानी लाने के मकसद से बल्क-वाटर पाइप ग्रिड का निर्माण करने की जिम्मेदारी सौंपी गई.

गुजरात जल संसाधन विकास निगम (जीडब्ल्यूआरडीसी) भूमिगत जल के सर्वेक्षण, निगरानी और विकास के लिए जिम्मेदार स्वायत्तशासी निकाय बन गया. अफसरशाही के तंत्र को सरल और कारगर बनाने के बाद मोदी ने पानी और स्वच्छता के कामों से जुड़े संगठनों के लिए पांच बड़े क्षेत्र तय किए जिन पर उन्हें ध्यान देना था. इनमें जल संरक्षण, पानी को एक से दूसरे बेसिन में पहुंचाना और उन्हें आपस में जोडऩा, मौजूदा नहर प्रणाली को मजबूत बनाना, पानी और ‌सिंचाई का भागीदारी से परिपूर्ण प्रबंधन और माइक्रो-इरिगेशन या सूक्ष्म-सिंचाई शामिल थे.

इस तरह एकाग्र ढंग से ध्यान देकर काम करने के बड़े नतीजे मिले-राज्य के सिंचाई योग्य क्षेत्र में 77 फीसद का इजाफा हुआ, भूमिगत जल का भराव 2002 के मुकाबले 55 फीसद ऊपर आ गया, और अब शुद्ध बुआई का 20 फीसद क्षेत्र सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत आ गया है. 1,84,000 से ज्यादा चेक डैम और 3,27,000 कृषि तालाब बनाए गए हैं. इसके अलावा 31,500 अन्य तालाबों को गहरा करके उनकी क्षमता बढ़ा दी गई है. साथ ही, बेकार मानकर छोड़ दी गई करीब 1,000 बावडिय़ों को पुनर्जीवित और साफ-सुथरा करके इस्तेमाल किया जा रहा है.

अब 18,200 के आसपास (करीब 95 फीसद) गांवों में पानी समितियां हैं जो अपनी जलापूर्ति का काम संभालती हैं और बताती हैं कि भागीदारी वाले प्रबंधन ने गहरी जड़ें पकड़ ली हैं. द्विवेदी कहते हैं, ''वह राज्य जो हमेशा पानी की कमी से जूझता रहता था, महज दो दशकों में ऐसे राज्य में बदल गया है जिसके पास पीने, खेती-किसान, पशुपालन, उद्योगों के लिए पर्याप्त पानी है और इसने आर्थिक वृद्धि का भी सूत्रपात किया है.’’

जल संसाधनों के मामले में मोदी मुख्यमंत्री के तौर पर जल प्रबंधन का सफल मॉडल विकसित करने का निश्चित तौर पर दावा कर सकते हैं. अब प्रधानमंत्री के तौर पर वे उन सबकों में से कुछ को देश भर में रोप रहे हैं जो उन्होंने गुजरात के अपने लंबे कार्यकाल में सीखे थे.

पानी का भूगोल
मुख्य नर्मदा कैनाल से पानी सौराष्ट्र ब्रांच में ढांकी पहुंचता है और यहां से वाटर लिफ्टिंग तथा अनेक ब्रांच कैनाल के जरिए यह सूखे क्षेत्रों तक पहुंचाया जाता है

बड़ी तस्वीर
समस्या:
साल 2000 तक गुजरात की गिनती पानी के लिए तरसते राज्यों में थी. 

समाधान:
नर्मदा कैनाल और उसके बाद बने सब सिस्टम, खासकर पेयजल और सिंचाई के पानी के प्रबंधन से राज्य में पर्याप्त पानी उपलब्ध हुआ
77 %

की बढ़ोतरी दर्ज की गई सिंचित भूमि में जब से नर्मदा के पानी का पूरे राज्य में वितरण शुरू हुआ

गुजरात के गांवों में 'पानी समितियां' हैं जो पानी सप्लाइ का प्रबंधन करती हैं

दुख-सुख
सुरेंद्रनगर जिले के लिंबड़ी तालुका में कुएं की यह तस्वीर, इंडिया टुडे के 11 जून, 2003 अंक के कवर पर छपी थी; सोना वघेला, जो उस तस्वीर में थीं, 2021 में उसी कुएं के पास खड़ी हैं. वह कुआं अब बड़े तालाब में डूब गया है 

इफरात
सुरेंद्रनगर जिले के राजसीतापुर में चेक डैम पीपीपी आधार पर बनाया गया. इससे 38 वर्षीय महेश पटेल जैसे किसानों को साल में तीन फसल उगाने और वार्षिक आय बढ़ाने में मदद मिली

''हमेशा पानी संकट से जूझते गुजरात में अब पीने के लिए, सिंचाई के लिए और उद्योग के लिए पर्याप्त पानी है और इससे आर्थिक विकास का भी सूत्रपात हुआ है’’
धनंजय द्विवेदी
प्रधान सचिव (जल)

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