
जरा सोचिए. 2018 में विज्ञान और इंजीनियरिंग में शोध की 40,813 डिग्रियां देने वाला भारत इन विषयों में हर साल पीएचडी उपाधियों के मामले में दुनिया में अमेरिका और चीन के बाद तीसरी पायदान पर होता है. सालाना शोध प्रकाशनों के मामले में 5.4 फीसद हिस्सेदारी के साथ भारत पांचवीं पायदान पर है (अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और जर्मनी के बाद, जिनकी हिस्सेदारी क्रमश: 21.8, 18.7, 6.5 और 6.2 फीसद है). पर नए पेटेंट की बात आते ही भारत बुरी तरह पिछड़ जाता है. 1976-77 में सक्रिय भारतीय पेटेंट की संख्या 2,746 थी. 2017-18 तक यह बढ़कर 8,830 पर पहुंच गई. इसी अवधि में भारत में अंतरराष्ट्रीय पेटेंट 19,780 से बढ़कर 47,934 हो गए.
इसकी एक वड़ी वजह तो खर्च ही है. अनुसंधान और विकास (आरऐंडडी) पर राष्ट्रीय सालाना खर्च 2012-13 से जीडीपी के 0.7 फीसद पर ठहरा हुआ है. इसका मतलब यह है कि अनुसंधान पर प्रति व्यक्ति खर्च 47.2 डॉलर है, जो मैक्सिको और वेनेजुएला सरीखे देशों से भी कम है, हालांकि पाकिस्तान और श्रीलंका से बेहतर है. भारत में प्रति दस लाख लोगों पर 255 शोधकर्ता हैं, जो पाकिस्तान के 336 से कम और इजराइल के प्रति दस लाख 8,342 से तो कई गुना कम हैं.

आरऐंडडी के इस समुंदर में भारत के वैश्विक उत्कृष्टता के द्वीप अगर कोई हैं तो वे हैं रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो). इसरो की उपलब्धियों की सुनहरी फेहरिस्त में अब 109 अंतरिक्षयान मिशन, 77 प्रक्षेपण मिशन, 10 छात्र उपग्रह और दो पुनर्प्रवेश मिशन शामिल हैं. यह एजेंसी कक्षा में अपने उपग्रह स्थापित करने में दिलचस्पी रखने वालों के लिए प्राथमिक पसंद बनी हुई है. इसने अभी तक 319 विदेशी उपग्रह लॉन्च किए हैं और दूसरे ग्रहों तक भी लंबी यात्राएं शुरू की हैं.
जबरदस्त संभावनाओं से ओतप्रोत एक और क्षेत्र है बायोटेक्नोलॉजी. टीके या वैक्सीन के विकास में भारत की अगुआई, जिसमें घरेलू फर्म वैश्विक अगुआओं के साथ-साथ कोविड का टीका लेकर आईं, इस बात की तस्दीक करती है. विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय की राष्ट्रीय बायोटेक्नोलॉजी विकास रणनीति का मकसद इसकी बुनियाद पर आगे का निर्माण करना और भारत को दुनिया के बायो-मैन्युफैक्चरिंग हव के तौर पर स्थापित करना है. दुनिया भर के उत्पादन में देश की 60 फीसद हिस्सेदारी पहले ही है और वह 150 से ज्यादा देशों को 1.5 अरब से ज्यादा खुराक सालाना सप्लाइ कर रहा है. अकेला विश्व स्वास्थ्य संगठन ही अनिवार्य टीकाकरण कार्यक्रमों के 70 फीसद टीके भारत से लेता है.
इतनी ही संभावनाओं से भरा एक और क्षेत्र आइटी (इंर्फोमेशन टेक्नोलॉजी) है. दुनिया का तकरीबन 75 फीसद डिजिटल कार्यबल भारत में है. 2020 तक घरेलू आइटी कार्यबल में 44 लाख कर्मचारी थे. आइटी-बीपीएम उद्योग का राजस्व वित्तीय साल 2020 में लगभग 191 अरब डॉलर था और 2025 तक इसके बढ़कर 350 अरब डॉलर पर पहुंच जाने की उम्मीद है. इस क्षेत्र ने विश्वस्तरीय टेक्नोलॉजी समाधानों और बिजनेस सेवाओं में भारत को वैश्विक अगुआ बना दिया है.
इसके बाद भी सत्तर से ज्यादा साल बहुत लंबा वक्त होता है. यह विज्ञान और प्रौद्योगिकी के जरिए राष्ट्र का कायापलट करने के लिए कम समय बिल्कुल नहीं. चीन सरीखे जनसंख्या बहुल और इज्राएल सरीखे कम संसाधन वाले दोनों तरह के देशों ने साबित किया है कि यह मुमकिन है. भारत में आरऐंडडी की कहानी टुकड़ा-टुकड़ा तरक्की की कहानी है. मंगलयान और कोविड वैक्सीन सरीखी कामयाबियों के साथ-साथ बिल्कुल उलट हकीकत बयान करने वाली कहानियां भी हैं—बिहार में हाइपोग्लाइसीमिक एंसिफैलोपैथी से मरते भारतीय बच्चे, खाद्य तेल का दुनिया में सबसे बड़ा आयातक होने का बदनाम दर्जा. ये बहुत बड़ी हद तक विज्ञान और प्रौद्योगिकी की ताकत का पूरा इस्तेमाल कर पाने में हमारी नाकामी बयान करते हैं.
भारत की आत्मनिर्भरता की खोज अब भी बहुत शुरुआती अवस्था में है. हम उस हकीकत से अब भी बहुत दूर हैं जिसमें हमारे बाजारों में तमाम उत्पाद मेड इन इंडिया हों. इसके लिए आरऐंडडी में गुणवत्ता और महारत हासिल करना बेहद जरूरी है.

