नीरा चंदहोक
पंद्रह नंबर 1948 को भारत की संविधान सभा ने के.टी. शाह (बिहार, जनरल) की ओर से अनुच्छेद 1 में प्रस्तावित एक संशोधन को अस्वीकार कर दिया था. इसमें कहा गया था कि 'भारत राज्यों का एक धर्मनिरपेक्ष, समाजवादी संघ' होगा. बाद में उन्हें बताया गया कि संविधान राज्य के विभिन्न अंगों के कार्यों को विनियमित करने के उद्देश्य से बना एक तंत्र है. शाह की प्रतिक्रिया थी, ''यह सुनना मेरे लिए नया था कि संविधान एक तंत्र है... और लोगों की किसी आकांक्षा को शामिल करने की इच्छा को कुछ हद तक इसके बाहर माना जा सकता है.''
लेकिन आकांक्षाओं का समावेश पर्याप्त नहीं है. सभी सरकारों को बेतहाशा शक्तियां हासिल करने की घातक प्रवृत्ति से नागरिकों को बचाना होगा. इस प्रकार, संविधान ने शक्तियों को संस्थाओं में निहित किया, इनके इस्तेमाल पर नियंत्रण के लिए प्रक्रियाएं बनाईं, निगरानी की व्यवस्था की और मौलिक अधिकार प्रदान किए. नागरिक और सरकार के बीच मध्यस्थता की प्रणाली है, जिसमें प्रक्रियाएं, कार्य प्रणालियां, व्यवहार और संस्थान हैं.
पिछले एक दशक में इन मध्यस्थताओं का प्रदर्शन कैसा रहा है? इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की ओर से जनवरी 2019 में प्रकाशित ग्लोबल डेमोक्रेसी इंडेक्स 2018 पर विचार करें. सूचकांक पांच श्रेणियों में 60 मानदंडों पर 167 देशों की रैंकिंग करता है: चुनावी प्रक्रिया और बहुलतावाद, सरकार का कामकाज, राजनैतिक भागीदारी, लोकतांत्रिक राजनैतिक संस्कृति और नागरिक स्वतंत्रता. भारत सूची में 41वें स्थान पर है. उसने इसे एक 'त्रुटिपूर्ण' लोकतंत्र माना है.
रिपोर्ट उन संस्थाओं पर गंभीर आरोप लगाती है जिन पर कमजोर लोगों की निगरानी का जिम्मा है. सिविल सोसाइटी को लें. कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के 10 साल के शासन (2004-2014) के दौरान, सिविल सोसाइटी संगठनों (सीएसओ) ने सामाजिक हितों तक पहुंच सुनिश्चित करने में एक बड़ी भूमिका निभाई: काम करने का अधिकार, सूचना का अधिकार, प्राथमिक शिक्षा का अधिकार और भोजन का अधिकार. सीएसओ ने सामाजिक हितों के लिए प्रतिरोध, प्रदर्शन की मांग की और समाज को सक्षम बनाया.
2014 में जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सत्ता में आया, तो स्पष्ट हो गया कि सरकार के पास सिविल सोसाइटी के कार्यों को समझने के लिए न तो समय था, न ही धैर्य. बैंक खाते फ्रीज कर दिए गए और आयकर अधिकारियों ने प्रमुख मानवाधिकार संगठनों, नागरिक स्वतंत्रता आंदोलनों, परमाणु-विरोधी समूहों और उन सभी संगठनों पर छापे मारे, जिन्होंने सरकार के कार्यों पर सवाल उठाने की जुर्रत की थी. 2014 से विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम के तहत करीब 20,000 संगठनों के लाइसेंस रद्द किए गए हैं. प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को अप्रमाणित और निराधार सबूतों के आधार पर जेल में डाल दिया गया है.
गैर सरकारी संगठन विदेशी साझीदारों और दाताओं से धन प्राप्त करने के हकदार हैं, बशर्ते, वे अपने कार्यकलाप में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखें. कई नागरिक समाज संगठनों का संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संगठनों से जुड़ाव परामर्शदाता संगठनों के रूप में है. इस वजह से उन्हें परेशान करना और जनता की नजर में उन्हें संदिग्ध ठहराने की कोशिश अन्यायपूर्ण है. इसका मकसद सत्ता के दुरुपयोग पर नजर रखने और आवाज उठाने वाली सिविल सोसाइटी को अवैध बताना और कमजोर करना है.
सिविल सोसाइटी लोकतंत्र का अनिवार्य पहलू है क्योंकि यह चुनावों के अलावा अन्य बहुत-सी राजनैतिक प्रक्रियाओं में भाग लेने की आम नागरिकों की राजनैतिक क्षमता को पहचानता है. आज सिविल सोसाइटी परेशान हैं और उसके पास बिल्कुल फंड नहीं है. नागरिक आज कमजोर हो चुके हैं. सामाजिक रूप से संगठित होने और उनके जीवन और स्वतंत्रता के अधिकारों से उन्हें वंचित किया जा रहा है. 2014 के बाद से घृणा अपराधों में कथित तौर पर 400 प्रतिशत की वृद्धि हुई है. सिविल सोसाइटी को खतरा है और अधिकांश ऐसे संगठन अपनी आवाज उठाने के प्रति अनिच्छुक दिखते हैं.
बहुत ज्यादा कमजोर टीवी और प्रिंट मीडिया से भी नागरिकों को खतरा है. कुछ सम्मानजनक अपवादों के अलावा, हम मीडिया को लगभग पूरी तरह मौन देख सकते हैं. यह सिविल सोसाइटी की ताकत है. इसे पूर्ण सतर्कता का रास्ता लेना चाहिए, ऐसे जनमत निर्माण में योगदान देना चाहिए जिसे तथ्यों की सही जानकारी हो और सत्ता के खिलाफ बोलने का साहस भी होना चाहिए. जब यह मानव अधिकारों के उल्लंघन या शक्ति के दुरुपयोग को उजागर करता है, तो ऐस सतर्क मीडिया के सामने राजनैतिक शक्तियां घुटने टेक देती हैं. यह निर्वाचित सरकारों के पतन का कारण बन सकता है. 2014 में यूपीए-II सरकार की हार में मीडिया ने बड़ी भूमिका निभाई थी. उसके बाद से मीडिया अपनी भूमिका का उचित निर्वहन नहीं कर रहा. वह नेतृत्व की आरती उतारने वाला कल्ट तैयार करने में जुटा हुआ है, असंतुष्टों को राष्ट्र विरोधी करार देता है, एक वैध विरोध को कलंकित करता है और लोकतंत्र की हैसियत को घटाते हुए उसे बस चुनाव परिणामों से तोलता है.
बड़े कॉर्पोरेट्स के स्वामित्व में होना या फिर सरकार के दिखाए गए डर से सहमकर, वजहें चाहे जो भी रही हों लेकिन मीडिया यह भूल गया है कि वह नागरिकों के प्रति उत्तरदायी है. वह सरकार की कठपुतली बन गया है. अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मीडिया ने, सभी राजनैतिक दलों के लिए मुकाबले का समान माहौल बनाने की अवधारणा में भी खुरपी मारकर किसी खास पक्ष में माहौल बनाने का काम किया है. यह मतदाताओं के विभिन्न राजनैतिक दलों के प्रतिस्पर्धी कार्यक्रमों में से किसी एक को चुनने के अधिकारों में कटौती का प्रयास करता है. जो मीडिया हाउस सरकारी फरमानों को मानने से इनकार करते हैं, उन पर करोड़ों के मानहानि के मुकदमे चलाए जाते हैं; मीडिया को घुटनों के बल ला दिया गया. ऐसे में हमारे लिए फिर कौन बोलेगा?
सुप्रीम कोर्ट जैसे स्वतंत्र राजकीय संस्थानों से अपेक्षा की जाती है कि वे सरकारों पर निगरानी रखेंगे और नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा करेंगे. पर उन्हें भी सत्ता के गलियारों से अप्रत्याशित अवरोधों और धमकियों से निबटना पड़ता है. कुछ साल पहले यह स्पष्ट हो गया कि नागरिक अपनी लड़ाई संसद में नहीं बल्कि सुप्रीम कोर्ट में लडऩा पसंद करते हैं. अदालत, आपातकाल के समर्थन के अपने एक विनाशकारी रिकॉर्ड के बाद खराब हुई अपनी छवि को फिर से सुधारने के इरादे से सामाजिक कानूनों का और नागरिक स्वतंत्रता के गहन संरक्षण में भरपूर योगदान दे रही थी. यूपीए-II के अंतिम वर्षों के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार को उजागर करने, केंद्रीय जांच ब्यूरो की स्वायत्तता बनाए रखने और पारदर्शी प्रक्रियाओं का बचाव करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. दिलचस्प बात यह है कि लोकतंत्र के उदार पहरुओं ने हमेशा निर्वाचित विधायिका पर एक अनिर्वाचित न्यायपालिका को तरजीह दी है. उनका तर्क है कि विधायिका को लोकप्रिय भावनाओं की धारा में बहाया जा सकता है, लेकिन न्यायपालिका बहुत शांत मन से और पूरी स्पष्टता के साथ फैसले देती है जो व्यक्तियों के जीवन और समाज को प्रभावित करते हैं.
वर्ष 2014 से कोर्ट सरकार के साथ कई बार लड़ाइयों में मुब्तिला रही है. प्रख्यात वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम को सुप्रीम कोर्ट में भेजने को लेकर पहला बड़ा टकराव हुआ. मुख्य न्यायाधीश आर.एम. लोढ़ा पर व्यक्तिगत हमले किए गए और उन्हें नामांकन वापस लेना पड़ा. जजों की नियुक्ति की सिफारिश के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग बनाने के लिए सरकार 99वां संविधान संशोधन अधिनियम लेकर आई. इसमें कॉलेजियम को निरर्थक कर दिया गया था. अक्तूबर 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने संशोधन को असंवैधानिक करार दिया. दिवंगत अरुण जेटली ने इस काम को 'अनिर्वाचितों का अत्याचार' बताया था.
सरकार ने कॉलेजियम की सिफारिशों को कई बार रोका है. अदालतों में पद रिक्त हैं. जनवरी 2018 में चार वरिष्ठ न्यायाधीशों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके लोगों को चेतावनी दी कि व्यावहारिक रूप से लोकतंत्र खतरे में है. प्रधान न्यायाधीश ने कई न्यायधीशों को विवादास्पद मामलों की सुनवाई से अलग रखा. भय पैदा करने जैसी इस पृष्ठभूमि में अदालत को शरणार्थियों के अधिकारों, राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर और कश्मीर के हालात से जुड़े विवादास्पद मुद्दों पर फैसला करना है. हमें अयोध्या मामले में हालिया फैसले को भी इसी पृष्ठभूमि में देखना चाहिए. सबरीमला में नेताओं ने अदालत के फैसले को चुनौती दे दी है. उन्होंने मंदिर में महिलाओं को पूजा करने की अनुमति के अदालत के फैसले को धता बताने के लिए भीड़ को उकसाया. अदालतों को ऐसे झुकाने की कोशिश हुई और लोग असहाय हो गए.
2019 के चुनाव के बाद संसद पर पूरी तरह से भाजपा का दबदबा है. अनावश्यक जल्दबाजी दिखाते हुए दोनों सदनों में विवादास्पद कानून लाए जा रहे हैं. विपक्ष को अभी भी चुनावी सदमे से उबरना है. नागरिक अब भी अधिक संवेदनशील हैं थॉमस हॉब्स ने अपनी किताब लेवियाथन में लिखा है, ''हालांकि ईश्वर की बनाई कोई भी चीज अमर नहीं हो सकती; फिर भी यदि लोगों के पास सचमुच वह कारण उपलब्ध होता जो वे दर्शाते हैं तो उनकी साझा संपत्तियों की कम से कम आंतरिक दोषों से रक्षा तो हो ही सकती है.'' ये शब्द शायद भारत के लिए लिखे गए हैं.
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