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अनजाने नायकः बदलाव लाने को समर्पित शख्स

प्रत्यय अमृत बिहार में जिस भी विभाग में गए, वहीं आमूलचूल परिवर्तन लाने में सफल रहे—चाहे वह ऊर्जा विभाग या सड़क

रंजन राही
रंजन राही
अपडेटेड 24 दिसंबर , 2019

अमिताभ श्रीवास्तव

इस साल सितंबर-अक्तूबर में जब पटना शहर में मूसलाधार बारिश ने कहर बरपाया, तो यह बिहार के ऊर्जा विभाग और राज्य आपदा प्रबंधन विभाग के प्रमुख सचिव प्रत्यय अमृत ही थे, जो सुबह पांच बजे घर छोड़ देते थे. टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहने और एक छतरी लिए अमृत एनडीआरएफ की नौकाओं पर खुद मौजूद रह कर जलभराव में फंसे नागरिकों की निकासी की देखरेख कर रहे थे. एक सप्ताह में राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग ने पटना के निचले इलाकों में जल-जमाव का शिकार बने घरों से 62,000 से अधिक लोगों को बचाया था.

जिस भी विभाग में उन्होंने पदभार ग्रहण किया उसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन करने के बाद 1991 बैच के इस आइएएस अधिकारी को बिहार के 'परिवर्तनकारी व्यक्ति' के रूप में जाना जाने लगा है. नई दिल्ली में केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर गए अमृत को 2006 में दुर्दशाग्रस्त बिहार राज्य पुल निर्माण निगम को पुनर्जीवित करने के लिए वापस बुलाया गया था. अमृत ने न केवल निगम की पुल-निर्माण दक्षता में सुधार किया, बल्कि दिवालिया होने के कगार पहुंचे इस निगम ने इतना लाभ भी अर्जित कर लिया था कि 2008-09 और 2009-10 में यह मुख्यमंत्री राहत कोष में 20 करोड़ रुपए दान भी दे सका.

इसके बाद उन्हें राज्य के सड़क निर्माण विभाग की जिम्मेदारी दी गई. यहां उन्होंने एक बार फिर परिवर्तन की पटकथा लिखी. 2011 में वे लोक प्रशासन में उत्कृष्टता के लिए व्यक्तिगत श्रेणी के प्रधानमंत्री पुरस्कार के लिए चयनित एकमात्र अधिकारी भी बने.

सड़क निर्माण विभाग में उनके कार्यकाल से प्रभावित होकर नीतीश कुमार ने उन्हें राज्य का ऊर्जा विभाग सौंपा. फिर, अमृत ने राज्य में 30,000 ट्रांसफॉर्मरों की मरम्मत या बदलाव करवाया और नई पारेषण लाइनें बनवाईं ताकि उन गांवों तक बिजली पहुंचाई जा सके जहां बिजली के तारों को लोग कपड़े सुखाने में इस्तेमाल कर रहे थे. 2005 में बिहार के 12,565 गांवों में बिजली थी, लेकिन अक्तूबर, 2018 तक राज्य के सभी 39,073 गांवों में हर घर तक बिजली पहुंच गई.

यह उपलब्धि उस लक्ष्य से तीन महीने पहले ही हासिल हो गई जो अमृत ने विभाग के लिए निर्धारित किया था. ऐसे राज्य में जहां राजधानी पटना सहित शहरी क्षेत्रों को दिन में 8-10 घंटे बिजली मिल पाती थी, वहां आज गांवों में भी 18 घंटे बिजली मिलती है जबकि शहरों को 24 घंटे आपूर्ति हो रही है.

यह सब करते हुए अमृत को निर्देशित करने वाला विश्वास है कि, ''आपसे जो अपेक्षा दूसरे करते हों, उतना भर करना अच्छा नहीं होता. मैं वह करता हूं जिसकी मैं खुद से उमीद करता हूं. अक्सर इसी से सारा फर्क पड़ता है.'' उन्होंने ही सरकार को प्रेरित किया है कि वह बेसहारा बच्चों को गोद ले और उन्हें केवल मौद्रिक सहायता प्रदान करने की बजाए दूसरी जरूरी सुविधाएं प्रदान करे. पटना में अत्याधुनिक क्रिकेट स्टेडियम बनवाने में उनका योगदान है.

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