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क्रांतिकारी दशकः क्रिकेट के साथ कुछ और भी

शुरुआत उम्मीदों से भरी, बीच में नाव डगमगाई. अब टोक्यो 2020 में अच्छे प्रदर्शन की उम्मीद के साथ इस दशक में भारत की अंतिम उम्मीद बाकी. क्या हमारे खिलाड़ी बाजी मार सकेंगे?

हमारे निशानेबाज रिकॉर्ड प्रदर्शन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
हमारे निशानेबाज रिकॉर्ड प्रदर्शन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं.
अपडेटेड 17 दिसंबर , 2019

बोरिया मजूमदार

किसी देश के इतिहास में ऐसा संयोग बमुश्किल ही बनता है कि एक दशक की शुरुआत और समाप्ति दोनों ही अवसरों के साथ होती है. हमने दशक की शुरुआत में 2010 में राष्ट्रमंडल खेलों में मिले अवसर को खूब भुनाया था. और आगामी ओलंपिक टोक्यो 2020 भारतीय खेल के भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे क्योंकि दशक की शुरुआत की तरह हम समाप्ति पर भी बड़ी उपलब्धि हासिल कर सकते हैं. भारत ने 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में 101 पदक जीते थे, फिर भी लोगों के दिमाग में इस खेल से जुड़ी जो यादें शेष हैं वे खेल के कुप्रबंधन की ही हैं; इसमें हुए भ्रष्टाचार की हैं जो सार्वजनिक चर्चा के केंद्र में आ गया था.

वास्तव में भारत ने 2008 के बीजिंग खेलों में अपने पारंपरिक रूप से मजबूत क्षेत्रों—निशानेबाजी, मुक्केबाजी और कुश्ती—में तीन पदक जीते थे. साफ संकेत था कि भारत इस दशक में खेल के क्षेत्र में एक वास्तविक राष्ट्रीय बदलाव के लिए तैयार है. शुरुआत में चीजें पटरी पर थीं. भारत ने बीजिंग ओलंपिक से मिली लय को बरकरार रखा और 2012 के लंदन ओलंपिक में मेडल की संख्या दोगुनी करते हुए छह पदक (दो रजत और चार कांस्य) जीते. लंदन में प्रदर्शन भारत का अब तक का सर्वश्रेष्ठ ओलंपिक प्रदर्शन था. तब भारतीय खेल में आशावाद की झलक मिलने लगी थी और संभावनाएं दिखने लगी थीं.

इसके बाद 2016 में रियो ओलंपिक में गिरावट आई. इससे पहले के किसी भी अन्य ओलंपिक की तुलना में सबसे ज्यादा 122 भारतीय खिलाड़ी ब्राजील गए थे. पूरा कैंप जोश से भरा दिखता था. भारतीय खेल प्राधिकरण (साइ) के मिशन ओलंपिक प्रकोष्ठ ने खेलों से पूर्व रखी आधिकारिक रिपोर्ट में 12 से 19 पदक जीतने की संभावना जताई थी. साइ की विस्तृत मूल्यांकन रिपोर्ट में (ओलंपिक पदक जीतने के संभावित) प्रत्येक भारतीय एथलीट का विस्तार से विश्लेषण किया और प्रगति चार्ट के साथ अपनी भविष्यवाणी की थी. यह रस्मी भविष्यवाणी और कुछ नहीं बल्कि रियो से पूर्व भारतीय खेलों के कर्ताधर्ताओं के बीच आशावाद का प्रदर्शन था. पर हुआ क्या, ओलंपिक टीम सिर्फ दो पदक के साथ लौटी, और पदक तालिका में भारत 67वें स्थान पर रहा.

टोक्यो 2020 शायद हमारे लिए आखिरी मौका है. 2019 में भारत के निशानेबाजों के शानदार प्रदर्शन ने टोक्यो में भारत के लिए रिकॉर्ड पदक की उम्मीदें जगाई हैं. फॉर्म में अस्थायी गिरावट के बावजूद पी.वी. सिंधु के लिए रियो में रजत से बेहतर प्रदर्शन करने का अच्छा मौका है. मुक्केबाजी और कुश्ती में भी एक से ज्यादा पदक की उम्मीद के हर कारण दिखते हैं और पहली बार भारत की पदक संख्या दहाई में पहुंच सकती है.

जहां ओलंपिक खेल में हम सफलता के निर्णायक मोड़ पर हैं, वहीं क्रिकेट में भारत इससे अधिक मजबूत नहीं हो सकता. भारत ने 2010 में नंबर एक टेस्ट टीम के रूप में दशक की शुरुआत की, और टेस्ट चैंपियनशिप रैंकिंग में सबसे ऊपर रहते हुए 2019 में निर्विवाद नंबर एक टीम के रूप में ही दशक को विदाई दी. हालांकि भारत आइसीसी मुकाबलों में ऐसी सफलता नहीं दोहरा पाया, फिर भी 50 ओवर के प्रारूप में भी हमारी टीम मजबूत दिखी. इसकी बहुत संभावना है कि जल्द ही वे घरेलू मैदान पर वैसा ही कारनामा करेंगे जैसा उन्होंने एम.एस. धोनी की कप्तानी में विश्व कप 2011 में किया था.

कुछ भी हो, 2019 में भारतीय टेस्ट टीम, दशक की शुरुआत वाली भारतीय टीम से बेहतर है. तब युवा खिलाड़ी रहे विराट आज क्रिकेट के हर फॉर्मेट में निर्विवाद रूप से दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज हैं और जसप्रीत बुमराह, मोहम्मद शमी, भुवनेश्वर कुमार, ईशांत शर्मा और उमेश यादव के रूप में तेज गेंदबाजी में भारत का यह अब तक का सर्वश्रेष्ठ संयोजन है. स्पिन आक्रमण भी काफी दुर्जेय है और आर अश्विन तथा रवींद्र जडेजा के मिश्रित गेंदबाजी आक्रमण क्षमता के साथ भारत की गेंदबाजी यूनिट काफी उल्लेखनीय है. इस टीम के साथ विराट 2021 में लॉडर्स में आइसीसी टेस्ट चैंपियनशिप जीतने में सक्षम दिखते हैं.

आर्थिक पहलू पर बात करें तो भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के मौजूदा अध्यक्ष सौरव गांगुली के नेतृत्व में भारतीय क्रिकेट की माली हालत अच्छी दिखती है. स्टार टीवी ने पिछले एक दशक में क्रिकेट प्रसारण अधिकारों के लिए 37,000 करोड़ रु. का भुगतान किया—निश्चित रूप से यह रकम अगले दशक में 50,000 करोड़ रुपए को छू जाएगी. इंडियन प्रीमियर लीग (आइपीएल) मजबूत होने के साथ दुनिया की कुछ सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाओं के लिए पसंदीदा टूर्नामेंट बन गया है. आशा है कि प्रथम श्रेणी क्रिकेट और महिला क्रिकेट को भी आने वाले वर्षों में गुणवत्तापूर्ण प्रदर्शन से लाभ मिलेगा. भारतीय क्रिकेट पहले की तुलना में बेहतर दिख रहा है, और सबसे अच्छा अभी आना बाकी है.

हालांकि, भारतीय फुटबॉल को अभी लंबी छलांग लगानी है. मसलन इंडियन सुपर लीग (आइएसएल) और यू-17 विश्व कप के लिए शुरुआत अच्छी हुई है. राष्ट्रीय टीम दुनिया के शीर्ष 100 टीमों में शामिल हो गई है, लेकिन निरंतरता अभी भी राष्ट्रीय टीम के लिए बड़ी चुनौती है. इसने हाल ही में कतर के खिलाफ एक शानदार खेल खेला, जिसमें उसे खूब शाबाशी मिली लेकिन घर में बांग्लादेश को हराने में नाकाम रही और विश्व कप क्वालीफायर में अफगानिस्तान से लगभग हार ही गई थी. कुल मिलाकर टीम के सामने अपने प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है.

आइएसएल, जो पहले से ही भारत का अग्रणी राष्ट्रीय टूर्नामेंट है, 2020 में मोहन बागान और ईस्ट बंगाल जैसे पारंपरिक मजबूत फुटबॉल क्लबों के जुडऩे के साथ और मजबूती हासिल करेगा. लीग ने पहले ही अपने स्तर में बहुत सुधार किया है और भारत के करिश्माई कप्तान सुनील छेत्री कहते हैं, ''कोई वजह नहीं दिखती कि हम 2026 विश्व कप में पहुंच न सकें. यदि आप आइएसएल में युवा खिलाडिय़ों की गुणवत्ता देखें, तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अगला दशक हमारा होगा.'' यह विश्वास की एक छलांग जैसा लगता तो है, लेकिन इस तरह के आत्मविश्वास से ही भारतीय फुटबॉल को ऊंचाई मिल सकती है.

पर दुख की बात है कि ऐसी आशा और विश्वास भारतीय टेनिस की दुनिया में नदारद है, जो आपसी खींचतान में बुरी तरह उलझा है और नई प्रतिभाओं की कमी से जूझ रहा है. लिएंडर पेस, महेश भूपति, सानिया मिर्जा और रोहन बोपन्ना अपना सर्वश्रेष्ठ दौर जी चुके हैं, उनके बाद टेनिस प्रतिभाओं का बक्सा खाली दिखता है. महेश और सोमदेव देववर्मन अब रिटायरमेंट ले चुके हैं, सानिया टोक्यो में मिश्रित युगल पदक में आखिरी शॉट (रोहन के साथ) लेने के लिए वापसी की कोशिश कर रही हैं.

2019 के अंत में यह लिखते समय मैं सबसे ज्यादा आशान्वित हूं निशानेबाजी से. रियो में सितंबर में विश्वकप में पांच स्वर्ण और नवंबर में चीन में प्रतियोगिता में तीन स्वर्ण सहित नौ पदक यह विश्वास देते हैं कि भारतीय निशानेबाजी अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के दौर में है और जुलाई 2020 के टोक्यो ओलंपिक में पदक सूची में सबसे ज्यादा योगदान देने को तैयार है. रियो (2016) में एक भी पदक नहीं जीतने वाले निशानेबाजी टीम का पिछले दो विश्व कपों में 15 पदक जीतना यह दर्शाता है कि टीम ने उल्लेखनीय सुधार किया है और इस सफलता का काफी श्रेय रियो के बाद एनआरएआइ (नेशनल राइफल एसोसिएशन ऑफ इंडिया) को जूनियर प्रोग्राम में अभिनव बिंद्रा समिति की सिफारिशों को प्रभावी रूप से लागू करने को जाता है.

समिति को रियो की हार की समीक्षा और सुधारके उपाय सुझाने का काम सौंपा गया था,  अपनी रिपोर्ट में बिंद्रा समिति ने लिखा था, ''समिति एकमत से मानती है कि भारतीय निशानेबाजी को बदलाव की जरूरत है. जो सिस्टम है वह कामचलाऊ दिखता है.'' एनआरएआइ की इस बात के लिए तारीफ होनी चाहिए कि इसके अध्यक्ष रणिंदर सिंह ने इस आलोचना को अच्छी भावना से लिया और चीजों को ठीक किया.

साल 2020 भारतीय खेल के लिए एक बड़ा साल रहेगा. भारतीय न केवल टोक्यो ओलंपिक में भारत का नाम रौशन करेंगे बल्कि उसके दो महीने बाद ऑस्ट्रेलिया में टी20 विश्व कप में विराट की अगुआई वाली भारतीय टीम भी अपना झंडा गाड़ेगी. उम्मीद करते हैं कि भारत 2020 में सभी खेलों में ट्वेंटी-20 शैली का दमखम दिखाकर सबको चौंकाएगा.

हमारे निशानेबाज रिकॉर्ड प्रदर्शन करने के लिए पूरी तरह तैयार हैं, सिंधु की भी बेहतर संभावनाएं हैं, मुक्केबाजी और कुश्ती से भी अच्छी उम्मीदें बंधी हुई हैं

बोरिया मजूमदार खेल इतिहासकार हैं और विभिन्न खेलों पर लिखते हैं.

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