बजरंग पूनिया खुद अपने प्रति काफी बेरहम हो सकते हैं. अक्तूबर में विश्व कुश्ती चैंपियनशिप 2018 के फाइनल में हारने के बाद उन्होंने ट्वीट किया था, "मैंने बुडापेस्ट में सेकंड बेस्ट रहने के लिए ट्रेनिंग नहीं ली थी. नतीजे को स्वीकार करना मुश्किल है, पर यह हार मुझे और ज्यादा मजूबत बनाएगी.''
इससे पहले इसी साल खेल रत्न के लिए अपने नाम पर विचार नहीं किए जाने से वे नाराज हो गए थे. और आखिर क्यों न होते, पिछले दो-एक साल उनके खासे असरदार रहे थे और इसको देखते हुए यह मांग वाजिब ही थी. उन्होंने राष्ट्रमंडल खेल और एशियाई खेल दोनों में सोना जीता था और उसके बाद विश्व चैंपियनशिप में चांदी जीती थी और यह साल अपने भारवर्ग 65 किग्रा में दुनिया के नंबर एक खिलाड़ी की रैंक के साथ खत्म किया था. उनकी यह भूख देखते हुए लोग मानते हैं कि पूनिया का ओलंपिक्स में व्यक्तिगत सोना जीतना और अभिनव बिंद्रा की ऊंची और भव्य जमात में शामिल होना तय है.
हरियाणा निवासी पूनिया के पिता (खुद भी विश्वविद्यालय स्तर के पहलवान) को जल्दी ही यकीन हो गया कि उनका बेटा एक न एक दिन बेमिसाल पहलवान बनेगा. पूनिया कहते हैं कि हिंदुस्तान के पहलवानों को अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंटों में पदकों के साथ अपनी प्रतिभा को साबित करते रहना होगा. इसके लिए ग्रामीण इलाकों में मैट पर कुश्ती का नियम बन जाए. उन्होंने कहा, "साफ कहूं तो मिट्टी से मैट पर एडजस्ट कर पाना बहुत मुश्किल होता है.
पक्की पकड़ बना पाना आसान नहीं होता, पैर फिसलने लगते हैं.'' अब जब भारतीय कुश्ती संघ ने नई करार प्रणाली में उन्हें ग्रेड ए श्रेणी में रखा है (इसके साथ 30 लाख रुपए की सालाना रिटेनरशिप और जेएसडब्ल्यू स्पोट्र्स की सहायता मिलती है), वे अंतरराष्ट्रीय कोचिंग विशेषज्ञ का खर्च उठा सकते हैं. उनका इरादा खेल का सुल्तान बनने का है.
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