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अनजाने नायकः समाजसेवी डिजाइनर

''अगर आप दूसरों के जीवन में सचमुच बदलाव लाना चाहते हैं तो उपदेश देने की बजाए काम करें''

संदेश रवि कुमार
संदेश रवि कुमार
अपडेटेड 24 दिसंबर , 2019

शेली आनंद

मुंबई की मलिन बस्तियों में सात साल के बच्चे के रूप में, अत्तरवाला को हर सुबह अपने साथ सार्वजनिक शौचालय में एक बाल्टी पानी लेकर जाना पड़ता था. पतले हैंडल से उनकी अंगुलियों में चोट लग जाती और पहुंचने से पहले ही बहुत सारा पानी छलककर गिर जाता था. उन्होंने सोचा, क्या कुछ ऐसा नहीं किया जा सकता जिससे बाल्टी में पानी लेकर जाना कम कष्टप्रद हो जाए. अगले दिन, उन्होंने तेल के एक खाली कनस्तर को काटा और पानी ले जाने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया क्योंकि उसका हैंडल बेहतर था और उसमें रखा पानी छलका भी नहीं. वे बताती हैं, ''मेरा नया कंटेनर पुरानी बाल्टी से बेहतर है, इसे देखते हुए मेरे पड़ोसी भी इसे उधार मांगकर ले जाने लगे. तब मुझे एहसास हुआ कि मैं सीमित संसाधनों के साथ भी कुछ कर सकती हूं.''

आज, उनके पास कानून की डिग्री और डिजाइन में डिप्लोमा है. लेकिन यह प्रारंभिक योजना नहीं थी. वे कहती हैं, ''जैसे ही मैं युवावस्था में पहुंची, मेरा परिवार जल्द से जल्द मेरी शादी करा देने की सोचने लगा. एक किशोरी के रूप में, मेरे लिए मेरे पिता को यह समझाना मुश्किल था कि शिक्षा, शादी से बेहतर विकल्प है.'' लेकिन उनके प्रयास रंग लाए. 2018 से वे जूमकार की उत्पाद डिजाइन टीम का नेतृत्व कर रही हैं. जूमकार बेंगलूरू का एक सेल्फ-ड्राइव कार रेंटल स्टार्ट-अप है. शाहीना के पास फिन-टेक, ई-कॉमर्स और शिक्षा सहित कई क्षेत्रों में उत्पाद डिजाइन का भी व्यापक अनुभव है. वे अंतरराष्ट्रीय डिजाइन सम्मेलनों में अतिथि व्याख्याता भी रही हैं. वे कहती हैं, ''मैं उपयोगकर्ता अनुभव (यूजर एक्सपीरिएंस) से जुड़ी समस्याओं को सहानुभूति और डिजाइन से जुड़ी सोच के जरिए हल करती हूं.''

सामाजिक कार्य भी हमेशा उनके जीवन का हिस्सा रहा है. वे कहती हैं, ''हम सबके साथ सम्मान के साथ व्यवहार करना सिखाया गया है. इससे सहानुभूति की भावना विकसित करने में मदद मिली. हमें लोगों के साथ बांटकर खाना सिखाया गया था, जबकि हमारे पास ही बहुत कम उपलब्ध था.'' सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में, वे स्वच्छता और शिक्षा के क्षेत्र में काम करती हैं. उनकी दो स्वच्छता पहल को संयुक्त राष्ट्र ने पहले ही मान्यता दे दी है. वे बताती हैं, ''मेरा परिवार हमारे गांव और झुग्गियों के बच्चों की पढ़ाई में मदद करता है. मैं जल्द ही इस काम को आगे बढ़ाने के लिए एनजीओ शुरू करना चाहती हूं.''

शाहीन कहती हैं, ''कुछ हासिल करने के लिए बहुत दृढ़ता और धैर्य की जरूरत होती है, जिसमें लोगों की मानसिकता को बदलना भी शामिल है.'' वे कहती हैं, ''अगर आप कोई छाप छोडऩा चाहते हैं तो आपको उपदेश देने की बजाए काम करना चाहिए.'' और उन्होंने अपने प्रयासों से ऐसी एक मिसाल दी है. वे कहती हैं कि उन्हें तब बहुत अच्छा महसूस होता है जब उनके गांव के लोग उन्हें बताते हैं कि उनकी बेटियां पढ़ाई करना चाहती हैं और आगे क्या किया जाए, इसके बारे में उनसे मश्विरा करना चाहती हैं. वे कहती हैं, ''यह बात मुझे भावुक कर देती है क्योंकि बदलाव की बयार वहां भी बह चली है जहां इसके झोंके कभी पहुंचे न थे.''

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