शिकागो में बूथ स्कूल ऑफ बिजनेस में प्रोफेसर 56 वर्षीय रघुराम राजन वैश्विक भारतीयों की फेहरिस्त में 17वें नंबर पर हैं.
क्योंकि चाहे नोटबंदी हो (‘‘इसे आर्थिक सफलता नहीं कह सकते’’) या भाजपा सरकार का विदेश से कर्ज लेने का मंसूबा (‘‘तो क्या विदेशी पूंजी घरेलू अर्थव्यवस्था को हांकेगी?’’ वे हमेशा जो देखते-समझते हैं वही बोलते हैं
क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनने पर उन्होंने उद्घाटन भाषण किपलिंग के एक उद्धरण से खत्म किया था, जो अब उनकी बारीक नजर को साबित करती है, ‘‘जब तमाम लोग आप पर शक रहे हों तब भी आप खुद पर भरोसा कर सकते हैं/पर उनके शुबहों के लिए भी थोड़ी गुंजाइश रखें’’
क्योंकि उनकी किताब फॉल्ट लाइंस (2010) ने एफटी-गोल्डमैन सैक्स बुक ऑफ द ईयर अवार्ड जीता और थर्ड पिलर (2019) में दी गई दलीलों से वैश्वीकरण फिर अच्छा और अनुकूल दिखने लगा
जो सबक मिले
जब उन्हें बैंक ऑफ इंग्लैंड का प्रमुख बनाए जाने की चर्चाएं उठीं तो राजन ने इसी जुलाई में बीबीसी से कहा कि वे फिर से अपने हाथ नहीं जलाना चाहते, कम से कम अभी तो नहीं
***

