पुराने बसे श्रीनगर की धूल भरी तंग गलियों से रिफत मसूदी कामयाबी की मशाल बनकर उभरी हैं, वह भी क्रिकेट के बल्ले बनाने के उस उद्योग में, जिसमें मर्दों का दबदबा रहा है. फिर ऐसा क्यों न हो कि वे उन्हें प्यार-से "बैटवूमैन'' कहने लगे हैं.
दो बच्चों की मां रिफत ने यह काम 2003 में शुरू किया. तीन साल पहले उनके ससुर की मौत के बाद 40 साल पुरानी बैट मैन्यूफैक्चरिंग यूनिट मसूदी आर्ट्स ऐंड स्पोर्ट्स पर ताले पड़ चुके थे. रिफत बताती हैं, मैंने अपने शौहर शौकत से पूछा कि क्या मैं इसे फिर से शुरू कर सकती हूं और वे तैयार हो गए.''
शौकत ने पुराने काम करने वालों, विलो (लकड़ी के डीलरों) और जम्मू-कश्मीर से बाहर के ग्राहकों से उनका संपर्क कायम करवाया. शुरुआत में माल देने और भुगतान में देरी सरीखी परेशानियां आईं. मद्धिम रौशनी वाले कमरे, जिसकी मिट्टी की दीवारों के साथ ग्लॉसी फिनिश्ड एमएएस (मसूदी आर्ट्स ऐंड स्पोर्ट्स) बल्लों का अंबार लगा था, में बैठीं रिफत कहती हैं, "मगर वर्करों ने मेरी बहुत मदद की और मुझे वह बनाया जो मैं आज हूं.''
रिफत बताती हैं कि बैट बनाने में "सुनार सरीखे हुनर की जरूरत होती है'', एक बार देख कर आपको पता चल जाना चाहिए कि बल्ला सोना है या बकवास. वे हरेक तैयार बल्ले की खुद जांच करती हैं. रियाज अहमद गनी इस बैट इकाई में दो दशकों से ज्यादा वक्त से काम कर रहे थे, तभी तीन साल की बंदी ने उन्हें गांव लौटने और छोटे-मोटे काम करने को मजबूर कर दिया. अब जब रिफत ने कारोबार फिर खड़ा कर लिया है, तो वे खुश हैं और इस बात के लिए शुक्रगुजार भी कि "उनके बच्चों की तालीम में खलल नहीं पड़ा.'' वे कहते हैं, "यह अकेले उन्हीं की कामयाबी नहीं है, बल्कि हमारी भी है.''
स्टार्ट-अप को बढ़ावा देने के काम से जुड़े राज्य सरकार के एक अफसर कहते हैं कि सरकारें इस उद्योग को प्राथमिकता देने और दुनिया में कश्मीरी बल्लों की भारी मांग का फायदा उठाने में नाकाम रही हैं. वे कहते हैं, "कश्मीरी ब्रान्ड के बल्ले राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में मुश्किल से ही दिखाई देते हैं. घाटी से कच्चे बल्ले गैरकानूनी तरीकों से दूसरे राज्यों में ले जाए जाते हैं जहां प्रमुख ब्रान्ड उन पर अपने स्टिकर लगाते हैं.'' यही वजह है कि रिफत पूरी तरह तैयार बल्ले ही बाहर जाने देती हैं ताकि उनका ब्रान्ड एमएएस बैट्स कश्मीर का नाम रौशन करे.
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