उपन्यासकार अमिताभ घोष अपने फिक्शन लेखन—शुरू के सर्किल ऑफ रीजंस से लेकर हाल के इबिस ट्राइलोजी तक—के लिए मशहूर हैं. उनकी बाद की रचनाएं तब अपने चरमबिंदु पर पहुंच जाती हैं जब वे खुद मानवता के हाथों पृथ्वी के चेहरे और मानवता के भविष्य पर अंकित किए जा रहे जलवायु के विनाश का पूर्वाभास देने लगते हैं. 2016 में घोष की द ग्रेट डिरेंजमेंट एक ऐसी पुस्तक थी जिसमें कोई काल्पनिक कहानी नहीं बल्कि उनकी चिंता और उनकी गंभीर सलाह थी.
अन्य बातों के साथ ही वह पुस्तक उनकी इस मान्यता को भी दर्शाती है कि फिक्शन चाहे कितना ही मशहूर क्यों न हो, जलवायु परिवर्तन के कारण मानवता के विनाश के प्रति लोगों को आगाह करने में सक्षम नहीं होता है. घोष कहते हैं, ‘‘विनाश होने लगा है, मुद्दा यह है कि हम इसे देखना कब शुरू करेंगे. दिल्ली पानी की कमी से जूझ रही है लेकिन लोग अभी तक चेते नहीं हैं. जलवायु परिवर्तन को हम अपने चारों ओर महसूस कर सकते हैं.’’
खास बातें
घोष ने राष्ट्रीय राजनीति में उलझी दुनिया में जलवायु परिवर्तन को एक वैश्विक समस्या बताया और पहले ही पर्यावरण की आपात स्थिति का सामना कर रहे उपमहाद्वीप के लोगों को इसके प्रति सचेत करने की कोशिश की.
‘‘अरब सागर में चक्रवात तेज होते जा रहे हैं...अरब सागर के तल से उठने वाला तूफान मुंबई के तट पर 10-24 फुट ऊंची लहरें पैदा करेगा...जिससे भारत पूरी तरह अपंग हो जाएगा.’’
घोष ने कहा कि उत्तर भारत में करीब 30 करोड़ लोग ऊपरी गंगा के भूजल पर निर्भर हैं. ‘‘और हमने इसका पानी निकाल लिया है क्योंकि 1950 के दशक में सरकार ने किसानों के लिए बिजली में सब्सिडी देने का फैसला किया था जिससे किसानों के लिए यह ज्यादा फायदेमंद हो गया था कि वे अपनी जमीन की जुताई करने की अपेक्षा आराम से पानी निकालने लगे.’’
‘‘जलवायु परिवर्तन मॉनसून को अलग-अलग तरह से प्रभावित करने जा रहा है...इस समय भारत के करीब 30 प्रतिशत हिस्से में सूखा है. इसी के कारण आज खेती का संकट और किसानों की आत्महत्या जैसी समस्याएं पैदा हो रही हैं.’’
घोष पूछते हैं, यह सब हमारे सामने हो रहा है, हम इसे देख क्यों नहीं पा रहे हैं. उन्होंने सुंदरबन से बड़ी तादाद में शुरू हो रहे पलायन के बारे में सवाल किया. इसकी वजह स्पष्ट तौर पर जलवायु परिवर्तन है. वहां समुद्र का जलस्तर बढ़ रहा है और खारा पानी जमीन पर आ रहा है. उन्होंने कहा, ‘‘हम एक ऐसी तबाही का सामना कर रहे हैं, जिसकी हम कल्पना भी नहीं कर सकते हैं. फिर भी दिल्ली के आसपास लोग अपने लॉन में सिंचाई कर रहे हैं, उन्हें कल की कोई चिंता नहीं है.’’
***

